Wednesday, 26 September 2012

जिओ खुल कर Kavita 59

जिओ खुल कर

इतना मत कसो अपने को
कि टूट न जाएं
व्यक्तित्व के तार.
बंद द्वार थोड़ा तो खोलो
कि रोशनी की एक पतली सी किरण
भीतर आकर चमका दे
कोना कोना.
अंधेरों में जीवन को गति नहीं मिलती.
बोझिल हो जाती हैं आँखें
बुझा-बुझा रहता है मन
पथरा जाते हैं बढ़ते हुए पाँव
चट-चट चटकते हैं दिवा-स्वप्न.
अपने को बहसों में उलझाओ
कर दो भीड़ के हवाले
फेंक दो किसी बहती हुई नदी में
निःशंक, निःसंकोच.
पार लगने की कला
स्वतः सीख जाओगे
और फिर बार-बार
मझधार में कूदने के लिए जाओगे.
एक दिन यह खेल
बन जाएगा तुम्हारा पसंदीदा
खेल-खेल में खुलेंगे अर्थ
खेल-खेल में हर उल्टा होगा सीधा.
चुनौतियां ज़रूरी हैं जीवन के लिए
जिओ खुल कर, खेल-खेल में.

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