Friday, 28 September 2012

अतीत Kavita 64

अतीत

ऐसे कैसे पुँछ सकते हैं
बीते हुए कल की किताब पर लिखे हुए
पृष्ठ-दर-पृष्ठ
अध्याय-दर-अध्याय
जिनके अध्ययन में बीते सालों साल.
मुझे नहीं पता.

ऐसे कैसे धुल सकते हैं
बरसों के स्याह-सफ़ेद रंग
सतरंगी हों, चाहे बदरंग
जिन्होनें रचा था चित्रालय
छपे थे जो हर दरवाज़े-दीवार पर.
मुझे नहीं पता.

ऐसे कैसे खो सकते हैं
जीए हुए दिन, सारे पल-छिन
जो कभी ओढ़े और बिछाए
आग और पानी से बचाए
जिंदा रखने को जिन्हें हम मरे बार-बार.
मुझे नहीं पता.

अब नहीं है कोई अतीत
स्मृतियों के जंगल में भी नहीं.
कोई चिन्ह, कोई प्रतीक
शेष नहीं उसका अब
चर्चा उसकी बेमानी
ख़त्म हुई वह कथा-कहानी.

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