Monday, 27 August 2012

अभिशप्त Kavita 45

अभिशप्त

जैसे तुम्हारा मिलना निश्चित था
वैसे ही निश्चित था तुम्हारा जाना.
अनिश्चय की स्थिति में भी
निभाए थे हमने सारे रीति-रिवाज़.
खाने को खाई थी कसमें
जीने को जिए थे रात-दिन साथ-साथ.
हालाँकि हमें मालूम था
कि वादों का कोई अर्थ नहीं है
फिर भी किए थे
साथ जीने-मरने के वादे
जैसे उनके बिना
प्यार की रस्म अधूरी रह जाएगी.
कुछ अधूरापन न रहे
प्यार से खुद को भर लो लबालब.
पता नहीं, फिर कब मिलना हो
मिलना हो भी या नहीं.
समय की अस्थिरता के चलते
हमारे मन की स्थिरता का क्या महत्व?
हमारे बस में कुछ नहीं था
जो भी था काल के गर्त में समाया हुआ.
हम तो केवल 
प्यार करने के लिए अभिशप्त थे
सोच रहे थे
यह किसी देवता का वरदान है.
समय की धारा बहा ले गई अपने साथ
हर वरदान को, हर अभिशाप को
छोड़ गई यादों के ढेर सारे रेतकण
और कलपते हुए धूल के अम्बार.

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