Saturday, 29 September 2012

ग़ज़ल 5

ग़ज़ल 5


मैंने शामिल किया है अपने उजालों में तुम्हें
अंधेरे अब नहीं कर पाएंगे गुमराह तुम्हें.

तुम्हारी दिल्लगी करने की अदा क्या कहिए
तुम्हारी दिल्लगी की हर अदा वाह वाह तुम्हें.

हंसी-हंसी में संवर जाएगी हर बिगड़ी बात
शिकायतों के सिलसिलों की नहीं चाह तुम्हें.

तुम्हें आता है उलझना और सुलझना दोनों
किसी मुश्किल की नहीं कोई भी परवाह तुम्हें.

मुझे आता नहीं था दिल को तसल्ली देना
मेरी खुशकिस्मती ने चुना है हमराह तुम्हें.

ग़ज़ल 4

ग़ज़ल 4


मेरी साँसों में तेरे प्यार की गरमाई है
मेरी आँखों में तेरे रूप की लुनाई है.

कहाँ-कहाँ तुझे ढूँढा नहीं इन राहों में
कहाँ-कहाँ से तेरी बात चली आई है.


मैं तुझे याद करूँ या न करूँ सच है यह
तेरी खुशबू की लहर हर तरफ लहराई है.


तेरी बातों में था जो राजसी-सा याराना
मेरे कानों में मादक गूँज की शहनाई है.


तेरे बिंदास रवैये ने मुझे बाँध लिया
तेरी मासूमियत में सागरी गहराई है.


तेरा हँसना तेरा गाना तेरा वह अल्हड़पन
सच कहूं जान मेरी जान पर बन आई है.


हुआ है क्या मुझे यह कौन बताएगा मुझे
सखा सब दूर हुए तू ही अब हमराही है.

Friday, 28 September 2012

वर्तमान Kavita 66

वर्तमान

मैं हूँ और मेरा वर्तमान है
' कल ' पता नहीं कब गया
' कल ' पता नहीं कब आएगा
' आज ' में जी रही हूँ मैं
समय के असीम सहयोग से.

मैं हूँ और मेरा वर्तमान है
उच्छल तरंगों से भरा हुआ
सुर-ताल से सजा हुआ
प्रेम की कविताओं में रचा हुआ
मदमस्त खुशबू से महका हुआ.

मैं हूँ और मेरा वर्तमान है
सतरंगी रंगों से चित्रित
मखमली तारो से निर्मित
राग के खुमारों में विस्मृत
स्वप्न की उड़ानों में स्फुरित.

मैं हूँ और मेरा वर्तमान है
जिसे जी लेना भर काफी है
जिसे जी लेने भर से
पूर्ण हो रही है ज़िन्दगी
मैं हूँ स्तंभित, चमत्कृत.

भविष्य Kavita 65

भविष्य

कहते हैं न, भविष्य को किसने देखा है ?
यानि किसी ने नहीं देखा
किसी ने नहीं जाना.

फिर भी हम रहते हैं
उसे अपनी तरह से गढ़ने की
तत्परता में संलग्न.
सुनियोजित करते हैं उसकी दिशा
बुनते हैं सुनहरे सपने
बनाते हैं योजना-परियोजना
आगे आने वाले समय के लिए.

मैं जी रही हूँ निर्द्वंद.
मुझे नहीं रचना कोई भविष्य
नियन्त्रित नहीं करना
आने वाले समय को
नहीं देखना कोई सपना 
सपनों के टूटने का दर्द
मुझसे सहा नहीं जाता.

भविष्य मेरा है ही नहीं
फिर उसकी चाह क्या, परवाह क्या
उससे जुड़ा विषय मुझे खींचता नहीं
उसकी छवि क्या हो, कैसी हो
इसकी परिकल्पना से मैं दूर हूँ.
मेरा हर आने वाला कल
बदल रहा है ' आज ' में.

अतीत Kavita 64

अतीत

ऐसे कैसे पुँछ सकते हैं
बीते हुए कल की किताब पर लिखे हुए
पृष्ठ-दर-पृष्ठ
अध्याय-दर-अध्याय
जिनके अध्ययन में बीते सालों साल.
मुझे नहीं पता.

ऐसे कैसे धुल सकते हैं
बरसों के स्याह-सफ़ेद रंग
सतरंगी हों, चाहे बदरंग
जिन्होनें रचा था चित्रालय
छपे थे जो हर दरवाज़े-दीवार पर.
मुझे नहीं पता.

ऐसे कैसे खो सकते हैं
जीए हुए दिन, सारे पल-छिन
जो कभी ओढ़े और बिछाए
आग और पानी से बचाए
जिंदा रखने को जिन्हें हम मरे बार-बार.
मुझे नहीं पता.

अब नहीं है कोई अतीत
स्मृतियों के जंगल में भी नहीं.
कोई चिन्ह, कोई प्रतीक
शेष नहीं उसका अब
चर्चा उसकी बेमानी
ख़त्म हुई वह कथा-कहानी.

Thursday, 27 September 2012

तुमने मुझे चुना Kavita 63

तुमने मुझे चुना


तुमने मुझे क्यों चुना ?
मेरे साथ एक फ़िज़ूल सा सपना क्यों बुना ?
कितनी दूर आओगे मेरे साथ
निःसंकोच, निडर, निर्बाध ?

सम्मोहन के त्याग की परिणति
आच्छादित है मेरे संज्ञान पर
मैं उड़ रही हूँ हवा में हल्क़े-हल्क़े
संबंधों के भारीपन से मुक्त हो.
मेरी आत्मा पर कोई बोझ नहीं है
रिश्तों की महामारी का
किसी भी वफादारी का
मैं निर्लिप्त हूँ, निर्मोह हूँ, निर्बंध हूँ.

आत्म-रति एक सुखद स्थिति है
यह नियति मेरी अपनी चुनी हुई है
तुम्हारा आवाहन अनसुना कर दूं
इतनी भी मज़बूत नहीं मैं.

तुमने मुझे चुना
मेरे साथ एक सपना बुना
मैं कैसे न तुम्हे चुनूं ?
तुम्हारे साथ सपने क्यों न बुनूं ?

मैं वैरागी, दुनिया त्यागी
तुम्हारे मोहजाल में डूब रही हूँ
बची हुई साँसों को समेट कर
तत्पर हूँ तुम्हारे साथ चलने के लिए.

तुम्हारा देय Kavita 62

तुम्हारा देय

जितना तुमने मुझे दिया
तुम्हारे पास उतना ही था
तुमने मुझे सारा दिया
तुम्हारा सारा उतने में समाए.

धैर्य के साथ अब मुझे
बाँधना है विकल भाव को
रोकना है स्फुरित सम्भाव को
जो हर घड़ी छलकत जाए.

संभालना है तुम्हारे देय को
पूँजी है यह प्यार की
ऊष्मा से भरी हुई
तप्त संवेदना से गरमाए.

आँसुओं ने सींचा बह-बह कर
रुक्षता ख़त्म हुई अनजाने
खुल गए द्वार स्वतः ही
मनमोहिनी मुस्कान सजाए.

हमने एक-दूसरे को
चाहने का दुस्साहस किया है
वरना क्या थी मजाल पुष्प की
जो वर्जित प्रदेश में लहलहाए.

Wednesday, 26 September 2012

तुम्हारे जैसा कोई नहीं Kavita 61

तुम्हारे जैसा कोई नहीं



तुम कितना बोलते हो

शब्दों को तोलते भी नहीं.

कभी-कभी तो कर देते हो

अर्थ का अनर्थ

शब्दों को उलट-पुलट

फिर भी तुम कितने हो समर्थ

कि रच डाली पूरी ग्रंथावली

असंभावित अप्रत्याशित

लिख डाला पूरा इतिहास

जिसे जीना अभी बाकी है.


तुम्हारे चेहरे पर दमक है

दिव्य अलौकिक ज्ञान की

तुम्हारी आँखों में चमक है

सच होते संभावित सपनों की

तुम्हारे व्यक्तित्व से झांकता है

एक सुनहरा शानदार भविष्य

तुम्हारी बातों से छलकता है

अमृत जैसा जीवनदायी रस

तुम सिर्फ तुम हो

तुम्हारे जैसा कोई नहीं.

सम से सम्बन्ध Kavita 60

सम से सम्बन्ध


मुझसे दुखी रहने वाले

ज़रा हंस तो दो.


देखो, कितनी ठंडी धूप खिली है

देखो, कितना मदमस्त सवेरा है.

आओ, इस गुनगुनी सुबह का स्वागत करो

प्यार को वक़्त की पाबंदियों से मुक्त करो

आओ, सूर्य की पहली किरण को प्यार करो

क्या पता फिर आए कब ऐसी सुबह.


सरसराती पवन बह रही है मंद-मंद

लिख दो इस चन्दनी सुगंध पर कोई छंद

तुम्हारे रूठने से फूल पत्थर बन गए हैं

आओ, मुस्कुराओ, पत्थरों को सहलाओ.

पिघल उठेंगी चट्टानें भी रेशमी स्पर्श से

सुर में आ जाएंगे सारे बेसुरे सिरफिरे.


नाज़-नखरों की इतिश्री हो गई

अब है सम से समझौता

सम से सम्बन्ध

किसी विषम का नाम नहीं लेना अब तुम

सीधी-सीधी बात करेंगे

मीठे-मीठे गीत रचेंगे.

जिओ खुल कर Kavita 59

जिओ खुल कर

इतना मत कसो अपने को
कि टूट न जाएं
व्यक्तित्व के तार.
बंद द्वार थोड़ा तो खोलो
कि रोशनी की एक पतली सी किरण
भीतर आकर चमका दे
कोना कोना.
अंधेरों में जीवन को गति नहीं मिलती.
बोझिल हो जाती हैं आँखें
बुझा-बुझा रहता है मन
पथरा जाते हैं बढ़ते हुए पाँव
चट-चट चटकते हैं दिवा-स्वप्न.
अपने को बहसों में उलझाओ
कर दो भीड़ के हवाले
फेंक दो किसी बहती हुई नदी में
निःशंक, निःसंकोच.
पार लगने की कला
स्वतः सीख जाओगे
और फिर बार-बार
मझधार में कूदने के लिए जाओगे.
एक दिन यह खेल
बन जाएगा तुम्हारा पसंदीदा
खेल-खेल में खुलेंगे अर्थ
खेल-खेल में हर उल्टा होगा सीधा.
चुनौतियां ज़रूरी हैं जीवन के लिए
जिओ खुल कर, खेल-खेल में.

Tuesday, 25 September 2012

दुराग्रह Kavita 58

दुराग्रह

तुमने प्यार तो किया
पर कुछ अधूरा सा किया.

मन में कहीं कोई ग्रंथि हो जैसे
खुल न रही हो खोले से.

किसने तुम्हारे मन को रोका था ?
किसने तुम्हारी चाहत में डालीं जंजीरें ?
कौन सा भय तुम्हारे भीतर समाया था ?
कौन सी सर्द शिला जम गई थी साँसों में ?

तुमने बताया था
तुम्हारे ह्रदय पर एकाधिकार है मेरा
तुम्हारी ज़िन्दगी की डोर मेरे हाथ में है
तुम्हारे सपने सच होंगे मेरी आँखों में
तुम्हारा जीवन सँवरेगा मेरे ही सँवारे.
मेरे बिना तुम कुछ भी नहीं.

फिर ऐसा क्या था
जो न तुम्हें समझ आया, न मुझे
जो न तुम रोक सके, न मैं
जो न तुम्हारा चाहा था, न मेरा
ज़बरदस्ती बैठ गया हमारे दिलों में
दुराग्रह बन कर ?

रस भंजक Kavita 57

रस भंजक

अब जब तुम आओगे
तो बहुत सी चीज़ें बदली हुई पाओगे.

मसलन नहीं होंगे
लहरा कर चलने वाले शब्द-कीट
हमेशा मिलन के लिए तत्पर भुजा
हाँ में हाँ मिलाने वाला चापलूस हास
रिझाने में लगा उन्मत्त परिहास.

तुम्हारी शुष्क प्रकृति को
जो भी रास नहीं आता
उन सब रागों का विसर्जन ज़रूरी है.

तुम रस भंजक हो
श्रृंगार के ख़ास.
सुर-लय-ताल में
तुम्हारी कोई रूचि नहीं.

सीधी सपाट ज़िन्दगी के रहनुमां
छलछल बहती हुई
कलकल करती हुई
जलधारा तुन्हारे पास से गुजरी है
तुम्हें पूरा भिगो कर.
सूखने में उम्र लग जाएगी.

तो यह बात है ( कहानी )


तो यह बात है    ( कहानी ) (प्रकाशित : कथाबिम्ब, अप्रेल, '13)

          अभी सुबह हुई नहीं थी या पूरी तरह नहीं हुई थी कि सामने वाले घर से चीखा-चिल्ली की आवाजें आनी शुरू हो गईं. इनकी रात चीख-पुकार से ख़त्म होती है और सुबह चीख-पुकार से शुरू होती है. बड़े नियम के पाबन्द हैं ये. ये पति-पत्नी हैं या..... कहावत है न वह कुत्ते-बिल्ली का बैर वाली, तो कुत्ते-बिल्ली का बैर है इनका. मज़ा आता है इन्हें, सच कहें तो, लड़ने में. लड़ाई में भी एक रस होता है. आदत पड़ जाती है इस रसास्वादन की. न लड़ो तो लगता है, कुछ कमी है जीवन में. तो आओ चलो पूरी करें. चुन-चुन कर ऐसे शब्द लाएं जिसे सुन कर सामने वाला तिलमिला उठे. एक ही मकसद है, सामने वाले को बेइज्ज़त किया जाए, नीचे गिराया जाए. पर जिन शब्दों की मदद से उसे नीचे गिराएंगे, वही शब्द बोलने वाले को भी तो नीचे गिराएंगे ? नहीं, बोलने वाले को इसकी चिन्ता नहीं. बोलने वाला तीसमारखां है. पर यहाँ तो दोनों ही तीसमारखां हैं. क्योंकि दोनों ही बोलने वाले हैं. जो चुप हुआ, वह समझता है, उसकी हार हो गई. एक से बढ़ कर एक. हारेंगे क्यों ? लड़ाई में कोई तमगा हासिल करना है क्या ? किससे ? जो सुन रहे हैं, यानि आस-पडौसी, वो तो कोई तमगा देने वाले हैं नहीं. सारे दुखी हैं. सबकी नींद खराब होती है. सब को लगता है कि ये लोग इस शानदार कॉलोनी में रहने के काबिल नहीं. यह पढ़े-लिखे सभ्य लोगों की कॉलोनी है. सब का माहौल गन्दा होता है. सबके बच्चों पर बुरा असर पड़ता है. पर कोई इस समस्या से निबटे कैसे. असल में समस्या जिन दो की है, उन्हें खुद इससे निबटना नहीं आता. अपनी समस्या को दूसरों की समस्या बनाए हुए हैं. वैसे देखा जाए तो लड़ाई का कारण तो कोई नज़र नहीं आता. सब कुछ है घर में. अच्छे-खासे संपन्न लोग हैं. पैसे की कोई कमी नहीं. बुद्धि की कमी ज़रूर लगती है. अब पैसे से तो बुद्धि खरीदी नहीं जा सकती. यूं नाम का पट्टा टांगा हुआ है घर के दरवाज़े पर जिस पर लिखा है-- एस एल शर्मा एल एल बी. उसके नीचे एक और नाम है-- एम शर्मा एम एस सी. एस एल शर्मा यानि पति और एम शर्मा यानि पत्नी. यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि नाम के पट्टे पर नामों के आगे डिग्रियां लिखवाने की क्या ज़रुरत थी ? ताकि लड़ने से किसी को यह न लगे कि अनपढ़-गंवार हैं ? पता था कि लड़ेंगे ही लड़ेंगे इसलिए यह प्रबंध करना ही था ? भई खूब, बहुत खूब.
          एम शर्मा चाहे एम एस सी है पर करती-धरती कुछ नहीं. गलत, यह मैंने क्या, कैसे और क्यों कह दिया ? सारा घर वही संभालती है. नौकर हैं पर नौकरों से भी काम करवाना होता है. बाहर जा कर काम करने को ही तो काम करना नहीं कहते. घर के काम की भी पूरी महत्ता है. और हाँ, दिन भर कॉलोनी में घूमती है, पति के काम पर चले जाने के बाद. आस-पड़ोस में बातें करने का शौक है उसे. किसी की भी कॉल बेल बजा कर अन्दर घुस जाती है. छोटे शहर या छोटे मोहल्ले से यहाँ शिफ्ट हुए लगते हैं ये लोग. वरना कॉलोनी में मजाल है कि दूसरा कोई इस जैसा हो. महीनों सूरत नहीं नज़र आती लोगों की. बस कोठी का गेट खोला, कार में बैठे और छूमंतर. न किसी से हेलो, न हाय. लम्बी बातचीत का तो मतलब ही कोई नहीं. फुर्सत किसे है ? वैसे भी गली-मोहल्लों के ज़माने अब ख़त्म हुए. काकी-चाची कहने के दिन अब बीत गए. बस घर के भीतर दरवाज़े बंद करके बैठो. टी वी देखो या कम्प्यूटर करो. या किताबें पढो. किताबें आजकल कौन पढता है ? किताबों की परम्परा धीरे-धीरे समाप्त हो रही है. नहीं तो दिन भर सोते रहो. अन्दर बैठ कर जो मर्ज़ी करो, बाहर निकलना, निकल कर अडोस-पड़ोस में झांकना असभ्यता की निशानी है. सामाजिकता चाहिए, दुनियादारी चाहिए तो अपने चुनिन्दा लोग हैं न मिलने के लिए, अपनी पसंद के लोग, अपने मित्र, अपने सम्बन्धी, जिन्हें समय-समय पर आमंत्रित करके पार्टियां करो या उनकी पार्टी में जाओ, लेकिन अनामंत्रित नहीं. अपनी पसंद के चुनिन्दा लोगों से भी मिलने के लिए बिना बताए उनके घर धावा बोलना आजकल का रिवाज़ नहीं है. वही, असभ्यता की निशानी. बाहर जाना ही है तो फिल्म देखने जाओ, होटल में खाना खाने जाओ, मौल में घूमने या खरीदारी करने जाओ. कहीं भी जाओ पर पड़ोस में मत जाओ. पडोसी को हमने चुना नहीं है, वह हमारी पसंद का नहीं हो सकता. ये सब बातें कॉलोनी के दूसरे लोग जानते और मानते हैं पर एम शर्मा नहीं मानती. वह इतने पचड़ों में नहीं पड़ती. उसका अपना मन ही सब कुछ है. उसका मन किसी से बोलने का है तो बोलेगी ही. बेल बजने पर लोग दरवाज़ा खोल देते हैं, अन्दर आने देते हैं, सभ्यता का तकाजा है. यही कारण है कि सारी कॉलोनी की खबर एम शर्मा को है और उसकी खबर सारी कॉलोनी को. आम खबर तो आम खबर, उसकी तो ख़ास ख़बरें भी किसी से छुपी नहीं हैं. वह खुद बता देती है. इसमें शर्म की क्या बात ? क्या लोग सुनते नहीं हैं जब उनके घर में धूम-धड़ाका होता है बोल-बमबारी का. एस एल शर्मा, एल एल बी और एम शर्मा, एम एस सी, दोनों अपनी आवाज़ की बुलंदी पर होते हैं. शब्दों की रफ़्तार इतनी तेज़ कि सुनने वाले को एकाएक तो समझ ही नहीं आता कि बोल क्या रहे हैं. बस, लड़ रहे हैं, यही समझ में आता है. इतना ही काफी है आस-पड़ोस के दुखी होने के लिए. कोई उनके लड़ने से दुखी क्यों होने लगा. लड़ाई की आवाज़ किसी तक न पहुंचे तो कोई दुखी नहीं, फिर वे चाहे लड़ें-मरें, डूबें-तरें, कुछ भी करें.
          तो एक दिन एम शर्मा ने मेरे घर की कॉल बेल बजाई. घंटी की आवाज़ सुनना ही मेरे लिए अनपेक्षित था. मैंने दरवाज़े की जाली से झाँक कर देखा. अरे रे रे, यह तो वही है, इसे ज्यादा मुंह नहीं लगाना. फ़ालतू की बातों में मुझे कोई रूचि नहीं. मैंने अनसुना किया. कुछ पल के इंतज़ार के बाद उसने फिर घंटी बजाई. साथ ही आवाज़ भी लगाईं, आंटी.... आंटी.... कैसे न खोलती ? मुझे दरवाज़ा खोलना ही पडा.
          ' आइए मिसेज़ शर्मा,' मैंने मुस्कुरा कर उसका स्वागत किया. यूं तो वह पहले भी कई बार मेरा हालचाल पूछने के बहाने आ चुकी थी और मैं बेमन से हंस-हंस कर उसका स्वागत कर चुकी थी.
          ' मैंने डिस्टर्ब तो नहीं किया ? '
          ' नहीं.... नहीं.... ' मैंने झूठ बोला.
          ' मैंने सोचा, आंटी से मिले बड़े दिन हो गए. आप ठीक तो हो ? कोई परेशानी हो तो मुझे बुला लिया करो.' बोलती वह बहुत मीठा है. सिर्फ दूसरों से. अपने घर में नहीं.
          ' मैं ठीक हूँ, मिसेज़ शर्मा.... '
          ' आप मुझे मेरे नाम से बुलाया करो, मधु. मैंने कितनी बार कहा है आपसे. आपकी बेटी की तरह हूँ मैं.'
          अब यह और दिक्कत है यहाँ. बात करो सो करो, रिश्तेदारी भी बनाओ. इस मामले में मैं एकदम खालिस सभ्य. मैं रिश्तों के संबोधन से न किसी को बुलाती, न किसी के द्वारा अपने को बुलाया जाना पसंद करती. रिश्ते होते हैं छोटे शहरों में, पुराने मोहल्लों में, जहां एक दूसरे के घरों में बाकायदा दखलंदाजी की जाती है. मुझे गुरूर है कि मैं एक महानगर में रहती हूँ, महानगर के भी पौश इलाके में. जो भी हो, मिसेज़ शर्मा से तो मुझे हंस के ही निबटना था. मैंने कहा, ' हाँ मधु, बताओ, कैसी हो ? '
          ' अब कैसी हो सकती हूँ आंटी, ऐसे आदमी के साथ ? '
          ' बोलने में तो तुम भी कम नहीं हो. आवाज़ तुम्हारी भी ज़ोरदार है. क्यों बहस पर बहस किए जाती हो ? तुम्हारा पति वकील है. उससे जीत पाओगी तुम ? '
          ' बहुत कोशिश करती हूँ, न बोलूँ, न बोलूँ, पर कब तक ? आखिर बोलना ही पड़ता है. आप ही बताओ, मैं क्या करूँ ? '
          ' देखो मधु, हर समस्या का आपस में बात करके हल निकाला जाता है. तुम अपने पति से आराम से बात करो, कहो, कोई तो निष्कर्ष निकालना पडेगा. आखिर सारी उम्र तुम लोग लड़ते कैसे रह सकते हो ? '
          ' मैंने कई बार बात की है पर यह सुनना ही नहीं चाहते.'
          ' तुम ही उनकी बात मान लो. जो वो कहते हैं, वैसे कर लिया करो.'
          ' अरे यह तो हर बात में नुक्ताचीनी करते हैं. कोई कब तक चुप रहे ? '
          ' तुमने इतनी पढ़ाई की है. कहीं नौकरी कर लो. जितनी देर बाहर रहोगी, इस किच-किच से तो छूटी रहोगी.'
          ' लो कर लो गल्ल. आंटी, तुसी बी कमाल करदे ओ. साड्डे कोल इन्ना पैसा ऐ, मैनूं की लोड ऐ बाहर जाकर कम्म करन दी ? '
          ' तुम्हारा अकेले दिल भी नहीं लगता न ? '
          ' मैं अकेली कहाँ हूँ ? आप सब हो न मेरे साथ. सच आंटी, मैं रात-दिन के झगड़े के कारण बहुत परेशान रहती हूँ. इस झगड़े से मुक्ति पाने का कोई उपाय बताओ.'
          ' तुम ऐसा करो,' मैंने मुंहफट हो कर बोल दिया, ' तुम शर्मा जी से तलाक ले लो.'
          ' हैं.... ' वह चौंक पड़ी, ' आंटी, हम इज्ज़तदार लोग हैं, हमारी मानसिकता बड़े शहरों की जैसी नहीं है. यह तो हो ही नहीं सकता. इस मामले में हम बहुत दकियानूसी हैं.'
          मैं क्या उत्तर देती. चुप रही. मुझे वास्तव में ऐसा नहीं कहना चाहिए था. यह कोई समाधान तो नहीं कि जहां पति-पत्नी के बीच में लड़ाई हो, वहाँ तलाक ले लो...... पर इन लोगों की लड़ाई कोई ऐसी-वैसी लड़ाई नहीं, सारी कॉलोनी सुनती है, फिर रोज़ का मामला है, कभी-कभी का नहीं, निर्लज्जता की हद तक पहुंचा हुआ.
          कहा मैंने यह, ' अन्य कोई हल भी तो नहीं है..... तो बस, यूं ही मज़े लो, तुम लोग लड़ कर, हम लोग सुन कर.'
          ' क्या आंटी, आप भी बस..... आपको मज़े सूझ रहे हैं और मेरी जान पर बन आती है.'
          ' मधु, कभी अन्तरंग क्षण में मनाओ उन्हें..... '
          ' न, न, मैं तो उन्हें हाथ भी नहीं लगाने देती. घिन हो गई है मुझे उनसे.'
          अब करने के लिए और कोई बात नहीं थी. उसकी भड़ास निकल चुकी थी. वह चली गई, मेरे लिए सिरदर्द छोड़ कर.
          अब कोई सोचे, यह अलग-थलग रहने की सभ्यता-संस्कृति अच्छी है या आस-पड़ोस में बिना बुलाए घुस कर दखलंदाजी करने और करवाने की ? न खुद चैन से रहो, न दूसरों को रहने दो. खुद तो अपनी मूर्खता में जी ही रहे हो. दूसरों को भी शामिल कर लो दुखी करने के लिए. अरे भई, दूसरे लोग खाली नहीं बैठे, सब अपने-अपने कामों में लगे हुए हैं. कहाँ किसी के पास फुर्सत है दूसरों के पचड़ों में पड़ने की. पहले का ज़माना अब नहीं रहा, जब पूरा मोहल्ला एक घर-परिवार की तरह रहता था. क्योंकि तब हरेक के पास इतने काम नहीं हुआ करते थे. कल से आज की कोई तुलना की ही नहीं जा सकती. ज़माना बदल गया है. समझो इस बदलाव को, मेरी प्यारी पुत्री-समान मधु. तुम क्या आईं, मेरे मूड का बेडा गर्क हो गया.

          मैं अपने घर के आँगन में खड़ी पौधों को पानी दे रही थी. मुझे एक ड्राइवर की तलाश थी. कई रख कर देखे पर कोई जमा नहीं. ड्राइवर रखना तो सच कोई मजबूरी हो, तभी कोई रखे. लगता है, एक टुच्चे से कमरे में घटिया खुशबू का तेल बालों में लगाए एक अवांछित तत्व आपके साथ बैठा है. मैं स्वयं इतनी अच्छी ड्राइवर हूँ पर मजबूरी, बिजनेस के कारण कभी ड्राइवर को इधर-उधर सामान के साथ अकेले भेजना पड़ता है. इसीलिए ढूंढ रही थी एक ड्राइवर, जिसके हाथों में कार बेफिक्र होकर छोड़ी जा सके.
          अचानक मेरी निगाह सामने गई, मधु का ड्राइवर उनकी गाडी साफ़ कर रहा था. मैंने उसे बुलाया. क्या बात है, बड़ी खुशबुएँ मार रहा है यह तो. इतना परफ्यूम लगा कर आता है. मैं अपने ड्राइवर को कभी इस बात की इजाज़त नहीं दूँगी. मैंने उससे कोई ड्राइवर बताने के लिए कहा. उसने पूछा, ' कितनी तन्ख्वाह दे देंगी ? एक है अनुभवी ड्राइवर, पर सैलरी ज्यादा लेगा.'
          ' कितनी ज्यादा ? ' मैंने कहा, ' गाड़ी ठीक चलानी आती हो. जो भी तर्कसंगत होगा, दे दूँगी.'
          वह सोचने लगा. मैंने उस से उसकी तनख्वाह के बारे में पूछा, ' तुम्हे कितनी मिलती है, बताना चाहो तो..... '
          ' मेरी तनख्वाह बहुत अच्छी है. साहब ने जो तय किया, वह तो देते ही हैं, मेम साहब भी खुश हो कर कभी हज़ार, कभी दो हज़ार दे देती हैं.'
          तो यह बात है. मधु जी, तुसी ग्रेट हो।

Sunday, 23 September 2012

रंग भर लूं चित्र में Kavita 56

रंग भर लूं चित्र में

अभी मुझे सजानी हैं सूनी दीवारें
अभी मुझे बुहारनी है धूल और गंदगी
अभी मुझे भरना है मृत दिलों में जोश
अभी मुझे करना है ज्ञान का संचार.

अभी मैं वापस लौट नहीं सकता
अभी बहुत काम बाकी है यहाँ.

अभी मुझे लिखना है एक नया गीत
अहम् के बलिदान का
अभी मुझे रचनी है एक नई कविता
सृष्टि के निर्माण की.

अभी तुम्हे प्रतीक्षा करनी होगी
पेड़ों पर नए फूल-पत्ते उगेंगे जरूर.

अभी करना है नए सूरज का इंतज़ार
अभी बैठना है एक नए अनशन पर
अभी आवाज़ उठानी है मुझे जोर से
अभी लगाने हैं नारे अपनी आज़ादी के.

तुम मनाना जश्न पर ठहरो ज़रा सी देर
रंग भर लूं चित्र में बेरंग जो था आज तक.

जकड़न Kavita 55

जकड़न


मैं बहुत बंधा हुआ महसूस कर रहा था
एकदम जकड़ा हुआ
जैसे धकेला जा रहा हूँ मैं
उसके द्वारा, उसकी तरफ
या वह खींच रही है मुझे
जोर-ज़बरदस्ती अपनी तरफ.
यह भी कोई प्यार हुआ ?
ज़रा भी सांस लेने की जगह
नहीं छोड़ी उसने.
ठीक है, मैं उसे चाहता हूँ
पर मैं खुद को भी तो चाहता हूँ
मुझे उससे बातें करना अच्छा लगता है
पर मुझे खुद से भी तो
बातें करना अच्छा लगता है
मैने एक खुशहाल घर का सपना देखा है
पर उस घर में एक कोना मुझे भी तो चाहिए
ऐसा कोना जो सिर्फ मेरा हो
जहां मैं जो चीज़ जैसे रखूँ
वह मुझे वैसे ही मिले
बिना किसी उथल-पुथल के.
वह समझती क्यों नहीं ?
प्यार ज़बरदस्ती नहीं पाया जा सकता
ज़बरदस्ती यदि कोई करे भी तो
वह प्यार न हुआ, खानापूरी हुई
मैं डरता हूँ
वह मुझे खो देगी इस तरह
मैं भी तो उसे खो दूंगा इस तरह
मैं उसे खोना नहीं चाहता
पर मैं खुद को भी कैसे खोऊँ ?
पता नहीं वह क्यों नहीं समझती ?
वह ऐसी क्यों है ?
मैं उसे कैसे समझाऊँ ?
समझा चुका हूँ बार-बार
पर वह समझना नहीं चाहती
कि प्यार एक उन्मुक्त पंछी है
इसे बांध कर रखोगे तो यह
पिंजरे में कैद पंछी की तरह फड़फडाएगा
खुला छोड़ दोगे तो
वापस लौट-लौट कर
अपनी ही मुंडेर पर आएगा.

Saturday, 22 September 2012

आओ मेरे साथ Kavita 54

आओ मेरे साथ


आओ मेरे साथ
हाथ में दो हाथ
और तबाह हो जाओ
बिना किसी उत्सव के.

यह मौसम किसी त्यौहार का नहीं
यह रिश्ता किसी व्यवहार का नहीं
समय के श्रृंगार का नहीं
वक्त की मनुहार का नहीं.

डूबने का मन है तो चलो डूबें
मरने का निश्चय किया है
तो आओ मरें
यह बरबादी का आयोजन है.

यह रास्ता किसी
सृजन की तरफ नहीं जाता.
यह अवस्था किसी
जीवन का अंदेशा नहीं
यह भावभूमि किसी
रस को जन्म नहीं देगी.

मिलन का एक अद्भुद क्षण
साँसों पर लिखी सरगम
काफी है खुद को मिटाने के लिए.

तुम ही आना Kavita 53

तुम ही आना

तुम आकाश की बुलंदियों पर बैठे हो
मेंरे हाथ तुम्हे छू नहीं सकते
मैं इतना ऊंचा उड़ नहीं सकती.

कभी दिखते हो पास
पास जाती हूँ तो और दूर हो जाते हो
और दूर जाने पर और दूर चले जाते हो
जैसे मृग मरीचिका हो.

मैं थक जाती हूँ भागते-भागते.
रिसते हुए घावों
और बुझती हुई आस के साथ
मैं हताश बैठ जाती हूँ.

मैं कैसे आऊँ तुम्हारे पास
न कोई राह है, न रस्म है
प्रयासों की निरंतरता से
शक्तिहीन हो चुकी हूँ मैं.

तुम ही आना आ सको तो
और बिछ जाना पानी सा
तपते झुलसते सहरा पर
ओस की अनेकों बूँदें बन
बरसों के प्यासे दहरा पर.

Tuesday, 18 September 2012

शब्दों के प्रवाह ( कहानी )

शब्दों के प्रवाह ( कहानी )


          इस बार का भारत आना उसे वापस यू एस नहीं लौटने देगालगा उसे यही थाउसने मनु को लिखा भी , ' दिल्ली पहली बार नहीं  रहा ूँसिन्डीपर इस बारलगता हैतुमसे मिलने के बाद मैं वापस नहीं लौट पाऊंगा.'

          ( उसने मनु को कभी ' मनु ' नाम से नहीं बुलायाजबकि सब उसे ' मनु ' नाम से ही जानते थेमनु यानि मानसीपूरा नाम मानसी जोशीरोज़ नए-नए नामों से पुकारना उसे अच्छा लगता थाकई -मे के आदान-प्रदान के बाद जब पहल बार उसके मन में लगाव जागा तो उसने उसे नाम दियासिन्ड्रेलाऔर उसे छोटा करके ' सिन्डी ' वह उसे आम बुलाने लगा थालेकिन कब उसकी उँगलियों से कौन सा नय नाम फिसल जाएगायह मनु नहीं जानती थीपर वह जिस भी नाम से बुलातामनु को अच्छा ही लगता .
          और उसका नाम था अनुपमपूरा ाम अनुपम सरकारवह नज़दीकी लोगो में ' अनु ' नाम से जाना जाता थादोनों को दोस्ती की शुरुआत में नामों में साम्यअनुमनुबड़ा अर्थपूर्ण लगा थाअनुपम ने लिखा भी था, ' सी  कनेक्शनहमारे नामों मे झंकार एक ही है.'
          ' वाह वाहवॉट एन एक्सप्रेशन,' मनु ने उत्तर में लिखा था.
          ये थे उनकी ऑन लाइन दोस्ती के शुरूआती दिन.)
                    
          ' क्यों ? मैं क्या तुम्हारे पांवों में बेड़ियाँ डाल दूँगी ? नहींमेरे दोस्तएक बार आओर्शन दो और वापस जाओ,' मनु ने िखा था उसी सहजता सेजो सहजता उन दोनों के बीच में स्थाई भाव की तरह व्याप्त हो गई थी 
          ' दर्शन दो घनश्याम श्याम मोरी अँखियाँ प्यासी रे ? ' उसने मज़ाक किया थायह उसका बात करने का अंदाज़ थाबातों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना.
          ' चलोचलोऐसा कुछ नहीं है तुम मुझे देखोगे तो तुम खुद  यहाँ से भागने की सोचोगे.'
          ' क्योंमेरी चहकती हुई चिड़ियाऐसा क्यों सोचती हो ? '
          ' क्योंकि...... क्योंकि मैं बहुत काली हूँ......'
          अनुपम को यकीन नहीं आयापहले भी मानसी ने यह लिखा था और उसन यकीन नहीं किया था.
          ' ओह होमेरी कोयलकितना मीठा गुनगुनाती हो तुम......'
          ' मैं बहुत मोटी हूँ......'
          अनुपम को फिर यकीन नहीं आयापहले भी मानसी ने ऐसा लिखा था  उसने तब भी यकीन नहीं किया था.
          ' ओह होमेरी नूरजहाँमुझे ज़र आने दो वहाँ......'
          ' मैं ज़रा भी सुन्दर नहीं हूँ......'
          अनुपम को यकीन आना ही नहीं थापहले भी मानसी ऐसा लिख चुकी  लेकिन उसने यकीन क्यों करना .
          ' ओह होमेरी लैलातुम्हारा ्रदय बहुत सुन्दर है......'
          ' मैं सच कह रही हूँ...... तुम देख कर मुझे बिलकुल पसंद नहीं रोगे......'
          उसे मानसी के कालीमोटीअसुन्दरसुन्दर होने से कुछ मतलब ही नहीं था.
          ' लिसेन माय प्रिंसेसतुम देखने की चीज़ नहीं होमहसूस करन की चीज़ हो......'
          ' यानि चीज़ हूँ मैं ? '
          ' देखोमुझे शब्दों के जाल में  उलझाओमेरी शब्द-विशेषज्ञा...... और सुनोहर समय यह असुन्दरता का राग आलापना छोडोमुझे आने दो वहाँमैं तुम्हारा मानसी होना भुला दूंगामानसी हो इसीलिए सुन्दर नहीं हो  ? मेरी सिन्डीतुम अपने को मेरी नज़रो से देखोतब जानोगी कि तुम कितनी सुन्दर हो.'
          ' अरे रे रेघबराओ नहींइतनी भी बुरी नहीं हूँआय' वेरी स्मार्ट.'
          ' लेकिन मेरे सामनेमेहरबानी रकेअपनी कोई स्मार्टनेस मत दिखानामुझे तुम्हारा सहजसरल ्यवहार चाहिएजो तुम होअपने वास्तविक रूप में.'         
          वे दोनों -मेल पर चैट कर रहे थे.

          ( यह सब कुछ मानसी उससे पहले भी कह चुकी थी लेकिन उसने इन बातो की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया उसे हर बार लगाया तो मानसी विनम्रतावश ऐसा लिख रही है या उसे खिजाने के लिएवरना इतने ुन्दरइतने आकर्षकइतने बाँध लेने वाले पत्रों को लिखने वाली असुंदर कैसे हो सकती है ? वैसे भीबाहरी सौन्दर्य से ज्यादा वह आंतरिक सौन्दर्य को महत्व देता थावह मानसी से पत्र-व्यवहा के बाद से स्वप्नलोक में रहने लगा थाजिसमें किसी भी बदसूरती की कोई गुंजाइश नहीं थीधीरे-धीरे मानसी एक स्वप्न-सुंदरी के रूप में बदलती गई थी और उसक कल्पना की उड़ान ऊंची से ऊंची होती गई थीउसके ह्रदय में बरसों से दबी हुई प्रेम-लहरियां झंकृत होने लगी थींइसी का परिणा था कि उसकी उँगलियों से  मेल पर मानसी के लिए हर क्षण नए-नए नाम बिछलते रहते थेमानसी के लिए भी शब्दों की दुनिया ने सपनों की दुनिया का रूप ले लिया थाकितना आसान है यूं मस्त होकर जीनादोनों को लगताएक बार मानसी ने अनुपम को लिखा था, ' हमारा यह स्वनिर्मित संसार कितना अच्छा हैकिसी बाहर वाले  दखल नहीं.'
          ' सच सिन्डीयह स्वप्नलोक अद्भुद हैअपनी पसंद के चरित्रों का निर्माण करोअपनी पसंद के ूपाकार गढ़ो और उनके साथ रहो.'
          ' हाँ अनुबाहर अपनी पसंद के ोग नहीं मिलतेअपनी पसंद के लोगों की रचना हम अपने स्वप्नलोक में करते हैं और उनके साथ पूरी ज़िन्दगी जीते हैंपूरी शिद्दत के साथहम कभी साक्षात नहीं िलेंगे अनुवरना हमारा यह स्वप्नलोक टूट जाएगाबिखर जाएगा.'
          ' हाँ सिन्ड्रेलाहम केवल अपने सपनों की दुनिया में मिलेंगेमिलते रहेंगेयहाँ हमारा अपना शासन चलता हैकिसी को हमारे प्यार के बारे में कुछ नहीं पताहम एकदम सुरक्षित हैं.'
          लेकिन जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा और उनके लिखने की रफ़्तार तेज़ ुईवे दोनों ही साक्षात मिलने के लिए विह्वल हो उठे.)
       
          मनु चुप रही तो अनुपम ने आगे लिखा, ' पाँवों में तो नहींमन में ेड़ियाँ ज़रूर डाल दोगीमुझे गता है क़ि तुम मेरे सारे निश्चयसारे नियमतपसब भंग करने वाली हो.'
          ' शट अपभारतीय कन्या का थोडा तो लिहाज करोजो मुंह में आता हैबोल देते हो.'
          ' भारतीय कन्या यानि......'
          ' संकुचित......'
          ' यानि......'
          ' पुरातनपंथी......'
          ' यानि......'
          ' तुम्हारी तरह नहीं......'
          ' तो अब भारतीयता के नाम पर मुझे डरा रही हो ? माय ब्यूटीफुल सिन्ड्रेलायोर हार्ट इज सो ब्यूटीफुलयोर ब्रेन इज सो ब्यूटीफुलमुझे तो ऐसा लग रहा है ़ि मेरे दिल्ली आते ही तुम कहीं मेरा अपहरण  कर लोसच बताओकोई ऐसी योजना तो नहीं ? '
          ' और मुझे यह डर है क़ि मिलने  बाद हमारे बीच दोस्ती भी रहेगी या नहीं ? अनुदोस्ती में क्लोसूरत की तो कोई अहमियत नहीं होती ? बोलोअनुकहीं ऐसा तो नहीं कि तुम मिलने के बाद दोस्ती भी  रखो ? सच कहूंमुझे देखने के बाद तुम्हारा दिल तो टूटने ही वाला है.'
          ' इस दिल के टुकड़े हज़ार हुएऐस ही ना......'
          ' हाँ......'
          ' मेरे दिल की चिन्ता तुम मत करमैं तुम्हे देखने नहींतुमसे मिलने  रहा हूँऔर जैसा ि तुमने कहा थामैं आँखें बंद करके ही तुम्हे देखूँगा.'

          ( आँखें बंद करके देखने की बात दोनों के बीच पहले हुई थी संयोग से.
          एक बार मानसी ने किसी अन्तरंग क्षण में लिखा था, ' अनुतुमने सचमुच मुझे हिप्नोताइज़ किया हुआ हैहर जगहहर घडी सिर्फ तुम ही तुमतुमसे अतिरिक्त तो मैं कुछ सोच ही नहीं पाती.'
          ' अच्छा ? तो मैं हर घडीहर जग कहाँ-कहाँ घूम रहा हूँ तुम्हारे साथ ? '
          ' कल मैं किसी रिश्तेदार के घर डिनर पर गई थीहम बाहर के कमरे में बैठे थेभीतर के कमरे में कुछ लोग ड्रिंक कर रहे थेअचानक मुझे सुनाई पड़ा कि तुम भी  वहाँ और बहुत बोल रहे होबहस पर बहसकितना बोलते हो तुममैं तुम्हारी आवाज़ पहचान सकत हूँ अबमैंने तुम्हे वहाँ बाकायदा बोलते हुए सुनाअनुमैं वहाँ तुम में ही डूबी रहीइतन बेचैन हो उठी कि मन हुआपार्टी बीच में ही छोड़ कर घर लौट आऊअब मैं तुम्हारे बिना कोई पार्टी कैसे अटेंड कर पाऊंगी ? मै जहां भी जाती हूँतुम मेरे ाथ होते होअब मैं तुम्हारे बिना क्या हूँ ? कुछ भी नहीं.'
          '  माय डांसिंग क्वीनऐसी बातें करके तुम यहाँ मेरा जीना दुश्वार कर दोगी...... अच्छा बताओअगर तुम मुझे हिप्नोताइज़ करोगी तो क्या करोगी ? '
          उसका जीना जैसे सच में दुश्वा हो गया होउसने अपने कार्यक्रम में भारी फेरबदल किया था ताकि वह जल्दी से जल्दी भारत  सकचाहे कुछ दिनों के लिए ही सह.
          ' मैं......? मैं तुमसे कहूँगी कि अपनी आँखें बंद करो और मुझे देखो.'
          ' ओह सिन्ड्रेलायू आर सो ब्यूटीफुल...... माय आइज़ आर क्लोज् एंड आय' सीइंग यू.' अनुपम ने तब लिखा था.
          कैसे बौराए-पगलाए से रहते थे वे दोनोंशब्दों में कितनी ताकत होती है ! शब्द किसी भी हथियार से ज्यादा घायल कर सकते हैं और किसी भी मरहम से ज्यादा दवा का काम कर सकते हैंकेवल शब्दशब्द और सिर्फ शब्दशब्दों ें छुपे हैं केवल सपनेसपने और सिर्फ सपने.
          पिछले दो महीनों से प्यार का ही मूड चल रहा था दोनों के बीच. हाँकेवल दो महीने हुए थे उन्हें एक-दूसरे के संपर्क में आए पर लगता था जैसे वे बरसों से एक-दूसरे को जानते होंअनुपम को भारत आना तो था ही पर उसने समय से पहले ही आने का कार्यक्रम बन लिया था.)

          मानसी ने कुछ नहीं लिखा.
          ' मेरी अनारकलीयह बताओअपने सलीम को लेने तुम एअरपोर्ट तो ओगी ना ? '
          ' औफकोर्सफ्लाइट बुक हो जाने पर बता देनापर देखोतुम इस रह के नामों से मुझे  बुलाया रोमुझे शर्म आती है,' मनु ने लिखा.
          ' ओह होमेरी भारतीय कन्या...... ओकेबायसाइन आउट करता हूँ.' अनुपम ने चैट बंद कर दिया.

          यह पहली बार नहीं था जो वह इस देश में  रहा थाबल्कि वह इस देश का ही थाबस नौकरी के चलत अमेरिका में बसा हुआ थाउसके माता-पिता दिल्ली के अपने पुश्तैनी मकान में रहते थेउसने बहुत चाहा था कि माँ-बाप उसके साथ अमेरिका में रहेंउन्हें बहुत समझायाअनेक तर्क-वितर्क दिए परन्तु उनके लिए अपनी धरती को ोड़ कर जाना संभव  थाइसलिए भी कि उस दूर देश में अपनी भाषा ोलने-समझने वाले उनके हमउम्र कहाँ मिलेंगे ? यहाँ चाहे वे रोज़ किसी से  बोलें पर एक तसल्ली तो है कि सारे अपने जैसे ही लोग हैंउसकी विवशता थी नौकरी की, ज्यादा पैसा कमाने की या बस आद पड़ गई थी वहाँ रहने की कि वह एक बार वहाँ गया तो बस वहीँ का हो कर रह गयाउसने सोचा ही नही कभी वापस अपने देश लौटने के ारे मेंबीच-बीच में वह आता रहता हैएक वर्ष में दो बार तो ता ही आता हैबीस-पच्चीस दिन हता हैऔर फिर वापस अपने देशहाँकहने को अब वही उसका देश हालांकि वह ऐसा कहना नहीं चाहतादेश-भक्ति की भावना आड़े आत हैपर करे क्यासच तो यही  कि वह कुछ दिन यहाँ बिता कर पने देशदेश नहींअपने घर वापस चला जाता हैअब तो अनेक वर् हो गए उसे वहाँ रहतेउसने वहाँ की नागरिकता भी प्राप्त कर  हैअब उसका स्थायी रूप से भारत लौटने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता.
          उसकी ज़िन्दगी वहीं बनी और वहीं बिगड़ीअगर इसे बिगड़ना कहा जाए तोएक वर्ष नौकरी में गुज़ारने के बाद उसने वहीं की यानि िदेशी लड़की से शादी की थी और एक वर्ष बाद अलग भी हो गया थाकैसा दबदबा था उस गोरी लड़की काद्यपि उसका दिल और दिमाग भारतीय संस्कारों से लबालब भरे हुए थेफिर भी बाहरी आकर्षण को वह नकार नहीं सका थापारिवारिक असंतोष और हस्तक्षेप के बावजूद उसन अपने मन की राह चुनी थी लेकिन कोशिशें करने पर भी वह उस राह पर दूर तक नहीं चल पाया थातला लेने के बाद घरवालों ने बहुत जोर दिया क़ि अपने देश लौट कर हाँ की किसी लड़की से विवाह कर  लेकिन किसी  किसी काम के चलत यह यूं ही टलता रहाऔर अब तो इस बात को इतना समय गुज़र चुका था क़ि दोबारा शादी करना उसे ंझट जैसा लगने लगा थावह खुश मस्त थाभागदौड़ भरी ज़िन्दगी में उसे शादी की गुंजाइश भी नज़र नहीं आती थीजीना ही तो जैसे भी जीने की आदत पड़ जाए, आदमी जी लेता हैवह जिस भी हा में थासंतुष्ट थाविवाह जैसी चीज़ से उसका भरोसा भी उठ गय था.

          यह एक संयोग ही था कि इंटरनेट पर अनुपम और मानसी की बातचीत ुरू हुई.

          अपने खाली वक्त में वह कुछ-कु लिख लेता थाबस शौकिया तौर हैरानी की बात यह थी कि बरसो अमेरिका में रहने के बावजूद  हिन्दी में लिखता थाकविताकहानी या डायरीनुमा कुछवह इस लेखन को कहा करता था स्वान्तः ुखायकभी-कभी अपने दो-चार भारतीय मित्रों के साथ होने वाली बैठकों में उसने अपना लिखा हुआ सुनाया था और ' वाहवाही ' बटोरी थीबाद में तो मित्र स्वयं उससे रचना सुनाने का आग्रह करने गे थेमित्रों को अच्छा लगता विदेश में रहते हुए अपनी भाषा से इस प्रकार जुड़नाअनुपम की हिन्दी में लिखी रचनाओं में अपने देश की मिट्टी की सोंधी मह हो जैसेविदेश में रहते हुए अपने देश की हर छोटी से छोटी चीज़ खींचती है अपनी ओर.
          एक दिन अनुपम ने देखा कि उसके पास उसके लिखे हुए पन्नों का ेर लग चुका हैएकाएक उसका मन ुआ कि क्यों  इन्हें पुस्तक रू में छपवाया जाएउसके मित्रों की भी यही राय थी कि वह अपनी ारी रचनाओं को पुस्तकाकार छपवाएलेकिन अमेरिका में रहते हुए िन्दी में पुस्तक छपवाने की बात उसे नाउम्मीदी ही लगीयहाँ कौ सा प्रकाशक होगा ऐसाइसकी अनुपम को कोई जानकारी नहीं थीउसके मिलने-जुलने वालों के दायरे में  कोई हिन्दी वालों के संपर्क में था हिन्दी लिखने वालों केइसके लिए उसका अपने देश की ओर रुख करना स्वाभाविक थाभारत में माता-पिता एवं रिश्तेदारों के सिवा उसके सारे संपर्क धुंधलाए हुए थेपंद्रह वर्ष  अधिक होने को आए थे उसे यहाँ रहते हुएउसे किसी ऐसे भारतीय मित्रजानकार का नाम ध्यान नही आया जो इस मामले में उसकी मदद कर सकेमाता-पिता उस उम्र में थे कि उनके बस का नहीं था इस िशा में कुछ करनाउसने इस सम्बन्ध में पूरी जानकारी हासिल करने के लिए भारतीय दूतावास से संपर्क साधना चाहा किन्तु समयाभाव के कारण वह ऐसा कुछ नहीं कर सकसमय उसके पास होता था केवल ात मेंएक रात जब उसने अपना लैपटौप खोलाकुछ लिखने के लिए उसे इंटरनेट पर प्रकाशकों के बारे में जानकारी प्राप्त करने का ख्याल आयाउसने इंटरनेट पर टटोलना शुरू किया.
          यह क्या ? एक महिला प्रकाशक ? मानसी जोशीआकर्षित तो वह ' हिला ' के कारण ज्यादा हुआप्रकाशक की तलाश उसे थी हीसो यह बहाना बना उनके एक-दूसरे के संपर्क में आने का.
          आरम्भ के कुछ दिनों तक वे केवल व्यवसायिक जानकारी लेते-देते रहेएक-दो दिन के अंतराल में दोनों की तरफ से एक-एक मेल इधर-उधर होता थाकोई व्यक्तिगत बातचीत नहींकोई एक-दूसरे के बारे में खुलासा नहींपर शब्दों में कुछ ऐसा जादू था कि दोनों -दूसरे के मेल का इंतज़ार करते. आखिर एक दिन अनुपम ने मानसी को लिखा, ' और क्या करती हैं आप ? आपके क्या-क्या शौक हैं ? '
          मानसी ने उत्तर लिखा, ' कुछ ख़ास नहींपढना-लिखना.'
          अनुपम पूछना चाहता थाआपके रिवार में कौन-कौन हैंपर पूछ नहीं पायासभ्यता का तकाजा था. मुंहफट होकर कैसे कोई व्यक्तिगत बात पूछ ले ? मानसी पूछना चाहती थीआप हमेशा रात को मेल लिखते हैंआपकी पत्नी कुछ नहीं हती ? पर पूछ नहीं पाईसीधा पत्नी के बारे में पूछना खराब लगत ना ? फिरवहाँ रात होती हैतो यहाँ दिन होता हैयही कारण होगाशायद.
          एक दिन अनुपम ने लिखा, ' यदि आप अन्यथा  लें तो एक बा कहना चाहता हूँमेरा एक भारतीय मित्र यहाँ कई वर्षों से हैवह एक भारतीय लड़की से शादी रना चाहता हैआप किसी को जानती हों तो....'
          तो जनाब क्वारे हैंमित्र के बहाने से अपने बारे में कह रहे हैंमानसी ने सोचालिखा यह, ' मैं ख़ास किसी को नहीं जानती पर आप यहाँ के अखबार में विज्ञापन दे सकते हैंमतलब आपके मित् विज्ञापन दे सकते हैं.'
          ' ठीक हैमैं कहूँगा उससेज़रूरत पड़ने पर आपका सहयोग तो मिलेगा ही.'
          ' अवश्य..... वैसे मेरी एक सहेली है लेकिन वह तलाकशुदा है......' मानसी ने लिखा बात आगे बढाने के लिएउसकी पहचान में कोई  कोई तो तलाकशुदा होगी ही.
          ओह होतो मैडम तलाकशुदा हैं, सहेली के बहाने से अपने बारे में कह रही हैंअनुपम ने सोचा  जवाब दिया, ' नो प्रॉब्लममाय फ्रेंड इज ल्सो  डिवोर्सी...... अपनी सहेली के बारे में विस्तार से बताएंक्या करती हैंउनके शौक वगैरा......'
          तो जनाब क्वारे नहींतलाकशुदा हैं ? सीधे-सीधे नहीं बता सकते क्या ? लिखा उसने यह,       शीघ्र उसका प्रोफाइल भेज दूँगी.' लिखने को तो मानसी ने लिख दिया था पर किसका प्रोफाइल भेजेगी वह ?
          अनुपम ने उसे ही वह लड़की समझ लिया थाउसने एकाध दिन के बाद प्रोफाइल भेजने का आग्रह कियासाथ ही वह अपने ऊपर काबू  रख का और उसने लिख दिया. ' मानसी जीआय एम मेकिंग इट     क्लीअर दैट इफ यू आर  गर्लआय  श्योरलीकैटेगोरिकलीऐब्सोल्युत्लीसिंगुलरलीअनईक्विवोकलीस्त्रौन्ग्लीसरेन्दरिन्ग्ली इंट्रेस्टेड इन प्रिंसिपल.'
          मानसी अनुपम का यह मेल पढ कर हैरान रह गईबिना देखेबिना मिले इस तरह की वचनबद्धता ? उसने तुरंत उत्तर दिया, ' नोआय एम नौट दैट गर्लआय  नौट  डिवोर्सी.'
          ' सौरीमैंने समझा था कि आपने अपने बारे में लिखा था...... क्या आ अपने बारे में कभी कुछ नहीं बताएंगी ? '
          ' मैंने शादी नहीं कीस्टिल आय एम नौट इंटेरेस्टेड इन मैरेजमैं जो भी हूँजिस हाल में हूँउसमें खुश और संतुष्ट हूँ. '
          वह पूछना चाहता था कि मानसी  शादी क्यों नहीं की ? कोई मिला नहीं या...... ऐसा कैसे हो कता है कि इतनी बढ़िया मनमोहक बातें करने वाली को कोई मिला  होअनुपम ने अपने सवाल का जवाब भी खुद ही दे लियाफिर ? किसी ने उसका दिल तोडा क्या ? इस बात की गुंजाइश हो सकती थी. ' मैं इस बारे में नहीं पूछूंगा.' उसने सोचाझरा उसकी उँगलियों से सिर्फ यह, ' ओह ! '
          ' ओह जैसी कोई बात नहीं हैआय' ओके.'
          ' इफ यू डोंट माइंडक्या हम दोनों दोस्त बन सकते हैं ? ' अनुपम ने पूछा.
          ' व्हाय नॉट ? दोस्त तो हम बन ही चुके हैंवी आर ऑन लाइन फ्रेंड्स.'
          ' ओह ! आय एम सो मच रिलैक्स्डआय एम ऑल्सो नौट इंटेरेस्टेड इन मैरेज....यू नो वॉट ? '
          ' वॉट ? '
          ' सच कहूं तो आय एम वेरी हैप्पी विद माय ऑन लाइन फ्रेंड.'
          मानसी के मन में कुछ खट से बजउसने लिखा, ' शब्दों के आदान-प्रदान में एक फील गुड फैक्टर रहता है.'
          ' हाँमुझे इंतज़ार रहता है आपकी मेल कामैं बार-बार अपना लैपटौप खोल कर देखता रहता हूँमुझे आपसे बातें करना बहुत अच्छा लगता हैमानसीफिरआप तो मेरा भविष्य भी संवारने वाली हैं.'
          ' वह कैसे ? '
          ' मेरी किताबें छाप करक्या मैं आप को तुम बुला सकता हूँ ? '
          ' श्योर......'
          ' तुम्हे जान लेने भर से मेरा विष्य जुड़ गया हैमानसीतुम्हारी मित्रता मेरे लिए भगवान् की देन हैकोई पूर्व जन्म का पुण्य प्रताप......'
          मानसी चुप.
          ' कुछ बोलो मानसी......'
          अनुपम की बातें मानसी को भाव विभोर किए हुए थींउससे कुछ लिखा  गया.
          ' आज से मैं तुम्हे नया नाम देता हूँसिन्ड्रेलामाय ऑन लाइन फ्रेंड सिन्ड्रेलामाय पेन फ्रेंड सिन्ड्रेला......'
          मानसी फिर चुप.
          ' सिन्ड्रेलाकुछ लिखोगी नहीं ? '
          ' मैं शायद तुमसे उम्र में बड़ी होऊँगीमैंने हिसाब लगा कर देखा है.'
          ' अब यह उम्र कहाँ से  गई बीच में ? '
          मानसी चुप.
          अनुपम चुप  रह सकाउसने लिखा, ' कुछ बोलोसिन्ड्रेला.'
          ' फील गुड फैक्टर हैज़ मेड मी  स्पीचलेस,' मानसी ने लिखा और जैसे दिल की पूरी किताब खोल कर रख दी अनुपम के सामनेचैट बंद हो गया.

          बल्कि सचाई यह थी कि उसके बाद चैट कभी बंद ही नहीं हुआचौबी घंटे कंप्यूटर खुला रहने लगा. धीरे-धीरेजो कि बहुत ज्यादा जल्दी-जल्दी थादोनों मानसिक रातल पर नज़दीक आते गए और बातों के अंदाज़ स्पष्ट से स्पष्टतर होते गएमानसी को हर रोज़ अपनी म्र का भय सताता रहतावे दोनों अपना स्वप्लोक टूटने के भय से अपनी असलियत सामने नहीं लाते उन दोनों ने एक-दूसरे को कभी पनी फोटो भेजी ही अपनी उम्र बताईएक झूठ को जीते हुए खुश हना कितना सरल हैयह उन दोनों की जैसे विवशता बन गया होअनुपम ने एक बार उसे लिखा, ' मुझे नहीं लगता कि तुम मुझ से बड़ी होंगीअगर होंगी भी तो समें तुम्हारा क्या कसूर ? '
          ' लेकिन......'
          ' लेकिन-वेकिन कुछ नहींमैंने तुम्हे छोटा करने का एक उपाय सोचा है......'
          ' तुम्हारे किए क्या मैं छोटी हो जाऊंगी ? '
          ' हाँमैं तुम्हारी जन्म-तिथि बदल रहा हूँअब तुम्हारी जन्म-तिथि है 29 फरवरीहर चार साल में से तीन साल कम हो गए.'
          ' इस तरह तो मैं शून्य हो जाऊंगी.'
          ' नहींइसका मतलब यह हुआ कि यदि मैं चार साल का हूँ तो तुम एक साल की यानि तुम मुझसे तीन साल छोटी रहोगी अब हमेशा. '
          ' यानि तुम मुझे अपने बराबर लाकर ही छोड़ोगे ? '
          ' अब समझीमेरी ट्यूब लाइटना यू आर एन एन्लाइतेन्द सोल.'
          ' वेरी स्मार्ट...... हा हा हा...... हो हो हो......'

          उसके बाद अनुपम काम में कुछ सा व्यस्त हुआ कि मेल लिखने का उसे वक़्त  मिलामानसी के मन में संशय जागाकहीं उम्र के कारण तो पीछे नहीं हट रहा ? मैंने यह लिख दिया कि मैं सुन्दर नहीं हूँकहीं इस कारण तो पीछे हट रहा ? मानसी ने स्वतः लिखना उचित नहीं समझाआखिर तीन दिन के बाद अनुपम का मेल आयावैसा ही हँसता-खिलखिलाता, '  माय सिनोरिताहाओ इज लाइफ ? '
          ' इतने दिन कहाँ थे ? मैंने तुम्हारा एक नया नाम रखा है.... त्थरदिल......'
          ' लिसेन सिनोरितायह नाम रखने की टेरिटरी मेरी हैरौयल्टी देनी पड़ेगी......'
          ' दे दूँगी पर पहले यह बताओ कि मेरा पत्थरदिल दोस्त कहाँ था इतने दिन ? '
          ' तुम्हारे पास आने की भागदौड़ में लगा था.'
          ' ओहमैं समझीकिसी शूर्पनखा के चक्कर में तो नहीं पड़ गए ? '
          ' ओह नो सीतेतुम्हारा राम एकद एकव्रती हैमर्यादा पुरुषोत्तम......'
          ' हाय मेरे रामयह तुमने क्या लिख दिया ? ' घबरा के मानसी ने चैट बंद कर दिया.
          अनुपम ने उसे पुनः चैट पर आमंत्रित किया.
          ' यू आर क्रेजी मैन......' मानसी ने लिखा.
          ' येसआय एम क्रेजीमैं सच में तुमसे मिलने के लिए बहुत उतावला हो रहा हूँपता नहींमैं क्या कर दूंगा ? '
          ' अपने को संभालो अनु......'
          ' अच्छा बताओमुझसे मिल कर सबसे पहले तुम क्या करोगी ? '
          ' क्या करोगीमतलब ? तुम बताओ......'
          ' आय' गिव यू  स्मूच......
          ' गंदे कहीं के......'
          ' आय' गिव एनादर वन......'
          ' ओके बाय.' और मानसी ने चैट बं कर दिया.

          अनुपम को लेने के लिए एअरपोर् नहीं जा सकी मानसीअनुपम ने खुद मना कर दियाएक तो इतनी दूऊपर से आधी रात की फ्लाइट यह हुआ कि अनुपम एअरपोर्ट से सीधा अपने घर यानि अपने माता-पिता के पास जाएगा और अगले दिन शा को वो मिलेंगेकिसी रेस्तरों मेंअनुपम के दिल में बेसब्री थी और मानसी के दिल में उथल-पुथलक्या होगाक्या होने वाला हैयह दोनों के ही दिल में था.
          अगला दिन भर जेट लेग के कारण अनुपम सोया रहाआखिर प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुईं और अगले दिन की शाम आईपहचानना मुश्कि नहीं हुआजब अनुपम रेस्तौरैं पहुंचामानसी वहाँ पहले से  मौजूद थीदरवाज़े की तरफ पीठ करके बैठी हुईयही होगी. किसी के इंतज़ार में बैठी दिखती है. मेंरे ही. ' कहीं से मोटी नहीं है लड़की,' अनुपम ने सोचा और सामने जा खडा हुआउसके सामने आते ही मानसी  लगायही हैऔर बिना कुछ पूछे दोनों ने एक-दूसरे को पहचान लियाअब दोनों आमने-सामने बैठे थेमानसी ने देखाएकदम चिट्टा-बुर्राकजैसे कोई अँगरेज़ होछरहराहंसमुखओजस्वीतेजस्वी...... ओहवह बुझ गईउसके गे क्या लगेगी वह ? सूरज की तीखी रोशनी के आगे जैसे रात का अँधेराअनुपम ने गौर से  देखने का बहाना करते हुए भी उसे गौर से देखाबड़ी तो है पर चलेगी. लेकिन उसका रंग ? यह तो सचमुच ाली हैएकदम काली स्याहजिसे छूने भर से अपने हाथ काले होने का डर होनैन-नक्श ठीक-ठाक. मोटी तो नहीं पर स्वस्थ हैउम्र...... चलो ठीक हैचला लेंगे काली इतनी जिसका अनुमान वह लग ही  सका थाउसने सोचा था भारतीय तो अपने आप को काला कहते ही हैंतो ऐसी ही कुछ होगी वहसांवलीपर उसने सच लिखा थावह सच में काली हैशायद इसीलिए इसका विवाह  हो पाया हो, कौन जाने. ' नहीं... नहीं... ऐसी बात नहीं सोचनी चाहिए मुझेइंसान की पहचान उसके गुणों से होती है......' अनुपम ने अपने सिर को झटका.
          उसे अपने रखे प्यार के इतने ामों में से कोई नाम ध्यान  आय. ' तुम ' कहना भी वह भूल गयानिकला उसके मुंह से यह, ' कैसी हैं आप ? ' कहते हुए हंसा वहहंसना ज़रूरी थामानसी को कुछ पता  चले...... पर पता कैसे  चलता ? वह कोई बच्ची तो थी नहींज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव देखे थेआज पहली बार किसी लड़के से नहीं मिल रही थीजब भी मिली थीप्रतिक्रिया समान ही होती थीकहा उसने , ' पुस्तक की पांडुलिपि लाए है  ? '
          ' कौन सी पुस्तक ? ' उसके बुझे मन में पुस्तक छपवाने के सारे अरमान जैसे जल चुके थेउसे एकाएक ध्यान  आया.
          ' अपनी किताब छपवाना चाहते थे  आप ? '
          '  हाँइस समय तो नहीं लायाकल दे दूंगाफोन करके मिलूंगा आपसे.'

          वह ' कल ' कभी नहीं आयाऔर  ही फोनजिस स्वप्नलोक को वो वास्तविकता में बदलने के लिए बेचैन थेवह चूर-चूर हो गया था.