Wednesday, 12 September 2012

मरने के बाद Kavita 51

मरने के बाद


मरने के बाद कोई कैसे जिंदा रहता है
उस घर की दीवारें बताएंगी
जहां रोशनी के लिए कोई जगह नहीं है
छत से टपकता है अँधेरा
हर कोने से उठती है दुर्गन्ध
खिडकियों पर बैठी हैं मटमैली मूरतें
इंतज़ार है, कोई आए और उठाए
शव को दफनाने के लिए.
गुज़र रहे हैं दिन पर दिन
बरस पर बरस
यूं ही मौत को ढोते हुए.
और जीवित भी रहते हुए.
किसके लिए जीवित हैं
और किसके लिए मर चुके हैं
यह भी पता नहीं.
अज्ञान का तिमिर फैला है चारों ओर
कोई आया भी तो नज़र कैसे आएगा ?
द्वार बंद है, कहीं कोई राह नहीं
कौन होगा ऐसा
जिसे जीने की चाह नहीं.
मरने का इरादा है तो आओ
जीने की आस में व्यर्थ न बहकाओ.

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