Tuesday, 4 September 2012

प्यार मर रहा है Kavita 46

प्यार मर रहा है

प्यार मर रहा है धीरे-धीरे
बचा लो उसे
आखिरी सांस लेने से पहले
उसे जिंदा रखना बहुत ज़रूरी है
सिर्फ मेरे लिए ही नहीं
तुम्हारे लिए भी.
अगर उसे मर ही जाने देना था
अगर उसका नाम कभी नहीं लेना था
तो इतनी मेहनत क्यों की
उसे खाद-पानी देने की ?
इतना सिर क्यों खपाया
एक-दूसरे को रिझाने के लिए ?
इतना प्रपंच क्यों रचा
अपना बनाने के लिए ?
क्यों जागते बिताई रातें ?
क्यों दिन में देखे सपने ?
क्यों हलचलों के बीच रहा दिल ?
क्यों कहा, यहाँ-वहाँ आकर मिल ?
यह आग लगाईं है तुमने
यह सारा नियोजन तुम्हारा था.
किसी दूसरे का हस्तक्षेप नहीं
हर प्रयोजन तुम्हारा था.
तुम तो कृत संकल्प थे
ताउम्र निभाने के लिए ?
फिर क्यों हुआ विवश यह
इतनी जल्दी मर जाने के लिए ?
हमारे दिलों में फूल खिले थे
क्या सिर्फ मुरझाने के लिए ?

No comments:

Post a Comment