Monday, 27 August 2012

अभिशप्त Kavita 45

अभिशप्त

जैसे तुम्हारा मिलना निश्चित था
वैसे ही निश्चित था तुम्हारा जाना.
अनिश्चय की स्थिति में भी
निभाए थे हमने सारे रीति-रिवाज़.
खाने को खाई थी कसमें
जीने को जिए थे रात-दिन साथ-साथ.
हालाँकि हमें मालूम था
कि वादों का कोई अर्थ नहीं है
फिर भी किए थे
साथ जीने-मरने के वादे
जैसे उनके बिना
प्यार की रस्म अधूरी रह जाएगी.
कुछ अधूरापन न रहे
प्यार से खुद को भर लो लबालब.
पता नहीं, फिर कब मिलना हो
मिलना हो भी या नहीं.
समय की अस्थिरता के चलते
हमारे मन की स्थिरता का क्या महत्व?
हमारे बस में कुछ नहीं था
जो भी था काल के गर्त में समाया हुआ.
हम तो केवल 
प्यार करने के लिए अभिशप्त थे
सोच रहे थे
यह किसी देवता का वरदान है.
समय की धारा बहा ले गई अपने साथ
हर वरदान को, हर अभिशाप को
छोड़ गई यादों के ढेर सारे रेतकण
और कलपते हुए धूल के अम्बार.

Saturday, 25 August 2012

संदिग्ध Kavita 44

संदिग्ध



ज़िन्दगी जो जी तुम्हारे साथ
आराम से जी.

लम्बा अकेलापन जब मिलता है
तब जिए हुए जज़्बात जज़्ब होते हैं
मन के अन्दर
और समझ में आता है
संबंधों का समीकरण
सही गलत का भेद.

अवचेतन से तब उठती हैं आवाजें
पगलाई सी धुन में
जिसे कहते हैं हम
अंतरात्मा की आवाज़.

दर्प के दंश का दाग दहकता है कभी
कभी पूजी जाती है परत परत प्रतिमा
कभी कुंठा के क्लेश
कभी पछतावे में पीड़ित प्राण
कभी सिरफिरे संवादों के बीच से
संवेदना लहराती है
चुलबुली चंचल चपल
मिष्टी मधुर कल्पना सी.

साथ जीते जो कभी सिर्फ प्यार था
मान की मनुहार था
जिसको पाने के लिए बेचैन थे हम
जिसको पाकर हो गए थे तृप्त.
वह अलग होते ही क्यों संदिग्ध है
कौन सी थी वह कड़ी
जो कि जोड़े न जुडी
सोच का हर रास्ता अवरुद्ध है.

ग़ज़ल 3

ग़ज़ल 3

शब्दों का आडम्बर था, भावनाओं की खिलवारी
पीछे-पीछे पतझर था, आगे-आगे फुलवारी.

कपड़ों की सिलवट में है, एक अधूरी सी गाथा
झंझावातों के मध्य में, बही बयार मतवारी.

धूप सुनहरी रात रुपहली, क्या कहने इन दोनों के
धुंधले रंगों में भी सुन्दर, दिखती है तू संझा री.

मन को तुमने उलझाया प्रीत पियारी बातों से
हंस-हंस के सब सहन करेंगे, आज नहीं है दुश्वारी.

किसने मन के आँगन में रंग बिखेरे होली के
किसने झप-झप दीप जलाए, कोने-कोने दीवारी.

चुनौती Kavita 43

चुनौती

तुम्हारे बस का नहीं है
किसी व्यक्तित्व के वैविध्य को संभालना.
तुम एक सीधी-सादी ज़िन्दगी जीने के आदी
एकरसता में रहने को श्रापग्रस्त.
फ़िल्मी संगीत से आगे
तुम्हारी कोई रूचि नहीं,
परिजनों के साये से अलग
तुम्हारी कोई नियति नहीं,
तुम्हे नहीं पता
रिश्तों से आगे भी होते हैं रिश्ते
त्यौहारों के अलावा भी
मनाए जाते हैं सम्मिलन.
तुम अनजान इस बात से
कि ज़िन्दगी में हादसे भी होते हैं
जिनका अर्थ सीढ़ियों से फिसलना
या सड़क पर रपटना ही नहीं होता
जो मन और आत्मा की दीवारों से टकराते हैं
भीतर का सब कुछ विद्ध्वंस कर जाते हैं.
तुम अपने सीमित संसाधनों के बलबूते
तुम अपने संकुचित दायरे के आश्रयी
ज़िन्दगी को अपने तरीके से रचने की
उम्मीद संजोए बैठे हो.
तुम्हारे सामने हैं चट्टानों सी अडिग अनगढ़
जोखिम भरी चुनौतियाँ
और एक दोस्ती का हाथ
साहस हो तो थाम लो उसे.

शब्द संगिनी Kavita 42

शब्द संगिनी

वह आया है शब्दों के रथ पर सवार
शब्द संगिनी, उसकी अगवानी करो.

उसके लिए लगाओ लिखावटों के मेले
कवितायेँ व गीत-ग़ज़ल परोसो सुबह-शाम
कल्पनाओं और भावनाओं का सामंजस्य हो
बेसुरी बातों का बालिके, आज नहीं कोई काम.

कथा हो कोई भी व्यथा में पिरी हुई
कथन-उपकथन का संयोजन लाजवाब हो
जो भी हो, उच्च स्तरीय हो साध्वी
हर प्रस्तुति में रुतबा रुआब हो.

श्रेष्ठ कवि, श्रेष्ठ कलाकार, श्रेष्ठ साधक वह
ह्रदय के पन्नों पर मानिनी, लिखो उसका नाम तुम
शुष्क रूखे कागजों पर लिखी हुई निःसंग निर्मोही
रचनाएं अब कहाँ, विस्मृति के गर्त में हुई गुम.

मन की प्राचीर पर भयभीत खुदे हुए
सुनसान सदमे को चीर कर कोई तो मीत मिले
आज सूनी उम्र की उठान पर, पथरीली शान पर
प्रार्थना कर मनस्विनी, उसकी ही प्रीत मिले।

Friday, 24 August 2012

ईश्वर Kavita 41

ईश्वर

वह एक अजनबी की तरह मंदिर में घुसा था
जैसे उसने पत्थर की मूर्तियों को कभी देखा न हो
जैसे उसने घंटियों की रुनझुन कभी सुनी न हो
जैसे उसे पता न हो किसी मंदिर के मायने
फूल, पत्ते, रोली, चावल, पूजा की थाली
और सबसे प्रमुख तो पुजारी तथा भक्तगण
इन सब का वैशिष्ट्य क्या है
जैसे वह अज्ञान हो इस पूरे तन्त्र-मन्त्र से
फिर भी वह मंदिर में घुसा एक अजनबी की तरह
हाथ फैला कर प्रभु के सामने, मांगी दुआ
हे प्रभु ! मैं मानता नहीं तुझे
कि तेरा अस्तित्व है भी कि नहीं
कि तू सिर्फ संयोग है या तेरा मायाजाल है यह
कि बिगाड़े तू बिगाड़े, कि संवारे तू संवारे
तूने दुनिया को बनाया, तेरी महिमा अपरम्पार
अगर ऐसा है प्रभु तो मेरी बिगड़ी भी बना
अगर तू है सर्वेसर्वा तो मुझे तू मुक्त कर
अगर तू है ईश्वर तो शत्रुओं का नाश कर
अगर तू ऐसा करे तो मैं भी तेरा भक्त हूँ
आज से क्या मैं अभी से तुझमे ही अनुरक्त हूँ.
भक्त भोला जानता नहीं था इस तथ्य को
कि अगर तुम 'अगर' से कुछ भी शुरू करते हो बात
तो तुम्हारे अन्तस्मन में है नहीं कोई विश्वास
ईश्वर का भौतिकता से तो कोई सम्बन्ध नहीं
वह तो विश्वास से ही पूजा जाता पत्थरों में
उससे न कुछ मांग सकते अहम्-अहंकार से.

आक्रान्त Kavita 40

आक्रान्त

जब तुम निरीक्षण कर रहे थे
मेरे हर लिखे शब्द का.
प्रेम में लिखे मेरे शब्द
संभवतः तुम्हे
किसी क्रांति का आभास दे रहे थे.
तुम आक्रांत थे, प्रेम से या किससे
मालूम नहीं.
शब्दों के मायाजाल से भ्रमित
अपने आक्रोश को छुपाते हुए
तुम अचानक रचनाओं की
प्रशंसा में जुट गए थे.
तुमने उनमें कहीं पढ़ लिया था
कि मैं वर्तमान को जी रही थी
विस्मित, घृणित अतीत को नहीं.
क्योंकि भूलने का वादा किया था
मैंने तुमसे बार-बार.
जो हमारे बीच आए
अर्थ का अनर्थ करे
जो हमें उलझा के रखे
फ़ालतू के द्वन्द में
उस रहस्य को रहस्य ही
दबा रहने दो काल-गर्त में
उसकी अब क्या अहमियत
न किसी प्रतिद्वन्द में
न ही किसी छंद में.

हमसफ़र मिलता नहीं Kavita 39

हमसफ़र मिलता नहीं

कुछ तो है जो तुम छुपा रहे हो
ढक के रखा है मन का एक-एक कोना
बात अनजाने में कोई फिसलती नहीं
तुम्हारे होंठों से
सजग सचेत तुम्हारी आँखें
बोल नहीं पाती कुछ
क्या है जो तुम्हारे दिल की गहराई में
कुलबुला रहा है चुपचाप
क्या है जो तुमने इतना कुछ कह कर भी
बचा लिया है कहने से
क्यों तुम्हारे ठहाकों के पीछे
एक मुरझाया साया है
क्यों तुम्हारी चुलबुली शैतानियों में
अजब गंभीर सा कुछ तैरता है
क्यों तुम्हारे शब्द चौकन्ने हुए हैं
क्यों तत्पर हो सूची ले सौगंधों की
क्यों दिलासा देते हुए हाथ
ठिठक जाते हैं शर्मिंदगी में
क्यों मुखौटा सा नज़र आता है
तुम्हारा असली चेहरा कहाँ छुपा है ?
मेरी अगवानी में न पछताओ तुम
यह मुझे स्वीकार नहीं मेरे दोस्त.
मैं अकेली राह पर चलने की आदी.
मैं अकेले ज़िन्दगी जीने की आदी.
है नहीं दरकार मुझे उस सुबह की
जो जगाए नींद से पर
दे नहीं आलस से मुक्ति
है नहीं दरकार उन पुष्पों की मुझे
रंग तो हो जिनमे मगर गंध नहीं
मैं नहीं कुछ मांगती ईश्वर से ऐसा
जो नहीं दिल के करीब
जो नहीं सम्पूर्ण हो.
तुम किसीं अड़चन में हो तो भूल जाओ
कशमकश में चाहतों का सिलसिला चलता नहीं
दोस्ती कैसी भी हो, प्रेम का अहसास भी हो
एकतरफा कोई भी रिश्ता कभी फलता नहीं.
हर किसी को ज़िन्दगी में साथ चलने के लिए
हमसफ़र मिलता नहीं, राज़दां मिलता नहीं.

Thursday, 23 August 2012

सिर्फ तुमसे Kavita 38

सिर्फ तुमसे


मैं तुम्हारे प्रेम में निमग्न हूँ
सच कहूं तो बहुत ही संलग्न हूँ.

तुम दबे बैठे हो अंगारों के पीछे
हाथ जल न जाएं कहीं, ध्यान से,
नाउम्मीदी की सलाखें तोड़ कर
बेरहम माहौल से तुम बाहर आओ.

देखो, बारिश हो रही है प्यार की
सायं-सायं में छुपा संगीत है
गुलमोहर के फूल चटख रंगों में
झूम-झूम कर बुला रहे हैं तुम्हे.

नृत्यरत है सारी प्रकृति जैसे
बाँध कर रख पाएंगे खुशबू को कैसे
ये हवाएं मदभरी हैं आजकल
ये घटाएं सिरफिरी बेसब्र हैं.

तुम कहीं न भूल जाना रास्ता
दीप राहों पर रखे हैं चाँद ने
भटकनें दिल की पुकारें, आओ तुम
जैसे कभी न मिले, ऐसे मिलें.

अब न जाना दूर इस तपती धरा से
अब न जाना भूल तुम कि कोई है जो
प्यार करता है बिना संकोच के
सिर्फ तुमसे, सिर्फ तुमसे, सिर्फ तुमसे.

मैं तो नहीं Kavita 37

मैं तो नहीं (लास्ट सन्डे, मासिक, अक्टूबर, 2012 में प्रकाशित)



सीमित और संक्षिप्त
बात करने के आदी तुम
भावनाओं को
छुपा कर रखने में प्रवीण
न तुम्हारे होठों से कुछ झरे
न तुम्हारी आँखों से कुछ छलके
तुमने अपने इर्द-गिर्द खड़ी की हैं
अभेद्य दीवारें
संगीन पहरे लगे हैं
तुम्हारे ह्रदय के दुर्ग पर
किसके लिए इतना बचा कर
रखे हुए हो खुद को
कौन आएगा तुम्हारे
महल में रहने के लिए
मौत सा सन्नाटा जहां
धूल के अम्बार भी हैं
पानियों की कलकल नहीं
मस्तियों की छलछल नहीं
क्या तुम्हे लगता है
कोई है तुम्हारा सानी भी
जो तुम्हारी ही तरह
मुस्कानों से दूर है
अपने आप में मजबूर है
जिसने चाहा है हमेशा चुप्पियों को
भावों-सम्भावों से जिसका
दूर का रिश्ता नहीं
कौन ऐसा दूसरा है
जिसका मन तुमसे मिलेगा ?
मैं तो नहीं, मैं तो नहीं
सच कहूं, मैं तो नहीं.

तुमने कहा था Kavita 36

तुमने कहा था (लास्ट सन्डे, मासिक, अक्टूबर, 2012 में प्रकाशित)

तुमने कहा था
रक्त-रंजित राह पर
तुम हमेशा, और हमेशा
साथ मेरे ही रहोगे.

कि तुम्हे परवाह नहीं
बदनामियों की
कि तुम्हारी चाह में
बंदिश नहीं गुमनामियों की.

कि तुम्हारा हाथ पकडे हाथ में
मैं तुम्हारे साथ हूँ
इस अनोखी यात्रा में
सृष्टि के विध्वंस तक.

कि दिल्लगी होती नहीं
दिल की लगी कहते हैं जिसको
बहुत मुश्किल से मिला करती है
दिल की दिल से राह.

मैं तुम्हारे रंग में रंगी
एक अल्हड बालिका सी
दृष्टिहीन, दिशाहीन
स्वप्न लोकों में विचरती चल पड़ी.

खुशफहमी Kavita 35

खुशफहमी

तुम्हे लगता है
आगे का रास्ता प्रशस्त है
प्रकाश से भरा.
तिमिर छंटता हुआ
नज़र आता है तुम्हे.
भाग्य की रेखाओं पर
विश्वास करते हो
कि जो भी लिखा होगा
अच्छा ही लिखा होगा.
तुम मगन हो
अपने ही संसार में
कोई भी दुःख-दर्द
तुम्हे अब सालता नहीं
किसी भी प्रलोभन में
तुम डूबते नहीं
कितनी मौतें देख लीं
तुमने ज़रा से वक़्त में
पर एक आंसूं भी नहीं
टपका तुम्हारी आँख से
सोख लिया भीतर ही
जल और जलांध को.
तुम आत्ममुग्ध
तुम निर्मोही
अपनी ही खुशफहमी में खुश
और अपनी ही बंदिश में मस्त.

सृजन Kavita 34

सृजन


यह तुमने क्या कह दिया
असंभव को संभव करोगे तुम?

बिना रंगों के बनेंगे चित्र अब?
बिना शब्दों के लिखी जाएगी कविता?
बिन सुरों के गान होंगे?
गर्त में अभिमान होंगे?
एक अनजानी लिखोगे तुम कहानी?
कागजों पर जो नहीं, होगी जुबानी?
न शुरू न अंत जिसका?
एक रचना अनकही सी?
कहकहों में डूब जाएंगे सभी
जिन मुखौटों में भरोगे प्राण तुम?

इस महासंग्राम में तुम विजयी हो
इस महासंगम में सारे पाप धुलें
इस महाबदलाव में तुम अग्रणी
आगे आओ और सृजन में जुटो.

Tuesday, 21 August 2012

बेफिक्री Kavita 33

बेफिक्री

हम मिलने के बाद
हो गए हैं मौन
चुप्पियाँ पसर गई हैं
अब हमारे बीच
जब तक हम नहीं मिले थे
हमारे पास
बातों का एक लंबा
सिलसिला था
जो लम्बी-लम्बी चिट्ठियों में
शब्दशः फैला हुआ था.

कुछ चीज़ें
तय हो जाने के बाद
बातों में
अदृश्य हो जाती हैं
न पाने की तड़प
न खोने की फ़िक्र
अब बात भी हो तो
किसलिए हो
पा तो लिया
सब कुछ.

कितना आसान हो गया
जीना
पता है
वह अपना है
भरोसा है
वह छिनेगा नहीं
सच है
अब रोना कैसा
न तेरा कोई और
न मेरा कोई और.

Monday, 20 August 2012

शब्द-शक्ति Kavita 32

शब्द-शक्ति



तुमने लिखा था रात की स्याही में
एक टिमटिमाता शब्द
अंधेरों को चीरती हुई प्रकाश की लकीरें
हवा में दूर तक निकल गईं.

बंद दरवाज़े अपनेआप खुलते गए
पैरों में पड़ी हुई बेड़ियाँ टूटने लगीं
हाथों को जो मिला था श्राप बंध जाने का
मुक्त हुए, पृष्ठ-दर-पृष्ठ लिखने के लिए
चेतना पर पड़ी हुई कोहरे की चादर लुप्त हुई
मन का अवसाद आह्लाद में बदलने लगा.

तुम्हारी कलम का जादू दूर तक जाएगा
मन के कारागार में छुपे बैठे हैं जो भाव-कण
आत्मा में कुलबुला रही है जो सत्य-सरगम
रास्ता खोजेंगे अपना मंजिलें पाने के लिए.

तुम कभी भी खो न देना आस को
बीच राह में भूल न जाना कहीं
कि तुम्हे जाना है दूर, और दूर
कि तुम्हे उठना है ऊंचे इस धरा से.

रात की गमगीनियाँ हों या सुबह के हौसले
हर समय हमराह है प्राणों में बस्ती ऊर्जा
तुम जहां भी जाओगे मंजिल वहीं आ जाएगी
शब्दों में शक्ति बड़ी है, जीत पास ही खड़ी है.

झुनझुना Kavita 31

झुनझुना



तुम्हे याद है ?
उस दिन तुम्हारे न आने पर
जब मैं बहुत ज्यादा रोई थी
करुण रस की धार में बह गई थी
विश्वास करने को दिल नहीं था तुम पर
जीने की जैसे आस ख़त्म हो गई थी
मृत्यु मांगे से भी नहीं आ रही थी.

तब तुमने रखा था प्रस्ताव परिणय का.

जैसे झुनझुना थमा रहे हों
किसी नासमझ रोते हुए बच्चे को.

मैं नासमझ हो सकती थी
लेकिन झुनझुनों से खेलने की उम्र
बहुत पीछे छूट चुकी थी.

मैंने जल्दी से अपने आंसूं पोंछे थे
करुण रस को हास्य रस में बदला था
और तुम्हारा झुनझुना तुम्हे लौटाते हुए
भौतिक जीवन के दर्शन शास्त्र में
खुद के साथ तुम्हे भी उलझा लिया था.

परिणय एकमात्र हल तो नहीं
प्रणय की परिणति का.

Sunday, 19 August 2012

समय-संग्राम Kavita 30

समय-संग्राम

तुम एक सीमित दाएरे में बंधे हो
तुम्हारी रचनात्मकता सिमटी है
निष्कासन और निर्वासन की संस्कृति में.

तुमने अशोक के पेड़ लगाए थे
अपने आँगन में कभी
आज वे सूख कर हो चुके हैं ढेर.

पेड़ों के प्रति क्रूरता का यह रवैया
मौसम में दुर्गन्ध फैलाता है.

सृजन से हो न जाना दूर
चुन-चुन कर शब्दों को, सपनों को
घर की दीवारों पर सजाने की कला
सीखनी है तुम्हे.

दरवाजों पर लटकानी हैं बंदनवार
रचनी है रंगोली सात रंगों से
सुगन्धित पुष्पों से करना है
स्वागत समय-संग्राम का.

तुम्हारे मन का संतप्त एकांत
जब मुखर होगा प्रशस्ति गान में
झिलमिलाएंगे सितारे, रागिनी छेड़ेंगे मेघ
मुस्कुराएंगी दिशाएं, देवता होंगे प्रसन्न.

Saturday, 18 August 2012

शब्दों से बचो मत Kavita 29

शब्दों से बचो मत


तुमने तो कहा था कि
तुम जिरह कर सकते हो
एक वकील की तरह.

काँटों पर चल सकते हो
नंगे पाँव झुलस-झुलस
एक फ़कीर की तरह.

बातों से डरो मत, शब्दों से बचो मत
प्यार क्या एक संगीन जुर्म है
हत्या के कलंक की स्याह लकीर की तरह?

शब्दों से बचोगे तो कथा कैसे रचोगे
मौन रह कर कभी भी कोई कहानी बनी नहीं.
लटके रह जाओगे तस्वीर की तरह.

बात मेरी प्यार की सुनने से पहले
मत शिकायत नाम दो हर बात को
मेरे मन में कुछ नहीं शमशीर की तरह.

Friday, 17 August 2012

छोटी कविता : 4

छोटी कविता : 4

तुमने अपने को मरा हुआ देखा
और अपने मृत शरीर को छू कर
संतुष्ट हो गए
कि अब तुम मर चुके हो.
जीवित व्यक्ति की समस्याएँ
अब तुम्हे बोझिल नहीं करेंगी
नहीं विवश होंगे अब तुम
किसी को प्यार करने के लिए
जीने के लिए जो मरना पड़ता है बार-बार
उस बेहिसाब मरने के लिए.

छोटी कविता : 3

छोटी कविता : 3

तुम्हारे पास खोने को
अब है ही क्या?
उछालते रहो अपने को
खुलेआम बाज़ार में.
तुम सब कुछ खो कर
मेरे पास आए हो
सब कुछ पाने के लिए
मैं सब कुछ पा कर
तुम्हारे पास आई हूँ
सिर्फ गँवाने के लिए.

छोटी कविता : 2

छोटी कविता : 2

मैं जब चलती हूँ
तुम साथ-साथ चलते हो
मैं बैठती हूँ कहीं
तुम पास आ कर बैठ जाते हो
मैं सोती हूँ तो तुम
सपनों में आ जाते हो.
तुम्हारे न होने पर भी
तुम्हारे होने का अहसास
रहता है मेरे पास
पल-छिन, दिन-रात.

जंगल संस्कृति Kavita 28

जंगल संस्कृति (नवनीत, मासिक, अक्टूबर, 2012 में प्रकाशित)

तुम एक अनजाने प्रदेश में रहे हो घर-समाज से दूर
वर्षों बीत गए तुम्हें जंगल में नौकरी करते हुए
जंगली जानवरों के साथ तुम्हारे आत्मीय सम्बन्ध बन गए
वे पहचान गए थे तम्हारा पुचकारना और तुम उनका गुर्राना
धीरे-धीरे तुम वहीं के अभ्यस्त हो गए
पहचान हो गई थी तुम्हें हर जंगली पेड़-पौधे की भी
आकाश पूरा नज़र आता था तुम्हें
विभिन्न प्रकार की चिड़ियाँ तुम्हारे आस-पास चहचहाती थीं
तुम प्रसन्न हो उठे कि प्रकृति को तुमने इतने पास से देखा है
जैसा पहले कभी नहीं देखा था
तुम्हें नहीं पता था पहले कि कौन सी चिड़िया का क्या नाम है
खूंखार दिखने वाला जानवर भी कितना मासूम हो जाता है
अपनत्व भरे हाथ और गंध पहचानने लगता है वह
चख-चख कर तुमने जाना था कि तुम खा सकते हो
पत्ते और फूल भी जो निषिद्ध हुआ करते थे शहर में.

वर्षों का अंतराल बदल रहा था तुम्हारे जीवन की दिशा
यहाँ तक कि तुम्हारा जीवन दर्शन भी.
तुम इंसानों से ज्यादा प्यार करने लगे जानवरों को
तुम्हें भरोसा होने लगा कि जानवर बेहतर हैं
इंसानों पर विश्वास नहीं किया जा सकता
कौन कब आस्तीन का साँप निकले
कौन कब पीठ पीछे छुरा भोंक दे
तुम अपने ही बंधू-बांधवों के खिलाफ होते गए
तुमने अपने इर्द-गिर दीवारें खींच लीं.

तुम अल्प आय से खुश थे
तुम बिना परिवार के भी खुश थे
तुम बिना सैर-सपाटों के भी खुश थे
तुम्हे किसी मनोरंजन की चाह न रही
तुम्हे किसी नए रिश्ते की परवाह न रही
तुम्हारे लिए जंगल में ही मंगल था
तुम सोच रहे थे बहुत ऊंचा उठ रहे हो तुम
अपने इस दर्शन के चलते मनुष्य से घृणा करके
कोई सिद्ध पुरुष बनोगे तुम
जंगल संस्कृति पर पुस्तकें लिखोगे तुम.

अपने को वापस लौटाओ नादान अनजान
फिर से अपनी पुरानी मनस्थिति में आओ
जो पीछे छूट गया है उसे समेटो
जगलों में जो खो गया है तुम्हारा उसे खोजो
अपने स्वभाव में नरमी और भावों में गर्मी पैदा करो.
आखिर नौकरी की मियाद ख़त्म होने पर
आना तो तुम्हे शहर में ही है ना
रहना तो इंसानों के बीच ही है ना.

छोटी कविता : 1

छोटी कविता : 1

बरसों से रखा था
खुद को संभाल कर
अनुशासित नियमों और
रीति-रिवाजों में.
भंग अनुष्ठान सब
विधि के विधान सब
संकल्प छूट गए
व्रत सारे टूट गए
तुम मिले, सतरंगी फूल खिले
मंदिर के द्वार पर.

सीख लो

सीख लो


रात के अँधेरे हों या सुबह के उजाले
दोपहर की धूप हो या सांझ की नरमाई
कोई भी मौसम रहा हो
बोझ दिल पर लो नहीं
बीतने को बीत ही सब जाएगा,
हर शिकायत, हर गिला
कब तक चलेगा प्यार में
रीतने को रीत ही सब जाएगा.

तुम ज़रा सी बात पर खीज न जाया करो
शब्दों का अम्बार नहीं क्या तुम्हारे पास भी
बात करने की कला भी कूट-कूट कर भरी
वाद से संवाद तक सब निभा सकते हो तुम.
हर किसी मुश्किल घडी में
आंसुओं तक की झड़ी में
लाड कर, दुलार कर, प्यार से मनुहार कर
बिगड़ी हुई बात को धैर्य से संभाल लो.

तुम में है मज़बूत दीवारों सी स्थिर आस्था
तुम में है हर स्वप्न को साकार करने की कला
तुम में निष्ठा एकव्रती और धुनी साधुओं सी
तुम अगर चाहो तो बना सकते हो कुछ भी, कहीं भी
फिर तुम्हे संकोच क्यों है
व्यर्थ का आक्रोश क्यों है
हर नई सौगात पर क्या चौंकना ज़रूरी है?
शांत रह कर उलझनों के पार जाना सीख लो.

Wednesday, 15 August 2012

ग़ज़ल 2

ग़ज़ल 2

संवाद ज़रूरी है आँच गरमाने के लिए.
अर्थ से अनर्थ तक मुद्दा उठाने के लिए.

कागजों पर लिखा हुआ एक रिश्ता रह गया
जिंदा-सा मुर्दा-सा सिर्फ पछताने के लिए.

शब्दों में अशब्द भी हैं, शब्दों में निःशब्द भी
अपशब्द न हों कहीं गालियाँ खाने के लिए.

कौन सी दुर्दम्य गली, कौन सी भीषण सड़क
ले कहाँ जाएगी हमें तुझसे मिलवाने के लिए?

बहसों पर बहस किए, तर्कों पर तर्क दिए
कोशिशें तो बहुत कीं ग्रंथि सुलझाने के लिए.

बीत गईं सब कथाएँ, रीत गए गान सब
अब यहाँ बचा ही क्या लिखने-लिखाने के लिए.

याद Kavita 27

याद

यादों का जंगल था और रात का सन्नाटा था
आसपास अन्धकार हाथ को सूझे न हाथ
दुर्दशा ऐसी कि थर-थर काँप रहा जिस्म था
हिचकियों में रुंध गई आवाज़ मेरे साज़ की
स्वप्न्दंशों को न झेला जा रहा था और अब
आंसुओं ने बारिशों से होड़ लगा ली जैसे.

याद मत आ, याद मत आ, याद मत आ और तू
मैं भुलाने की तुझे कोशिश में हूँ ऐ संगदिल
तू तरस जाए किसी के प्यार को ऐ तंगदिल
मेरी गुमनामी से तू न यूं बिखर इस आस में
कि प्रतिष्ठा ने चुना है तेरी बदहाली में ख़ास
ऐसा कुछ जो इस कथा को दूर तक ले जाएगा.

मैं लिखूँगी एक कहानी जो तेरी याद में
मेरी कविता जब बहेगी आपसी विवाद में
तू बता कि कौन सा तब खेल खेलेगा यहाँ?
यात्रा में हम कभी थे साथ, पकडे हाथ, गाते गीत
ज़िन्दगी को साथ रचने का सुरीला सिरफिरा संगीत
आज क्यों असमंजसों के बीच मन के मीत?

Tuesday, 14 August 2012

तुम अदृश्य हो गए Kavita 26

तुम अदृश्य हो गए



जितना मिला उतना ही प्राप्य था मेरा.
चिलचिलाती धूप में जब जल रहे थे पाँव मेरे
तुम प्रकट हुए अचानक बारिशों को साथ लेकर
मैं अज्ञानी नादानी में संभल ही न पाई थी कि
बूँद टपका कर ज़रा सी तुम अदृश्य हो गए.

पूर्व जन्मों का हवाला मैंने दिया था ज़रूर
मौत तो इस जन्म में भी आएगी कब क्या पता
किसने देखा पूर्व जन्म और किसने देखा अगला जन्म
इस जनम में संगी-साथी न मिले तो न मिले
एक झूठ के सहारे जीत कर हम सब रहस्य हो गए.

अपनी-अपनी भूख है और अपनी-अपनी प्यास है
कौन मंदिरों में जाकर भक्त बनता है कभी
रास्ते में भूल कर भी बैठ न जाना कहीं पर
सैर-सपाटों में निकली भीड़ बिखरी है मैदाने जंग में
सभ्यता का पाठ पढ़ कर आए जो वो भी असभ्य हो गए.

तुम शुरू से धर्मसंकट में पड़े हो कैसे कुछ बोलो कहो
रोशनी की आड़ में तुमने छुपा रखे हैं सारे दिल के ज़ख्म
कौन सी फाँसी लगेगी जो मुखौटा पहन कर तुम आ रहे हो
शब्दों का तो खेल ही था हाथ चाहे कट चुके हैं
पास जो लगता था आएँगे वही अब फिर अलभ्य हो गए.

अग्नि-पुंज Kavita 25

अग्नि-पुंज

आत्मग्लानि से भर कर वह भीतर चूर-चूर हो गया.
उसने नहीं चाहा था कि वह इस अग्नि-पुंज से खेले.

निरीक्षण-परीक्षण की प्रक्रिया के दौरान
उसका सोच एक निश्चय में बदल गया था
कि वह इस अग्नि-पुंज को हाथ नहीं लगाएगा.

यह पावन विचार की तरह सहेज कर रखने के लिए है
धर्म ग्रंथों की तरह श्लाघ्य और पूजनीय है
छू कर कलंकित करने व होने के लिए नहीं.

आत्म-मंथन के अनेक क्षणों में उसने
अपनी रूचि को गहराई से जांचा-परखा था
और अपने जीवन की निरीहता पर उदास हो गया था.

अभावों में जीने का अभ्यस्त था वह वर्षों से
फिर भी उसने खुद को हमेशा सीधा खड़ा रखा था
यह करिश्मा था उसकी सकारात्मक सोच का.

कल्पना तो की थी उसने पर इतनी ऊबड़-खाबड़ नहीं
जिस धरती पर पाँव रखने की जगह ही न हो
वहाँ किसी स्वप्न-महल की रचना कैसे हो.

संयोग था या दुर्योग, होना तो पड़ा उसे न्यौछावर
बलि चढ़ा दी सभी महत्वाकांक्षाओं की
अग्नि-पुंज को गले लगा लिया खुद जल जाने को.

Monday, 13 August 2012

पुण्य का प्रताप Kavita 24

पुण्य का प्रताप

मुझे मिले तुम, तुम्हें मिली मैं
यह था किसी पुण्य का प्रताप.

बातों ही बातों में बात हुई
डर-डर के पहली मुलाकात हुई
एक और एक दो होंगे या नहीं
मन में छुप कर बैठा संताप.

स्वप्न खिले दिपदिपाती आँखों में
गंध घुली कसमसाती साँसों में
मौन भी जैसे हुआ वाचाल
चुप्पियों में शब्द अपनेआप.

एक अनोखा राग बन कर आए तुम
दवा की खुराक बन कर आए तुम
तन-मन के दर्द हुए ठीक सब
न रहीं चीखें, न रहा प्रलाप.

बजबजा रही हैं कुछ मिश्रित धुनें
किस लरजती तान को हम न सुनें
त्याग कर बैठे हैं अपना आप भी
हर तरफ है एक ही आलाप.

राग-वैराग की अब बात क्या
किसी जीत-हार की औकात क्या
सनसनाते संदेह ख़त्म हुए
सन्नाटों में खो गया विलाप.

Sunday, 12 August 2012

चिन्तन Kavita 23

चिन्तन

तुम गहन चिन्तक
तुम्हारे पास था विचारों का प्रवाह
तर्कशील बुद्धि से हल करते तुम
हर उठने वाले सवाल को.
सच प्रमाणित करने की
केवल एक ही राह.
तर्क से जो सिद्ध हो
वह दमकता सच
अन्यथा सब झूठ
कोई अपवाद भी नहीं.
बौद्धिकता के जाल में
उलझे हुए तुम विज्ञानवादी
तराश लेना चाहते थे
जीवन की विसंगतियों को
अपने कलाहीन, रुश्क, शुष्क
हथकंडों से, वारों से, दरकारों से.
जीवन तुम्हारे लिए विज्ञान था
जो तजुर्बों की बलि चढ़ गया
सारे फ़ॉर्मूले साबित हुए गलत
भरभरा कर टूट गया आलीशान घर.
अब एक नए घर की तलाश करो
नई ज़िन्दगी का स्वप्न रचो
नई मूर्ति की स्थापना करो
जीने के नए तौर-तरीके सोचो.
और इस सब में शामिल करो
कला की संलग्नता
नव रसों का रसीलापन
विज्ञान की निःसंगता नहीं.
जीने को जी लेते हैं सब
उम्र बढती है अपनेआप
इस में न किसी का पुण्य
और न किसी का पाप.

स्वप्न की माया Kavita 22

स्वप्न की माया

जो भी तुमने कहा था
वही कर के दिखाया
अपनी बात निभाने को
तुमने जो भी हो खोया
मैंने पाया ही पाया.

बादलों के बीच में से
धूप छन-छन गिर रही है
गली-अलियारे धुले से
फुनगियों पर रेंग रहा
विलासी गंध का साया.

रंगों की बौछार मुझे
मस्ती में दुलार रही
भीगे-भीगे डूबे-डूबे
मन के आह्वान पर
तुम्हारी प्रीत सरमाया.

खलबली सी मच रही है
दिल की दुनिया में कहीं
भगवा जो पहने थे मैंने
फूल उन पर छाप रहे हैं
तुम्हीं ने रंग बरसाया.

अब खुले हैं पाश जिनमें
मन बंधा था बरसों से
कहाँ ले जाएंगे हमको
दूर ये इस लोकमत से
दिखा कर स्वप्न की माया.

फिर से सँवारा मुझे Kavita 21

फिर से सँवारा मुझे

तुमने शव को मात्र जीवित नहीं किया
उसमे भरा यौवन का आवेश
बाँध लिए सारे हवाओं में बहते हुए
निर्द्वंद छंद
बिना किसी वाद्य के रच डाली
अपनी ही मनमानी धुन.
जितनी पुरजोशी से तुमने किया
प्यार का इज़हार
मैं तो समझ ही न पाई
वह क्या था, क्यों था, किसलिए था?
मन में उठने वाले शोर को तुमने दबाया
मुझे दिए इतने नए नाम
कि वही मुझे लगने लगे सच
भूल गई मैं मेरा असली परिचय.
द्वन्द से तुमने उबारा मुझे
फिर से तुमने संवारा मुझे.
किस अदृश्य द्वार से
तुम आए मेरे जीवन में
किसने तुम्हें भेजा है
कौन है मेरा शुभचिन्तक हितकारी?
तुमने हाथ ऊपर उठा दिए
मैंने माथा नीचे झुका लिया.