Monday, 10 September 2012

कवि की कल्पना Kavita 50

कवि की कल्पना

बज रही है कानों के आसपास कविता
लिखे जा रहे हैं मुक्त छंद निर्द्वंद
झर रहा है शब्दों से रस श्रृंगार का
मानस हैरान है, बुद्धि परेशान है.

कौन सी तपस्या से उठ कर तुम आये हो?
कौन सी समाधि में डूबे थे अभी तक?
कौन सी गुफाओं में बंद थे तुम वैरागी?
कौन सी आसक्ति खींच तुम्हे लायी यहाँ?

बरसों से बंद पड़े द्वार को सजाओ आज
शब्दों के मेले हैं, न कोई झमेले हैं
उत्सवी वातावरण में हास्य की बौछार है
रंगों की रंगोली है और बंदनवार है.

मोहाविष्ट भावों से घिरे हुए शब्द हैं
गहरे उच्छ्वास में गीत मस्त मगन हैं
कोई भी मुहूर्त हो, शुभ-अशुभ की बात क्या
लेखनी से इतर कोई भी सौगात क्या.

यह कवि की कल्पना है ध्वनि-तरंगों से तेज़
आसमानों की ऊंचाई छू के आएगी ज़रूर
पंख फड़फड़ाती जैसे उड़ रही है दूर-दूर
रचेगी कोई नया इतिहास काल-पृष्ठ पर.

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