Tuesday, 25 September 2012

दुराग्रह Kavita 58

दुराग्रह

तुमने प्यार तो किया
पर कुछ अधूरा सा किया.

मन में कहीं कोई ग्रंथि हो जैसे
खुल न रही हो खोले से.

किसने तुम्हारे मन को रोका था ?
किसने तुम्हारी चाहत में डालीं जंजीरें ?
कौन सा भय तुम्हारे भीतर समाया था ?
कौन सी सर्द शिला जम गई थी साँसों में ?

तुमने बताया था
तुम्हारे ह्रदय पर एकाधिकार है मेरा
तुम्हारी ज़िन्दगी की डोर मेरे हाथ में है
तुम्हारे सपने सच होंगे मेरी आँखों में
तुम्हारा जीवन सँवरेगा मेरे ही सँवारे.
मेरे बिना तुम कुछ भी नहीं.

फिर ऐसा क्या था
जो न तुम्हें समझ आया, न मुझे
जो न तुम रोक सके, न मैं
जो न तुम्हारा चाहा था, न मेरा
ज़बरदस्ती बैठ गया हमारे दिलों में
दुराग्रह बन कर ?

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