Tuesday, 25 September 2012

तो यह बात है ( कहानी )


तो यह बात है    ( कहानी ) (प्रकाशित : कथाबिम्ब, अप्रेल, '13)

          अभी सुबह हुई नहीं थी या पूरी तरह नहीं हुई थी कि सामने वाले घर से चीखा-चिल्ली की आवाजें आनी शुरू हो गईं. इनकी रात चीख-पुकार से ख़त्म होती है और सुबह चीख-पुकार से शुरू होती है. बड़े नियम के पाबन्द हैं ये. ये पति-पत्नी हैं या..... कहावत है न वह कुत्ते-बिल्ली का बैर वाली, तो कुत्ते-बिल्ली का बैर है इनका. मज़ा आता है इन्हें, सच कहें तो, लड़ने में. लड़ाई में भी एक रस होता है. आदत पड़ जाती है इस रसास्वादन की. न लड़ो तो लगता है, कुछ कमी है जीवन में. तो आओ चलो पूरी करें. चुन-चुन कर ऐसे शब्द लाएं जिसे सुन कर सामने वाला तिलमिला उठे. एक ही मकसद है, सामने वाले को बेइज्ज़त किया जाए, नीचे गिराया जाए. पर जिन शब्दों की मदद से उसे नीचे गिराएंगे, वही शब्द बोलने वाले को भी तो नीचे गिराएंगे ? नहीं, बोलने वाले को इसकी चिन्ता नहीं. बोलने वाला तीसमारखां है. पर यहाँ तो दोनों ही तीसमारखां हैं. क्योंकि दोनों ही बोलने वाले हैं. जो चुप हुआ, वह समझता है, उसकी हार हो गई. एक से बढ़ कर एक. हारेंगे क्यों ? लड़ाई में कोई तमगा हासिल करना है क्या ? किससे ? जो सुन रहे हैं, यानि आस-पडौसी, वो तो कोई तमगा देने वाले हैं नहीं. सारे दुखी हैं. सबकी नींद खराब होती है. सब को लगता है कि ये लोग इस शानदार कॉलोनी में रहने के काबिल नहीं. यह पढ़े-लिखे सभ्य लोगों की कॉलोनी है. सब का माहौल गन्दा होता है. सबके बच्चों पर बुरा असर पड़ता है. पर कोई इस समस्या से निबटे कैसे. असल में समस्या जिन दो की है, उन्हें खुद इससे निबटना नहीं आता. अपनी समस्या को दूसरों की समस्या बनाए हुए हैं. वैसे देखा जाए तो लड़ाई का कारण तो कोई नज़र नहीं आता. सब कुछ है घर में. अच्छे-खासे संपन्न लोग हैं. पैसे की कोई कमी नहीं. बुद्धि की कमी ज़रूर लगती है. अब पैसे से तो बुद्धि खरीदी नहीं जा सकती. यूं नाम का पट्टा टांगा हुआ है घर के दरवाज़े पर जिस पर लिखा है-- एस एल शर्मा एल एल बी. उसके नीचे एक और नाम है-- एम शर्मा एम एस सी. एस एल शर्मा यानि पति और एम शर्मा यानि पत्नी. यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि नाम के पट्टे पर नामों के आगे डिग्रियां लिखवाने की क्या ज़रुरत थी ? ताकि लड़ने से किसी को यह न लगे कि अनपढ़-गंवार हैं ? पता था कि लड़ेंगे ही लड़ेंगे इसलिए यह प्रबंध करना ही था ? भई खूब, बहुत खूब.
          एम शर्मा चाहे एम एस सी है पर करती-धरती कुछ नहीं. गलत, यह मैंने क्या, कैसे और क्यों कह दिया ? सारा घर वही संभालती है. नौकर हैं पर नौकरों से भी काम करवाना होता है. बाहर जा कर काम करने को ही तो काम करना नहीं कहते. घर के काम की भी पूरी महत्ता है. और हाँ, दिन भर कॉलोनी में घूमती है, पति के काम पर चले जाने के बाद. आस-पड़ोस में बातें करने का शौक है उसे. किसी की भी कॉल बेल बजा कर अन्दर घुस जाती है. छोटे शहर या छोटे मोहल्ले से यहाँ शिफ्ट हुए लगते हैं ये लोग. वरना कॉलोनी में मजाल है कि दूसरा कोई इस जैसा हो. महीनों सूरत नहीं नज़र आती लोगों की. बस कोठी का गेट खोला, कार में बैठे और छूमंतर. न किसी से हेलो, न हाय. लम्बी बातचीत का तो मतलब ही कोई नहीं. फुर्सत किसे है ? वैसे भी गली-मोहल्लों के ज़माने अब ख़त्म हुए. काकी-चाची कहने के दिन अब बीत गए. बस घर के भीतर दरवाज़े बंद करके बैठो. टी वी देखो या कम्प्यूटर करो. या किताबें पढो. किताबें आजकल कौन पढता है ? किताबों की परम्परा धीरे-धीरे समाप्त हो रही है. नहीं तो दिन भर सोते रहो. अन्दर बैठ कर जो मर्ज़ी करो, बाहर निकलना, निकल कर अडोस-पड़ोस में झांकना असभ्यता की निशानी है. सामाजिकता चाहिए, दुनियादारी चाहिए तो अपने चुनिन्दा लोग हैं न मिलने के लिए, अपनी पसंद के लोग, अपने मित्र, अपने सम्बन्धी, जिन्हें समय-समय पर आमंत्रित करके पार्टियां करो या उनकी पार्टी में जाओ, लेकिन अनामंत्रित नहीं. अपनी पसंद के चुनिन्दा लोगों से भी मिलने के लिए बिना बताए उनके घर धावा बोलना आजकल का रिवाज़ नहीं है. वही, असभ्यता की निशानी. बाहर जाना ही है तो फिल्म देखने जाओ, होटल में खाना खाने जाओ, मौल में घूमने या खरीदारी करने जाओ. कहीं भी जाओ पर पड़ोस में मत जाओ. पडोसी को हमने चुना नहीं है, वह हमारी पसंद का नहीं हो सकता. ये सब बातें कॉलोनी के दूसरे लोग जानते और मानते हैं पर एम शर्मा नहीं मानती. वह इतने पचड़ों में नहीं पड़ती. उसका अपना मन ही सब कुछ है. उसका मन किसी से बोलने का है तो बोलेगी ही. बेल बजने पर लोग दरवाज़ा खोल देते हैं, अन्दर आने देते हैं, सभ्यता का तकाजा है. यही कारण है कि सारी कॉलोनी की खबर एम शर्मा को है और उसकी खबर सारी कॉलोनी को. आम खबर तो आम खबर, उसकी तो ख़ास ख़बरें भी किसी से छुपी नहीं हैं. वह खुद बता देती है. इसमें शर्म की क्या बात ? क्या लोग सुनते नहीं हैं जब उनके घर में धूम-धड़ाका होता है बोल-बमबारी का. एस एल शर्मा, एल एल बी और एम शर्मा, एम एस सी, दोनों अपनी आवाज़ की बुलंदी पर होते हैं. शब्दों की रफ़्तार इतनी तेज़ कि सुनने वाले को एकाएक तो समझ ही नहीं आता कि बोल क्या रहे हैं. बस, लड़ रहे हैं, यही समझ में आता है. इतना ही काफी है आस-पड़ोस के दुखी होने के लिए. कोई उनके लड़ने से दुखी क्यों होने लगा. लड़ाई की आवाज़ किसी तक न पहुंचे तो कोई दुखी नहीं, फिर वे चाहे लड़ें-मरें, डूबें-तरें, कुछ भी करें.
          तो एक दिन एम शर्मा ने मेरे घर की कॉल बेल बजाई. घंटी की आवाज़ सुनना ही मेरे लिए अनपेक्षित था. मैंने दरवाज़े की जाली से झाँक कर देखा. अरे रे रे, यह तो वही है, इसे ज्यादा मुंह नहीं लगाना. फ़ालतू की बातों में मुझे कोई रूचि नहीं. मैंने अनसुना किया. कुछ पल के इंतज़ार के बाद उसने फिर घंटी बजाई. साथ ही आवाज़ भी लगाईं, आंटी.... आंटी.... कैसे न खोलती ? मुझे दरवाज़ा खोलना ही पडा.
          ' आइए मिसेज़ शर्मा,' मैंने मुस्कुरा कर उसका स्वागत किया. यूं तो वह पहले भी कई बार मेरा हालचाल पूछने के बहाने आ चुकी थी और मैं बेमन से हंस-हंस कर उसका स्वागत कर चुकी थी.
          ' मैंने डिस्टर्ब तो नहीं किया ? '
          ' नहीं.... नहीं.... ' मैंने झूठ बोला.
          ' मैंने सोचा, आंटी से मिले बड़े दिन हो गए. आप ठीक तो हो ? कोई परेशानी हो तो मुझे बुला लिया करो.' बोलती वह बहुत मीठा है. सिर्फ दूसरों से. अपने घर में नहीं.
          ' मैं ठीक हूँ, मिसेज़ शर्मा.... '
          ' आप मुझे मेरे नाम से बुलाया करो, मधु. मैंने कितनी बार कहा है आपसे. आपकी बेटी की तरह हूँ मैं.'
          अब यह और दिक्कत है यहाँ. बात करो सो करो, रिश्तेदारी भी बनाओ. इस मामले में मैं एकदम खालिस सभ्य. मैं रिश्तों के संबोधन से न किसी को बुलाती, न किसी के द्वारा अपने को बुलाया जाना पसंद करती. रिश्ते होते हैं छोटे शहरों में, पुराने मोहल्लों में, जहां एक दूसरे के घरों में बाकायदा दखलंदाजी की जाती है. मुझे गुरूर है कि मैं एक महानगर में रहती हूँ, महानगर के भी पौश इलाके में. जो भी हो, मिसेज़ शर्मा से तो मुझे हंस के ही निबटना था. मैंने कहा, ' हाँ मधु, बताओ, कैसी हो ? '
          ' अब कैसी हो सकती हूँ आंटी, ऐसे आदमी के साथ ? '
          ' बोलने में तो तुम भी कम नहीं हो. आवाज़ तुम्हारी भी ज़ोरदार है. क्यों बहस पर बहस किए जाती हो ? तुम्हारा पति वकील है. उससे जीत पाओगी तुम ? '
          ' बहुत कोशिश करती हूँ, न बोलूँ, न बोलूँ, पर कब तक ? आखिर बोलना ही पड़ता है. आप ही बताओ, मैं क्या करूँ ? '
          ' देखो मधु, हर समस्या का आपस में बात करके हल निकाला जाता है. तुम अपने पति से आराम से बात करो, कहो, कोई तो निष्कर्ष निकालना पडेगा. आखिर सारी उम्र तुम लोग लड़ते कैसे रह सकते हो ? '
          ' मैंने कई बार बात की है पर यह सुनना ही नहीं चाहते.'
          ' तुम ही उनकी बात मान लो. जो वो कहते हैं, वैसे कर लिया करो.'
          ' अरे यह तो हर बात में नुक्ताचीनी करते हैं. कोई कब तक चुप रहे ? '
          ' तुमने इतनी पढ़ाई की है. कहीं नौकरी कर लो. जितनी देर बाहर रहोगी, इस किच-किच से तो छूटी रहोगी.'
          ' लो कर लो गल्ल. आंटी, तुसी बी कमाल करदे ओ. साड्डे कोल इन्ना पैसा ऐ, मैनूं की लोड ऐ बाहर जाकर कम्म करन दी ? '
          ' तुम्हारा अकेले दिल भी नहीं लगता न ? '
          ' मैं अकेली कहाँ हूँ ? आप सब हो न मेरे साथ. सच आंटी, मैं रात-दिन के झगड़े के कारण बहुत परेशान रहती हूँ. इस झगड़े से मुक्ति पाने का कोई उपाय बताओ.'
          ' तुम ऐसा करो,' मैंने मुंहफट हो कर बोल दिया, ' तुम शर्मा जी से तलाक ले लो.'
          ' हैं.... ' वह चौंक पड़ी, ' आंटी, हम इज्ज़तदार लोग हैं, हमारी मानसिकता बड़े शहरों की जैसी नहीं है. यह तो हो ही नहीं सकता. इस मामले में हम बहुत दकियानूसी हैं.'
          मैं क्या उत्तर देती. चुप रही. मुझे वास्तव में ऐसा नहीं कहना चाहिए था. यह कोई समाधान तो नहीं कि जहां पति-पत्नी के बीच में लड़ाई हो, वहाँ तलाक ले लो...... पर इन लोगों की लड़ाई कोई ऐसी-वैसी लड़ाई नहीं, सारी कॉलोनी सुनती है, फिर रोज़ का मामला है, कभी-कभी का नहीं, निर्लज्जता की हद तक पहुंचा हुआ.
          कहा मैंने यह, ' अन्य कोई हल भी तो नहीं है..... तो बस, यूं ही मज़े लो, तुम लोग लड़ कर, हम लोग सुन कर.'
          ' क्या आंटी, आप भी बस..... आपको मज़े सूझ रहे हैं और मेरी जान पर बन आती है.'
          ' मधु, कभी अन्तरंग क्षण में मनाओ उन्हें..... '
          ' न, न, मैं तो उन्हें हाथ भी नहीं लगाने देती. घिन हो गई है मुझे उनसे.'
          अब करने के लिए और कोई बात नहीं थी. उसकी भड़ास निकल चुकी थी. वह चली गई, मेरे लिए सिरदर्द छोड़ कर.
          अब कोई सोचे, यह अलग-थलग रहने की सभ्यता-संस्कृति अच्छी है या आस-पड़ोस में बिना बुलाए घुस कर दखलंदाजी करने और करवाने की ? न खुद चैन से रहो, न दूसरों को रहने दो. खुद तो अपनी मूर्खता में जी ही रहे हो. दूसरों को भी शामिल कर लो दुखी करने के लिए. अरे भई, दूसरे लोग खाली नहीं बैठे, सब अपने-अपने कामों में लगे हुए हैं. कहाँ किसी के पास फुर्सत है दूसरों के पचड़ों में पड़ने की. पहले का ज़माना अब नहीं रहा, जब पूरा मोहल्ला एक घर-परिवार की तरह रहता था. क्योंकि तब हरेक के पास इतने काम नहीं हुआ करते थे. कल से आज की कोई तुलना की ही नहीं जा सकती. ज़माना बदल गया है. समझो इस बदलाव को, मेरी प्यारी पुत्री-समान मधु. तुम क्या आईं, मेरे मूड का बेडा गर्क हो गया.

          मैं अपने घर के आँगन में खड़ी पौधों को पानी दे रही थी. मुझे एक ड्राइवर की तलाश थी. कई रख कर देखे पर कोई जमा नहीं. ड्राइवर रखना तो सच कोई मजबूरी हो, तभी कोई रखे. लगता है, एक टुच्चे से कमरे में घटिया खुशबू का तेल बालों में लगाए एक अवांछित तत्व आपके साथ बैठा है. मैं स्वयं इतनी अच्छी ड्राइवर हूँ पर मजबूरी, बिजनेस के कारण कभी ड्राइवर को इधर-उधर सामान के साथ अकेले भेजना पड़ता है. इसीलिए ढूंढ रही थी एक ड्राइवर, जिसके हाथों में कार बेफिक्र होकर छोड़ी जा सके.
          अचानक मेरी निगाह सामने गई, मधु का ड्राइवर उनकी गाडी साफ़ कर रहा था. मैंने उसे बुलाया. क्या बात है, बड़ी खुशबुएँ मार रहा है यह तो. इतना परफ्यूम लगा कर आता है. मैं अपने ड्राइवर को कभी इस बात की इजाज़त नहीं दूँगी. मैंने उससे कोई ड्राइवर बताने के लिए कहा. उसने पूछा, ' कितनी तन्ख्वाह दे देंगी ? एक है अनुभवी ड्राइवर, पर सैलरी ज्यादा लेगा.'
          ' कितनी ज्यादा ? ' मैंने कहा, ' गाड़ी ठीक चलानी आती हो. जो भी तर्कसंगत होगा, दे दूँगी.'
          वह सोचने लगा. मैंने उस से उसकी तनख्वाह के बारे में पूछा, ' तुम्हे कितनी मिलती है, बताना चाहो तो..... '
          ' मेरी तनख्वाह बहुत अच्छी है. साहब ने जो तय किया, वह तो देते ही हैं, मेम साहब भी खुश हो कर कभी हज़ार, कभी दो हज़ार दे देती हैं.'
          तो यह बात है. मधु जी, तुसी ग्रेट हो।

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