Wednesday, 26 September 2012

तुम्हारे जैसा कोई नहीं Kavita 61

तुम्हारे जैसा कोई नहीं



तुम कितना बोलते हो

शब्दों को तोलते भी नहीं.

कभी-कभी तो कर देते हो

अर्थ का अनर्थ

शब्दों को उलट-पुलट

फिर भी तुम कितने हो समर्थ

कि रच डाली पूरी ग्रंथावली

असंभावित अप्रत्याशित

लिख डाला पूरा इतिहास

जिसे जीना अभी बाकी है.


तुम्हारे चेहरे पर दमक है

दिव्य अलौकिक ज्ञान की

तुम्हारी आँखों में चमक है

सच होते संभावित सपनों की

तुम्हारे व्यक्तित्व से झांकता है

एक सुनहरा शानदार भविष्य

तुम्हारी बातों से छलकता है

अमृत जैसा जीवनदायी रस

तुम सिर्फ तुम हो

तुम्हारे जैसा कोई नहीं.

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