Sunday, 9 September 2012

अनकहा सच Kavita 48

अनकहा सच

कितना कुछ अनकहा रह जाता है
और वक़्त बीत जाता है.

मन में उठती हैं रह-रह कर लहरियां
रेंगते हैं जिस्म में सपनों के सांप.

यह भी है और वह भी है
कितना कुछ कहने को है
जन्मों की हो प्यास जैसे
पास तुम बैठो ज़रा सी देर और
.
कितने झमेले हैं तुम्हारे इर्द-गिर्द
कितनी विषमताओं में तुम उलझे हो.

तुम मुझे जब भी पुकारोगे कहीं से
पास अपने ही खड़ा पाओगे मुझे.
मैं तुम्हारे साथ रहूँ या न रहूँ
मैं तुम्हारे पास ही हूँ हर घडी.

मैं तुम्हारी राह में
जल कर करूंगी रोशनी
मैं तुम्हारे प्यार में
मर कर दिखाऊंगी तुम्हे.

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