Friday, 7 September 2012

अपना मरना Kavita 47

अपना मरना

मेरे सिर पर क्यों भूत सवार है?
उसका भूत
सारे फसाद की जड़ तो वही था
सारे काम उसने बिगाड़े
सारे उलट-फेर उसने किए
मैं कब चाहती थी
कि वह मेरे जीवन में आये
और आकर उथल-पुथल मचाये
मैंने तो उसे
कोई निमंत्रण नहीं भेजा था
वह स्वयं आया.
आया क्या, जैसे छा गया
हर चीज़ से ज्यादा
मेरे दिलोदिमाग पर
जैसे कोई अनजाने कब्ज़ा कर ले
किसी बेनामी सम्पत्ति पर.
मैं चीखती-चिल्लाती रह गई
कि कोई पकड़ो उसे
वह चोर भागा जा रहा है
पर मेरी चीखें-चिल्लाहटें
किसी को सुनाई नहीं दीं
खुद मुझे भी नहीं
जैसे मेरी आवाज़
भीतर-ही भीतर घुट कर रह गई हो
आँख, नाक, कान
सब बंद हो गए हों
और मैं मरने की स्थिति में होऊँ
खुद अपना मरना देख रही होऊँ.
हे भगवान्
यह क्या
मैं अपना मरना खुद
अपनी आँखों से देख रही थी.

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