Tuesday, 25 September 2012

रस भंजक Kavita 57

रस भंजक

अब जब तुम आओगे
तो बहुत सी चीज़ें बदली हुई पाओगे.

मसलन नहीं होंगे
लहरा कर चलने वाले शब्द-कीट
हमेशा मिलन के लिए तत्पर भुजा
हाँ में हाँ मिलाने वाला चापलूस हास
रिझाने में लगा उन्मत्त परिहास.

तुम्हारी शुष्क प्रकृति को
जो भी रास नहीं आता
उन सब रागों का विसर्जन ज़रूरी है.

तुम रस भंजक हो
श्रृंगार के ख़ास.
सुर-लय-ताल में
तुम्हारी कोई रूचि नहीं.

सीधी सपाट ज़िन्दगी के रहनुमां
छलछल बहती हुई
कलकल करती हुई
जलधारा तुन्हारे पास से गुजरी है
तुम्हें पूरा भिगो कर.
सूखने में उम्र लग जाएगी.

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