Friday, 26 October 2012

मन के मीत Kavita 76

मन के मीत

मेरे मन के मीत !
तुमने छेड़ा मेरे अंतस के जंगल में
एक नया संगीत।

मेरे जीवन के सांध्य काल में तुम आए
एक नई गाथा लिखने का प्रण लेकर
लुप्त हुआ व्यतीत।

तुमने अनहोनी को होनी में बदला
एक अनोखा रिश्ता गढ़ने की जिद में
नई चला दी रीत।

एक नया इतिहास रचा अंजाना-सा
बनी-बनाई लीकों को तोडा तुमने
हुई तुम्हारी जीत।

भ्रमजालों को बुना सुनहरी सपनों से
बेगानी बातों को बदला अपनों से
गया पुराना बीत।

तुमने खोले अर्थ नए संवादों के
तुमने अस्त्र निरस्त्र किए विवादों के
तुमसे जन्मी प्रीत।

पिछली परिभाषाओं को बदला तुमने
केवल शब्दों से रंग दी दुनिया सारी
अब न कोई अतीत।

अन्तरंग सखा Kavita 75

अन्तरंग सखा

मेरे अन्तरंग सखा !
घर के आँगन में रंगोली तो सजाओ।
भाग्य आया है तुम्हारे द्वार पर
उसकी अगवानी में बाहर तो आओ।

तुम एक अजनबी देश के वासी
धीरे-धीरे पहचाने जा रहे हो
इस नई दुनिया में समा रहे हो
जादू की तरह अस्तित्व है तुम्हारा
लोग भ्रमित हैं तुम्हारे परिचय से
लगता नहीं कि तुम परदेसी हो
तुम्हारी शक्ल-ओ-सूरत
इस देश के इंसानों से मिलती है।
मेरे अन्तरंग सखा !
आकर अपनी कहानी तो बताओ।

बिना किसी उत्सव के ज़िन्दगी जी तुमने
जो अनसुने रह गए तुम्हारे गान
जिन शोलों से खेले तुम
बच-बच कर जले बिना
तुम्हारी नसों में जो बह रहा है
प्यार का दरिया युगों से
तुम्हारी साँसों में जो कुलबुलाहट है
निश्छल अभिव्यक्ति की।
मेरे अन्तरंग सखा !
रुके हुए जल को रवानी में तो लाओ।

संकोच से क्यों सिले हैं तुम्हारे होंठ
कदम क्यों ठहर-ठहर जाते हैं
शब्द क्यों बहक-बहक जाते हैं
कसमसा रहा है कम्पन
तुम्हारे हाथ में पकड़ी कलम में
तुम्हारी चाहत की मद्धम तपन में
दूर कहीं टिमटिमा रही है एक आस
वही बनेगी तुम्हारा सम्बल।
मेरे अन्तरंग सखा !
मन-वीणा पर कोई तान तो सुनाओ।

पिछला सब भूल कर आगे बढ़ो तुम
नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू करो तुम
तुम्हारे स्वागत में प्रकृति हंस रही है
रास्ता कंकट-विहीन सामने है
हर नज़ारा है तुम्हारे दृश्य-पथ पर
तुमसे मिलने के लिए उत्सुक दिशाएं
सौभाग्य ने दस्तक दी है द्वार पर
प्रत्येक ज़िक्र और चर्चा में तुम हो।
मेरे अन्तरंग सखा !
अपनी मेहमानी के लिए तो आओ।

Wednesday, 24 October 2012

मैं देवी नहीं Kavita 74

मैं देवी नहीं

इसी नश्वर लोक की हूँ
कि मुझे देवी अलौकिक नाम मत दो।
ऊंचे सिंहासन के फलक पर नहीं
अपने बराबर ज़मीन पर बैठाओ।

धरा से ऊपर उठते ही
कि तापमान भस्माने लगता है जैसे।
साथ तुम्हारे कदम-कदम चलते-चलते
बूँद-बूँद पिघला करती हूँ मौसम सी।

तुमने यह जाना है आज
कि मेरी साँसों में है थिरकन तुम्हारी।
मैं तो कब से हूँ तुम्हारी राह पर
हाथ फैलाए हुए, आँखों को बिछाए हुए।

तुमसे इतर कुछ भी नहीं
कि तुम्हारी शाख से लिपटी लता हूँ।
कालसर्पों से बचाती नेह-अंकुर
जल रही हूँ रात दिन अंगार जैसी।

है नहीं दरकार मुझे
कि पुजापों में रहूँ श्रद्धावनत के।
जो समय पर खाद-पानी दे सको तो
देर तक और दूर तक महकेगी क्यारी।

Monday, 22 October 2012

शब्दों का रिश्ता Kavita 73

शब्दों का रिश्ता

हमारे तुम्हारे बीच शब्दों का रिश्ता था
शब्दों ने ही हमें बांधा था।
तुम्हारे पास ख़त्म हो गए हैं शब्द
रिश्ते की बुनियाद हो गई है कमज़ोर।

मेरे होठों पर हंसी लाने के लिए
मेरे चेहरे को खिलखिलाने के लिए
कोई नियम भंग नहीं करना था तुम्हें
कोई मर्यादा नहीं तोडनी थी।

सिर्फ जन्म देना था
अपने दिल में भावनाओं को।

तुम ज्ञानी हो
जानते हो कि
भावनाएं स्वतः जन्म लेती हैं।
ज़बरदस्ती प्रजननं असंभव है।
भावनाओं को आदेश देकर
बुलाया नहीं जा सकता
सो गई हों तो जगाया नहीं जा सकता।
भावनाएं गुलाम नहीं होती।

मैं अब तुम्हारे ख्यालों में नहीं हूँ।
मिट चुकी हूँ
तुम्हारे मानस पटल से।
अब कौन सा प्रछन्न आग्रह
प्रकट करोगे तुम
झूठी दिलासा के लिए ?

रोज़-रोज़ का जुड़ना और टूटना
कमज़ोर कर देता है
ह्रदय के तंतुजाल को
रिश्तों के ताने-बाने
होने लगते हैं ढीले
बेवजह नहीं होता चिडचिडाना।

आओ, आज इसे पूरी तरह तोड़ दें
रुक-रुक कर बहती हुई
जलधारा का रुख मोड़ दें
भिगो रही है अनावश्यक
सूखने के लिए बने हैं जो
दुर्बल निर्बल दयनीय रिश्ते।

Saturday, 13 October 2012

कभी हम भी तुम भी थे आशना (कहानी)

कभी हम भी तुम भी थे आशना (प्रकाशित : जनसत्ता 11. 11.12)

          तुम्हें आज देखा। मैं पहचान नहीं पाई। यदि तुम्हारा ठहाका न बजता तो सचमुच तुम मेरे आगे से गुज़र जाते और मैं अनजान रहती। तुम्हारी आँखों पर चश्मा लग गया था और कानों के पास कलमों पर सफेदी उग आई थी। बीच में भी बाल छुटपुट सफ़ेद थे। मैं कैसे पहचानती ? इतने सालों के बाद जो देख रही थी। शक्ल बदल गई थी लेकिन तुम्हारे ठहाके की आवाज़ वही थी। बालों की उस सफेदी ने ही मुझे सोचने पर विवश किया कि आखिर कितने साल हो गए होंगे हमें मिले हुए ? यानि एक-दूसरे से बिछड़े हुए ? उम्र के तीसरे चरण में पहुँच चुके थे हम। आखिरी बार हम उम्र के पहले चरण के अंतिम पड़ाव पर मिले थे। बीच में पच्चीस-तीस सालों का अंतर था। इतना वक़्त बहुत होता है स्मृतियों से किसी की छवि मिटने के लिए। यादें ज़रूर जिंदा रहती हैं पर चेहरे पहचान में नहीं आते क्योंकि उन पर उम्र की लकीरें चढ़ जाती हैं और वो पहचाने न जाने की हद तक बदल जाते हैं।
          यह महिला कौन है तुम्हारे साथ ? मैंने इसे पहले कभी नहीं देखा। स्वाभाविक है, कैसे देखती। ओह, इसकी मांग में सिन्दूर है और माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी। तुम्हारा हाथ इसके कंधे पर है। ज़ाहिर है, तुम्हारी पत्नी होगी। मेरे मन में यह दर्द सा क्यों उठा ? नहीं, नहीं, इतने वर्षों के बाद अब कैसी ईर्ष्या ? पर तुमने अलग होते हुए कहा था कि तुम कभी विवाह नहीं करोगे ? और अगर करोगे भी तो मुझ से ही करोगे। देखो मैं तुम्हारे इंतज़ार में अब तक बैठी हूँ, क्वारी। मैंने निभाया अपना वचन। कसक सिर्फ इस बात की है।
          हमने कितने वर्ष साथ बिताए, आज गिनती क्या करूँ ? लगता है, जैसे हम बचपन से साथ ही पले-बढे थे। वह बचपन नहीं तो और क्या था। इतने बड़े तो नहीं थे हम। पढ़ रहे थे, न जाने कौन सी क्लास में। पता होता कि तुम इतने साल बाद इस तरह कभी दिखोगे तो याद भी रखती। अब मेरी भी तो उम्र हो रही है। भूलने लगी हूँ चीज़ें। वैसे याद है, भूलने की एक कला तुमने भी सिखाई थी, कि जो बातें हमारे काम की नहीं, उसी समय दिमाग को कह दो कि हमें इन्हें याद नहीं रखना, इस तरह वो बातें अपने आप दिमाग से मिट जाती हैं। यह बड़ा नायाब तरीका था और हम इसे पढ़ाई के दौरान आजमाया करते थे और इस तरह पढ़ाई से इतर काफी बातें हम भूलने की कोशिश किया करते थे। भूल भी जाते थे। मेरे लिए भी अब उन पुराने दिनों को याद रखना क्या मायने रखता था, तो चला गया होगा दिमाग को स्वतः सन्देश। आज तुम दिखे हो तो फिर से ध्यान आये वो मस्ती भरे दिन, वह खेल-खिलाड़े, वह एक-दूसरे को चिढाना-खिजाना।
          याद है, तुम्हारी रूठने की आदत थी ? तुम बात-बात पर रूठ जाया करते थे। पर एक आदत तुममें अच्छी थी। तुम नाराज़गी के दिनों में चुप्पी साध लिया करते थे। जैसे यह कहावत सुनी हो, एक चुप सौ को हराए।  फिर जब तुम्हारा गुस्सा थोड़ा शांत होता तो तुम बोलते थे। पुरानी कोई बात नहीं उठाते थे। जैसे नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू।
          वह कौन सी किताब थी ? याद नहीं। शायद तुम्हारी थी। शायद कोई उपन्यास था। तुम भी पढना चाहते थे और मैं भी। एक ही समय में। छीना-झपटी में वह किताब फट गई थी और तुम्हारा गुस्सा सातवें आसमान पर था लेकिन तुम मुझे वहीँ किताब के फटे हुए पन्नों के साथ अकेला छोड़ कर चले गए थे और फिर पूरा हफ्ता नहीं मिले थे। मैंने कई बार कोशिश की थी कि तुमसे मिलूँ, तुम्हें मनाऊँ, लेकिन क्या मजाल, जब तुम गुस्से में हों तो तुम्हारे दर्शन भी हो जाएं। इस समय सोच रही हूँ, यह एक आदत तुममें शायद अच्छी ही थी। तुम्हारे वैवाहिक जीवन में तुम्हारे कितने काम आ रही होगी। इस प्रकार की समझौता प्रवृत्ति वाकई कितनी आवश्यक है, सुखी जीवन जीने के लिए, खासकर वैवाहिक।
          तुम्हें भी यह याद होगा, उस समय हम इतने भी बच्चे नहीं थे। कॉलेज में पढ़ रहे थे। पर हम कितनी फालतू की बातें किया करते थे। बस बोलना, बोलना और सिर्फ बोलना। बोलने का कितना शौक था तुम्हें और मुझे दोनों को। बोलने की लत हो जैसे हमें। आज देखो, मैं कितनी चुप्पा गई हूँ। मुझे बोलना अच्छा ही नहीं लगता, किसी से भी। तुम्हारा पता नहीं। तब हम कितने फालतू थे सच। हमारे पास वक़्त ही वक़्त होता था। याद है, एक बार तुमने कहा, आओ, घर-घर खेलते हैं। और हम बच्चों की तरह घर-घर खेले। पूरा दिन घर-घर खेलते रहे। मैंने कहा था, ' हम प्यार से घर में रहां करेंगे।'
          तुमनें कहा था, ' ज़रूर।'
          मैंने कहा था, ' हम कभी लड़ाई नहीं किया करेंगे।'
          तुमनें कहा था, ' ज़रूर।'
          मैंने कहा था, ' देखो, हम घर का काम मिल-जुल कर किया करेंगे।'
          तुमने पूछा था, ' जैसे ? '
          मैंने कहा था, ' तुम रसोई के काम में मेरी मदद किया करोगे।'
          तुमनें पूछा था, ' जैसे ? '
          मैंने कहा था, ' तुम सब्जी काटोगे, मैं सब्जी बनाऊँगी।'
          तुमने कहा था, ' ऐसी मदद ? '
          मैंने कहा था, ' हाँ, तुम आटा गूंदोगे, मैं रोटी बनाऊँगी।'
          तुम जैसे चीख पड़े थे, ' क्या ? तुम मुझसे यह काम करवाओगी ? मैं ऑफिस जाया करूंगा या यह काम करूंगा ? '
          मैंने भी चीख कर कहा था, ' मैं भी तो ऑफिस जाया करूंगी।'
          तुमनें उतनी ही कर्कश आवाज़ में कहा था, ' यह लड़कियों के काम हैं। तुम्हें करने होंगे।'
          मैंने कहा था, ' आजकल लड़के लडकी सब बराबर हैं। तुम्हें भी घर के सारे कामों में मेरा सहयोग करना पड़ेगा।'
          बस तुम फिर रूठ गए थे। और फिर हफ्ते भर की छुट्टी हो गई थी। पता नहीं, तुम इसके साथ क्या सहयोग करते होंगे ? करते होंगे भी या नहीं ? यह नौकरी करती होगी या नहीं ? कौन जाने ?
          पर आज अचानक यह बात याद आई तो मुझे हंसी आ गई है। इस रूठने-मनने के बीच हमारा प्यार गहरा होता गया था। यूं नो, फस्ट लव इज द लास्ट लव। हम लगाव के उस धरातल पर पहुँच गए थे, जहां कसमों-वादों की शुरुआत हो गई थी। मुझे लगने लगा था, मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊंगी। तुम्हें भी ऐसा ही कुछ। और हमने पूरे होशोहवास में वादा किया था कि हम शादी करेंगे तो एक-दूसरे से ही, अन्य किसी से नहीं।
          हमारी पढ़ाई ख़त्म हो चुकी थी। अब हमें अपना-अपना कैरियर बनाने की चिंता थी। हम अलग-अलग नौकरी की संभावनाएं तलाश कर रहे थे। तुम्हें अमेरिका से एक अच्छा ऑफर आया था। तुम अमेरिका चले गए थे। मुझे अपने ही शहर में एक पत्रिका में सहायक की नौकरी मिल गई थी। तुमनें जाते हुए कहा था, ' हम फिर मिलेंगे।' मैंने भी सोचा था, हम फिर मिलेंगे। लेकिन उसके बाद हम कभी नहीं मिले। मिलते भी कैसे ? तुम वहाँ जाकर ऐसे व्यस्त हुए कि सालों तुम्हारा अपने देश आना ही नहीं हुआ। कुछ अरसा खतोकिताबत चली लेकिन धीरे-धीरे तुम अपने काम में व्यस्त होते गए और मैं अपने। सच पूछो तो हमारी प्राथमिकताएं भी बदलने लगी थीं। तुम अमेरिका में अपने पाँव जमाने की कोशिश में लगे थे। तुम्हारे विचार में अमेरिका में बसना उन्नत होने की एकमात्र निशानी थी। मैं पत्रकारिता में अपना कैरियर बनाना चाहती थी। अखबार, पत्रिकाएँ, लिखे हुए शब्द मेरे मस्तिष्क में घूमते रहते, मेरा पीछा करते रहते। हमारे बीच का सम्मोहन धीरे-धीरे टूटने लगा था। हमारा कभी खेला हुआ ' घर-घर ' खेल भी मुझे यह समझाने के लिए पर्याप्त था कि तुम्हें एक कन्धे से कन्धा मिला कर चलने वाली पत्नी की नहीं बल्कि घर के रख-रखाव के लिए, घर की साज-संवार के लिए एक ऐसी औरत की ज़रुरत थी जो पत्नी का दर्ज़ा हासिल तो करे लेकिन तुमसे उस अधिकार से कोई डिमांड न करे। जो जितना तुम उसे दो, वह उतने में ही खुश रहे। आजकल के ज़माने में तुम जैसे पति कहाँ चल पाते हैं ?
          सच जानो, मैंने मुश्किलों से अपने मन को सम्भाला था और तुम्हारा इंतज़ार करना छोड़ दिया था। जिस गाँव नहीं जाना, उस के कोस क्या गिनने ? लेकिन यह भी सच जानो कि मन से तुम्हे छोड़ देने के बाद भी मन तुममें ही अनुरक्त था। बहुत मुश्किल होता है, किसी को पहले मन में बसा कर उसे मन से निकालना। मन किसी को दिखता नहीं और मन की बातें किसी को समझ में भी नहीं आतीं। बड़ी अबूझ पहेली है यह मन। मन के बहकावे में कोई न आए।
          मैं एक सर्जनात्मक लेखन की पत्रिका से जुडी थी। सोचती थी, कभी मैं भी कोई कहानी लिखूंगी, अपने प्यार पर, तुम पर। लेकिन कहानी लिखना हरेक के बस की बात तो नहीं। कई कहानियाँ मन में जन्म लेती रहीं और मरती रहीं परन्तु कागज़ पर नहीं उतरीं। आज तुम्हें देखा तो फिर से यह ख्याल आया है कि मन में भावनाएं आज भी जीवित हैं, एक खूबसूरत कहानी तो लिखी ही जा सकती है। लिखनी ही चाहिए मुझे। मानसिक धरातल पर जिया हुआ पूरा एक संसार था मेरे पास, जिसमें मिलन था, प्यार था, बिछड़न थी, बिछोह का अकेलापन था, पीड़ा थी, आंसू थे, सबकुछ था। पर फिर ख्याल आया, हम पुराने हो चले हैं। हम यानि मैं और तुम। हम दोनों अब पुराने हो गए हैं। यानि बूढ़े..... बुजुर्ग..... वरिष्ठ..... अब हमारी कहानी क्या ? जब जीने में ही कोई मज़ा नहीं रहा तो कहानी में क्या मज़ा ? यूं जीने में मज़ा तो जब युवा थे, तब ही ख़त्म होने लगा था। लेकिन फिर भी मज़े की खोज थी। आनंद की तलाश थी। परम आनंद और चरम आनंद को ढूंढ रहे थे हम कि कहीं मिल जाए तो मज़े से जीएं। हमारी खोज में वक़्त निकलता गया। हम आगे बढ़ते गए। साथ-साथ हमारी उम्र भी आगे बढती गई, पर वह आनंद नहीं मिला। उसे खोजते-खोजते हम इतना थक गए कि चूर-चूर हो गए और हमारे बीच एक मज़बूत दीवार खड़ी हो गई। मुझे तो अब कुछ याद भी नहीं। मैं यह भी नहीं जानती थी कि तुम्हे भी कुछ याद है या नहीं। ऐसी बातें कभी भूलती तो नहीं। तुमने भी अगर भुलाया होगा तो कितनी तकलीफ से भुलाया होगा। शायद तुम्हारे मन में भी यह आया हो कि मुझ जैसी कैरियरिस्ट लड़की के साथ ज़िन्दगी आराम से नहीं जी जा सकती। मुख्य है, ज़िन्दगी जीना, भविष्य सुरक्षित करना। दिल को तो आदमी कैसे न कैसे संभाल ही लेता है। दिल के दुखों की यही तो खासियत है कि चेहरे पर एक हल्का सा नकाब और पूरी पर्दादारी।

          तुम्हें नहीं मालूम था कि मैं तुम्हें कितनी देर से देख रही थी। तुम्हें उम्मीद भी नहीं होगी कि मैं वहाँ हो सकती हूँ। अचानक तुमने पीछे मुड़ कर देखा था। एक क्षण को ठिठके हों जैसे। जैसे एक पहचान सी तुम्हारी आँखों में उभरी थी। तुम्हें भी तो वक़्त लगेगा मुझे पहचानने में। उम्र की लकीरें मेरे चेहरे पर भी तो घनीभूत थीं। तुम्हारा हाथ अभी भी उस औरत के कंधे पर था। मेरे  मुरझाए हुए दिल में एक आखिरी कसक उठी थी। कभी हममें तुममें भी राह थी, कभी हममें तुममें भी चाह थी, कभी हम भी तुम भी थे आशना, तुम्हें याद हो कि न याद हो। तुमने फिर मुड़ कर देखा था। जैसे सचमुच मुझे पहचान गए हों। तुम्हारा हाथ ठिठक कर उस औरत के कंधे से हट गया था। जैसे मेरे तुम्हारे बीच अभी भी कोई रिश्ता हो और उस रिश्ते का तुम्हारे दिल में सम्मान हो। ओह, तुम्हें अभी भी कितना ख्याल था मेरा। मैं बिना किसी रिश्ते के भी उस एक पल में तुम्हारे साथ जीवन का सबसे बड़ा रिश्ता जी गई थी, प्यार का रिश्ता। दिल का रिश्ता।

Wednesday, 10 October 2012

अब तुम बरसो Kavita 72

अब तुम बरसो

मैं जन्मों की प्यासी हूँ
अब तुम बरसो गरज गरज.

मन में ज्यों कुछ कसक रहा
लगा इसे है मरज मरज.

भाग रहा विक्षिप्त ह्रदय
चुप बैठाया बरज बरज.

बलिहारी उस बंधन की
लिपटी तुमसे लरज लरज.

मोह-माया में डूब रही
जैसे मुझ पर करज करज.

अपनी गुमनामी में तुम
ज्यों कीचड में सरज सरज.

गलतफहमी Kavita 71

गलतफहमी

आज तुम्हारा प्यार
नहीं है मेरे पास
प्यार की ग़लतफ़हमी
है अभी भी
जिसे मैं जिंदा रखना चाहती हूँ
ताउम्र.

तुम इतनी दूर चले गए हो मुझ से
जहां से तुम्हारे ठहाकों की आवाज़
अब मुझ तक नहीं पहुँचती
मैं खुद को समझाती हूँ
तुमने मुझे ज़रूर पुकारा होगा
मैं ही सुन नहीं पाई.

तुम इतनी दूर हो जहां
तुम्हारा चेहरा देख न पाऊँ मैं
सोचती हूँ
तुम मेरे बिना
ज़रूर उदास होंगे
दूरी के कारण अदृश्य हो.

तुम इतनी दूर मुझ से
कि मैं सोच रही हूँ
तुमने मुझे छोड़ा नही
मेरा दिल तोड़ा नहीं
विवश हुए तुम
दूर जाने के लिए.

अब मैं नहीं पा सकूंगी
तुम्हारी बाहों का सहारा
सोचती हूँ
मुझे ज़रुरत नहीं किसी सहारे की
अब मैं समर्थ हूँ
अपनी जगह तलाशने के लिए.

शब्दों के दंश Kavita 70

शब्दों के दंश

शब्दों के दंश बहुत मारक होते हैं
तीर की तरह चुभते हैं
तेज़ धार वाली तलवार की तरह काटते हैं
चीर कर रख देते हैं गहराई से.

क्या कहा तुमने
मैं अन्यायी अत्याचारी हूँ ?
इतना तो तुमने मुझे कभी प्यार किया नहीं
जितनी मैंने तुम्हें गालियाँ सुना दीं ?

क्या कहा तुमने
मैं चिडचिडी बददिमाग हूँ ?
इतना तो तुम मुझ पर कभी रीझे नहीं
जितनी मैंने तुम पर खीज निकाली ?

क्या कहा तुमने
मैं जिद्दी और पाखंडी हूँ ?
इतना अधिकार तुमने मुझे कभी दिया नहीं
जितना मैंने छीन-झपट के लिया ?

क्या कहा तुमने
मैं झूठी मजमेबाज हूँ
इतनी हमदर्दी कभी तुमने मुझसे चाही नहीं
जितनी हमदर्दी मैंने लोगों से चाही ?

कहो कहो, जो कहना है, तुम ही कहो
कटघरे में तो आज तुम ही खड़े हो
अपने पक्ष में जुटाओ दलीलें तुम
फैसले की घड़ी आनी बाकी है.

Tuesday, 9 October 2012

यह मत समझना Kavita 69

यह मत समझना

जब भी आते हो तुम याद
झटक देती हूँ दिमाग को
व्यस्त हो जाती हूँ अन्य कहीं.
पर यह मत समझना
मेरा दर्द कम हो गया है.

हर वक़्त हंसती रहती हूँ
बच्चों-सी खिलखिलाहटें
मेरे चेहरे पर बिछलती हैं.
पर यह मत समझना
आंसू सूख चुके हैं मेरी आँखों में.

तुम्हारे बिना जीने की आदत
डाल ली है मैंने
हो गई हूँ नितांत अकेली.
पर यह मत समझना
बहुत साहसी हूँ मैं.

भगवान् पर विश्वास करती हूँ
वह रखेगा हमेशा मुझे छाँह में
तपिशों से दूर.
पर यह मत समझना
मुझे डर नहीं लगता.

सुलझा लेती हूँ मैं
जीवन में आई हर मुश्किल
संवार लेती हूँ बिगड़े हुए काम.
पर यह मत समझना
मेरे मन में कोई उलझन नहीं.

तुम्हारे बिना
मर जाऊंगी मैं
मैंने ऐसा तो नहीं कहा.
पर यह मत समझना
इस बात की कोई सम्भावना नहीं.

Friday, 5 October 2012

तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे (कहानी)

तेरी महफ़िल में लेकिन हम  होंगे (प्रकाशित : पुष्पगंधा)

          तो यह उसने आखिरी पत्ता फेंका है, कि उम्र से उसे कोई ऐतराज़ नहीं, कि उसके बड़ी होने से उसे कोई परहेज़ नहीं, परहेज़ है उसमें उम्र के हिसाब की गंभीरता होने से. क्या इतनी बड़ी होने पर भी वह चंचलता और जीवन्तता से भरपूर है, इसलिए ?
          उसका पत्र पा कर वह दंग रह गई. यह तो कमाल ही हो गया. उसका जीवन्तता और गर्माहट से भरा होना उसे नागवार गुज़रा है. बुझी हुई, बेजान होती तो उसे रास आती शायद. ऐसा प्यार करने वाला देखा, सुना.
          प्यार करने वाला नहीं, प्यार करके प्यार को धिक्कारने वाला.

          उसने कई बार महसूस किया था कि उसके प्यार में कुछ ठंडापन रहा है धीरे-धीरेएक ठहराव. वह जब भी मिलता है, कुछ बुझा-बुझा सा रहता है. उसने कई बार कई तरह के कारण बताए. मसलन कभी...... रात वह ठीक से सो नहीं पाया. कभी...... उसकी तबीयत ठीक नहीं है. कभी...... उसे कई काम करने हैं. आदि आदि. उसका पूछना बंद नहीं हुआ पर उसके कारण शायद ख़त्म होने लगे तो उसने कहना शुरू किया, ' कम्प्लेंट रजिस्टर ला कर रख दूंगा. उसमें रोज़ शिकायत दर्ज करती रहना. बहुत शिकायत करती है तू.'
          हाँ, वह उसे ' तू ' कह कर ही बुलाता था. शुरू में उसे अजीब लगा था. कोई भी उसके नाम के आगे ' जी ' लगाना नहीं भूलता. एक दिन उसने पूछ ही लिया, ' मैं बड़ी हूँ तुमसे. तुम मुझे ' तू ' कहते हो ? '
          ' प्यार करता हूँ तुझसे.'
          ' फिर भी...... '
          ' जब मुझे पता चला कि तू मुझसे बड़ी है, इतनी ज्यादा पढ़ी-लिखी है, मैंने तभी सोच लिया था कि अगर मैंने तुझे ' तुम ' या ' आप ' कहा तो तू बस में नहीं आने वाली.'
          ' ओह्हो, तो यह बात है. मुझे बस में करके तुम्हें क्या करना था ? '
          ' प्यार, और क्या...... ' तू ' कहने से लगता है, तू मुझसे छोटी है और मैं तुझसे बड़ा.'
          प्यार करने के लिए उसने क्या-क्या सोच रखा था. अपने से बड़ी औरत के साथ प्यार करने के लिए पहले वह उसे समान धरातल पर लाएगा, ख्यालों में ही सही, बाद में कुछ और. इसीलिए शायद जैसे-जैसे उसकी साँसों में उसकी उम्र का अहसास घुलने लगा, वैसे-वैसे वह बुझने लगा. धीरे-धीरे उसकी उसमें रूचि कम होने लगी. वह मिलने, बात करने के बहाने सोचने लगा.
          वह उससे कहती, ' क्या बात है, अब तुम फोन भी नहीं करते ? ' कहती, मतलब एस एम एस करती.
          उसका तुरंत जवाब आता, ' सेक्सी बेबी, सब्र कर, काम में लगा हूँ, जल्दी फोन करूंगा.'
          तो अब वह उसे ' सेक्सी बेबी ' बुलाने लगा, जैसे उसका मज़ाक उड़ा रहा हो कि देख तू कितनी सेक्सी है, कितनी गन्दी है...... जबकि बात करने में सेक्स का कोई मतलब ही नहीं था.

          यूं सेक्स की बात उसी ने की थी, दोस्ती की शुरुआत में ही. वह उसे यहाँ-वहाँ छू-छेड़ रहा था. वह भी तो देखो, उससे मिलने के बाद बच्ची हो गई थी. उम्र की भी लाज-शर्म नहीं रही थी उसे. यूं वह रोमैंटिक और दिलफेंक थी, गज़ब की. उसे कभी-कभी लगता था, उसकी सिर्फ उम्र बढ़ी है, वैसे वह अभी-अभी युवा हुए बच्चों जैसी भावुक है. एक बार उसने उससे भी कहा था, ' लगता है, मेरे भीतर कोई छोटी लड़की छुपी बैठी थी, चुपचाप सोई हुई. तुमने आकर उसे जगा दिया.' यह बात कहते ही उसे खुद लगा था कि प्यार में बहकने के दिन कमउम्र लोगों के नसीब में लिखे होते हैं. उम्रदराज़ लोगों को यह शोभा नहीं देता.
          ' सच ? '
          ' सच.'
          वो दोनों एक-दूसरे में लिपटे बैठे थे. फिर कैसे क्या हुआ, वह समझ नहीं पाई. उसके मुंह से निकला यह, 'हटो, गंदे कहीं के.'
          ' इसमें गंदे की क्या बात ? तू मेरी है, मैं तेरा हूँ.'
          ' तुम्हें शर्म नहीं आएगी ? बड़ी हूँ तुमसे.'
          ' फिर क्या हुआ ? तुझसे प्यार करता हूँ. इसमें शर्म की क्या बात? आय एम टिपिकल मेल, यू नो ? '
          ' मेरे साथ ऐसे नहीं चलताछोड़ो...... '
          ' ऊँ हूँ, प्यार में सेक्स भी होता है.'
          ' देअर इज डिफ़रेंस बिटवीन हैविंग सेक्स एंड मेकिंग लव.'
          ' तो...... '
          ' वी विल नौट हैव सेक्स, वी विल मेक लव.'
          ' ओह, तो कान इधर से नहीं, उधर से पकड़ना है.'
          और उन दोनों के बीच जो अनहोना था, वह हुआ. और खूब जम के हुआ. खूब दिल से हुआ. एक बार नहीं, बार-बार हुआ. हर रोज़ हुआ. उफ़ उफ़, उसे छोटा कह कर तो वह ऐसे डर रही थी जैसे वह अछूता अनाड़ी हो.
          ' तू तो ज़रा भी बड़ी नहीं है. यह तो बस तेरी उम्र कुछ खिसक गई आगे. यार, तू तो अच्छी-अच्छी लड़कियों को मात दे दे,' पहली बार के बाद उसने कहा था, एकदम बाद, जब वह कुछ बोलने की स्थिति में हुआ तो.
          दूसरी बार के बाद उसने कहा था, ' हमें एक साथ रहना चाहिए, एक ही घर में, एक ही छत के नीचे, चाहे इसके लिए मुझे तुझसे शादी ही क्यों करनी पड़े.'
          उसके बाद याद नहीं कितनी बारों के बाद वह कहता रहा था, ' जन्मों तक मिलेंगे हम, जनम जनम, हर जनम.'
          लेकिन अंतिम बार के बाद उसने यह कहा था, ' सुन, इस जनम में मैं तुझसे पहले मरूंगा ताकि अगले जनम में तुझसे पहले पैदा हो सकूं. और फिर हम मिलेंगे सही उम्र में.'
          अच्छा है, वह जन्म-जन्मान्तर में विश्वास रखता है. कम से कम आस तो बंधी रहती है.

          उसे तभी समझ लेना चाहिए था कि उम्र की खाई को आसानी से पाटना किसी बड़े से बड़े जिगरे वाले के बस की बात नहीं है. उसने चाहे जो भी कहा हो, असलियत यही है कि उम्र ही है वह असली तत्व जिसने उससे यह लिखवाया है...... यह कि ' उसे ऐतराज़ उसकी उम्र से नहीं, उसमें उम्र के हिसाब की गंभीरता होने से है.'
          उसे इस बात से कोई शिकायत नहीं कि वह उसकी उम्र को नहीं स्वीकार रहा. बल्कि उसे शुरू में शिकायत इस बात से रही कि आखिर उसने उसकी उम्र को स्वीकारा ही कैसे ? वह दो बच्चों की माँ. ठीक है, अकेली है, पति या प्रेमी नाम का कोई जीव-जंतु उसके जीवन में नहीं है. वह स्वतंत्र है किसी से भी प्यार करने के लिए लेकिन...... यह एक बहुत बड़ा लेकिन था उसके छोटा होने के सन्दर्भ में...... उम्र के इतने फासले पर खड़े उससे तो कभी नहीं.
          उसने कभी चाहा ही नहीं था कि कोई लड़का या पुरुष उसकी ज़िन्दगी में आए और उससे प्यार करे (या प्यार का नाटक करे). प्यार-व्यार के मामलों से वह कोसों दूर थी. उसे ज़रुरत ही नहीं थी इस सब की. उसके सामने अपने बच्चों की ज़िन्दगी संवारने और उन्हें सही दिशा देने का मुद्दा अहम् था. उसने एक बार सोचा था, उससे मिलने के बाद ही, उसने यदि कोई ऐसा कदम उठाया तो अपने ऐसे लच्छनों से वह अपने बच्चों को क्या संस्कार दे पाएगी ? कौन सी मिसाल कायम करेगी वह ? नहीं, नहीं, उसे कुछ ऐसा नहीं करना जिससे बच्चे उस पर हंसें या उससे नफरत करें. हाँ, कभी लम्बे अरसे तक उसने अकेलापन महसूस किया होता और उसे किसी के साथ की ज़रुरत महसूस हुई होती तो वह अवश्य बच्चों को समझाने और उनका मूड बनाने की कोशिश करती ताकि वे उसकी ज़िन्दगी में आए किसी व्यक्ति को अपना सकते. बच्चे समझदार हैं, समझ सकते हैं पर इसके लिए तो कदापि नहीं. इसका उसे शुरू से कोई भरोसा नहीं लग रहा था कि यह उसके साथ टिक पाएगा, हमेशा के लिए तो दूर, एक लम्बी अवधि के लिए ही चाहे. उसका मानना था, उसका क्या, सभी मानेंगे इस बात को कि कोई भी जवान लड़का इतना मूर्ख नहीं होता कि अपने से बड़ी उम्र की औरत से प्यार करे, वह भी ऐसी जिसके बच्चे भी हों. यदि कोई ऐसा करता है तो इसके पीछे उसका कोई स्वार्थ अवश्य होगा. तर्क-बुद्धि, मनोविज्ञान, शिक्षा, अनुभव, सब इस बात की पुष्टि करते हैं. उसने भी ऐसा ही कुछ सोचा था कि यह जो मुझसे दोस्ती करने के लिए आगे बढ़ रहा है, तो ज़रूर इसके पीछे इसका कोई स्वार्थ होगा.
          आज जब उसने लिखा है कि उसमें उम्र की गंभीरता नहीं तो वह उसे याद दिलाना चाहती है कि उसकी उम्र की गंभीरताशालीनताआभिजात्य को उसने ही भंग किया हैपहली मुलाकात में हीवह बहुत ग्रेसफुली अपनीउम्र में आगे बढ़ रही थीयह सही है कि वे एक-दूसरे को पत्रों के माध्यम से जानने लगे थेउनके मनों में एक-दूसरे के प्रति प्यार भी जागा थापरन्तु पहली बार मिलने के बाद उसे ऐसा कतई नहीं लगा था कि इस लड़के के साथ कोई रिश्ता संभव होगामन ही मन उसे इस बात का अफ़सोस भी हुआ था कि  दोनों के बीच उम्र का इतना फासला क्यों है ? चिट्ठियों में तो नहीं लगा थाक्या सच में चिट्ठियाँ उसने ही लिखी थीं ? इसकी आवाज़ भी फर्क है. एक बार फोन पर बात हुई थीतब तो कुछ बड़ा सा लगा थाकितनी अजीब बात हैलगता हैये तीन अलग-अलग लड़के हैंएक चिट्ठियों मेंदूसरा फोन परतीसरा यह.
          ' आपको कौन सा पसंद है ? '
          उसका मन हुआ, कह दे, ' तीनों.' चंचला तो वह है ही. पर उसने कहा यह, ' कोई भी नहीं.'
          ' कोशिश करता हूँ, कोई एक तो पसंद आए.'
          वह कुछ बोली नहीं. उसने मन को समझा लिया. इस लड़के के लिए भटकना ठीक नहीं है. बहुत छोटा है......
          कहाँ से छोटा हो गया ? पूरा मर्द है. दुनिया देखा-भाला......
          फिर भी......
          मरो अब तुम ' फिर भी ' के चक्कर में......
          उसने सोचा था, एक साथ कहीं बैठ कर चाय-वाय पिएंगे, कुछ बातें करेंगे औपचारिक, और फिर अपनी-अपनी राह. दुश्वार हो गया उस लड़के को अपनी कार में लिफ्ट देना.
          कार में बैठते ही उसने कहा, ' आप बहुत खूबसूरत हैं,' और कहता चला गया, जैसे वारी-वारी जा रहा हो,  ' आप बहुत खूबसूरत हैं, सच, आप बहुत खूबसूरत हैं...... '
          ' बस भी करो, कितनी बार कहोगे ? इतनी भी खूबसूरत नहीं हूँ मैं.'
          पर उसे पता था, वह सुन्दर है. उम्र की ढलान पर होने के बावजूद वह सुन्दर है. उसकी देहयष्टि बहुत आकर्षक है. इसके साथ ही बहुत शालीन, कुलीन, गरिमामय, भद्र, अभिजात...... उसका बस चले तो वह खुद अपनी तारीफ़ में विशेषणों के ढेर लगाती चली जाए.
          ' मैं ड्राइव करूँ ?' वह पूछ रहा था.
          ' के.' दोनों कार से उतरे और सीट बदल कर फिर बैठ गए.
          उसे लग रहा था कि वह भी उसी तरह की मनस्थिति में होगा, जिस तरह की मनस्थिति में वह थी. यानि उम्र के प्रति सजग, सचेत, डरा हुआ. लेकिन यह क्या ? उसने तो उसे तहेदिल से स्वीकार किया. जो जितना कार में हो सकता था, वह सब उसने किया. बहुत प्यार से कह-कह कर किया, ' मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ, तुम्हारे शब्दों ने बांधा है मुझे. मुझे मालूम है, तुम भी मुझसे प्यार करती हो, बस कहने में डर रही हो.' और भी ऐसा ही कुछ, बहुत कुछ. कार में प्यार करने में तो वह बहुत माहिर निकला. लेकिन वह इसके लिए मानसिक रूप से बिलकुल तैयार नहीं थीउसे उम्मीद नहीं थी, ऐसा कुछ होगा. वह तो उसकी ओर से एक बड़ा नकार सोच रही थी. वह घबरा गई थी, मुफ्त का माल समझा है क्या ? सड़क पर पड़ा हुआ, लावारिसअपने साथ एक तरह का बलात्कार हुआ महसूस कर रही थी वह. अब किसे पुकारे ? किससे कुछ कहे ? जो सुनेगा, उसे ही दोष देगाइस उम्र में इतनी नादान ? दो बच्चों की माँ इतनी नासमझ ? बिना जाने-पहचाने, अभी कुछ देर पहले तो उतरा है वह हवाई जहाज़ से, उसके हाथ में कार की चाबी पकड़ा दी ? सब-कुछ छीन-छान के भाग जाता तो ? कहीं मार डालता तो ?
          अब उसका ऐसा पत्र पाकर उसने सोचा, हाय, वह उस दिन उसे मार ही डालता. पास बैठा था, उसका गला घोट देता. कैसे भी उसकी जान ले लेता, लेकिन दिल ही मिला उसे घोटने के लिए ? चोट पहुंचाने के लिए ? दिल के सिवा उसे कुछ नज़र नहीं आया, जिस पर वह वार करता ? सच पूछो तो वह एक शरीफ इंसान था. भौतिक वस्तुओं में उसकी कोई रूचि नहीं थी. चोरी-चकारी में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी. वह तो सिर्फ दिल चुराने आया था क्योंकि बाद में उसे दिल को ही तो चीर कर रखना था. उसका निशाना सिर्फ उसका दिल था. शरीर तो माध्यम भर था उस दिल तक पहुँचने का. ' लिसेन माय यंगेस्ट लवर, किसी के दिल के साथ खिलवाड़ करने और उसे तोड़ने की सज़ा पाने के लिए जेल नहीं जाना पड़ता क्योंकि यह एक अपराध नहीं होता, यह पाप होता है, जिसकी सज़ा अदालत नहीं, खुदा सुनाता है. तुम सज़ा के पात्र हो. क्या तुम्हे सज़ा इसीलिए मिले क्योंकि इस खून में मेरी लाश नहीं मिली ? यह दिल का मामला था, मेरे दिल के दुश्मन,  दिल की लाशों का हिसाब वह ऊपर वाला रखता है.'

          मिलने से पहले उसने एक बार लिखा था, ' मिलने पर अपने मन की सब निकाल लेना. कहीं बाद में अफ़सोस करो, हाय, हमने यह तो किया ही नहीं.' आज उसे अफ़सोस हो रहा था, हाय, हमने यह सब किया ही क्यों ? आज वह यह भी सोच-सोच कर हैरान-परेशान थी, जो लड़का अपने से इतनी बड़ी भद्र महिला के साथ प्रेम निवेदन करने का दुस्साहस करे, प्रेम निवेदन तक ही सीमित रहे, सोचो, वह कितना बड़ा घाघ होगा. यानि फ्रौड़. यानि बदमाशों का बदमाश. यानि कमीनों का कमीना. फिर भी...... फिर भी...... वह उससे प्यार करने की नादानी कर बैठी. प्यार भी ऐसा-वैसा नहीं, दिल से दिल का प्यार. दिल की गहराइयों में डूब-डूब कर करने वाला प्यार. चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाला प्यार. लगता है, किसी ने कहा है या उसने कहीं पढ़ा है या उसने ही यह कहावत गढ़ी है कि लडकियां इस धरती पर सबसे मूर्ख प्राणी होती हैं. वो बहुत ही दिलफेंक लड़कों की तरफ आकर्षित होती हैं. वो प्यार के लिए उन लड़कों की तरफ भागती हैं जो प्यार के कतई काबिल नहीं होते. दोज़ हू आर नौट वर्थ लविंग. वो हमेशा बंद दरवाज़े क्यों खटखटाती हैं ? ' छैल-छबीले, तूने अपनी छैल-छबीली के दिल की ज़रा कद्र नहीं की.'
          बेवक़ूफ़ होने के लिए कोई उम्र तय नहीं होती. आप किसी भी उम्र में बेवक़ूफ़ हो सकते हैं. कहाँ तो वह बलात्कृत महसूस कर रही थी. सोच रही थी, किसको पुकारे, किससे कुछ कहे. कहाँ उससे अलग होते ही वह अकेले में शरमा-शरमा कर, हंस-हंस कर, नाच-नाच कर, झूम-झूम कर उसकी छुवन को अपने शरीर के कोने-कोने में तलाश रही थी. मैं जन्मों की प्यासी हूँ, अब तुम बरसो गरज गरज. वह पागल थी. अनेक पत्र और एक मुलाक़ात उसे पागल बना देने के लिए पर्याप्त थी. वह खुद को शीशे में देख रही थी. खुद पर ही मुग्ध हो रही थी. तो...... तो...... उसने मुझे रिजेक्ट नहीं किया. आय लव यू. आय लव यू. आय लव यू. उसने शीशे पर अपने अधर रख दिए. जैसे खुद को ही चूम रही हो. यह क्या, वह तो सचमुच उससे प्यार करने लगी थी. पगली कहीं की. अपनी उम्र तो देख. और उसकी उम्र देख. अपनी शक्ल तो देख. और उसकी शक्ल देख......  अब आया है ना, इतना बड़ा रिजेक्शन. अब आई है ना इतनी बड़ी धिक्कार, दुत्कार, फटकार.

          उसकी पहले दिन की कार्यवाई एकमात्र ज़िम्मेदार थी उसकी आगे आने वाली खुशियों और तकलीफों की. प्रेम में पड़ने के साथ-साथ वह जिद में भी गई थी. ' तुझे उम्र से कोई फर्क नहीं पड़ता ना ? तो अब झेल मुझे. मैं तुझे छोडूंगी नहीं, ड्रामेबाज़. अब मैं देखूँगी तुझे कि तू कितने पानी में है. कि कितनी मर्दानगी है तुझ में. कि तू कितना नीचे गिर सकता है. (मैं नहीं गिरी. मेरे गिरने को गिरना नहीं कहा जाएगा क्योंकि मैं तो तुझसे प्यार करने लगी थी.) अब मैं देखूँगी तुझे...... और फिर एक दिन उतारूंगी तेरे चेहरे का मुखौटा. तुझे कहना पड़ेगा कि हाँ, तू मुझसे प्यार नहीं कर रहा था, बल्कि एक ढोंग कर रहा था.' लो, वह दिन ही गया. इतनी जल्दी वह अपना मुखौटा उतार फेंकेगा, उसे यकीन नहीं था.

          शुरुआत बुरी नहीं थी उनके उस अवांछित, अनपेक्षित सम्बन्ध की, जिसका अंत इस बुरी तरह होना था. उस सम्बन्ध में मधुरता बहुत थी. मानना पड़ेगा, जितने दिन ज़िन्दा रहा, शहद टपकता रहा. जितनी देर वो साथ रहते, खिलखिलाहटें उनके इर्द-गिर्द टहलतीं. वह उसकी ज़िन्दगी में क्या आया, उसकी तो हंसी ही नहीं रूकती थी. वह ही तो सबब था उसकी अगम्भीरता का, उसके बचपने का. अब पूछो कोई उस झल्ले से, जब लड़का-लड़की इस हद तक मिलेंगे कि कोई हद ही रहे उनके बीच, तो रौनकें छाएंगी या मुर्दनियाँ ?
          एक दिन वह उससे बोली थी, अपने बच्चों का हवाला देकर, ' मैं मर जाऊं तो तुम इनका ख्याल रखना. तुम इनके बड़े भाई जैसे हो.'
          ' मरने की बात मत कर.'
          ' तुममें कई रिश्ते गडमड हैं.'
          ' जैसे...... '
          ' जैसे पुत्र का, जो मैंने अभी कहा...... पिता का, जब तुम रेस्टोरेंट में मुझे बीअर नहीं पीने देते...... भाई का, जब उस दिन हाथ पकड़ कर तुमने मुझे सड़क पार कराई थी...... सखा का, जब उस दिन तुम मेरे घर मेरे फेवरेट पीले रंग की कमीज़ पहन कर आए थे और मैंने भी पीला सूट पहना हुआ था...... पति का, जब तुम खूखार नज़रों से मेरी ओर देखते हो...... प्रेमी का, जैसे तुम रोज़ मुझे अपनी बाहों में बांधे रखते हो..... सहयोगी का..... '
          ' बस बस, बहुत हो गए, इतने कहाँ संभाल पाऊंगा...... '
          उसने अपनी बाहें उसके गले में डाल दी थीं और बोली थी, ' तुम सिर्फ प्रेमी का ही रिश्ता सही से निभा लो, मैं उसी में खुश हूँ.'
          ' वो तो निभाना ही पड़ेगा. तू गले जो पड़ी है.' उसने उसकी बाहें अपने गले में और कस कर कहा था
         
फिर वो दोनों एक-दूसरे में गडमड हो गए थे. उस दिन बीअर दोनों ने साथ बैठ कर पी थी. सीडी प्लेअर पर मेंहंदी हसन लगाया था. मोहब्बत करने वाले कम होंगे. तेरी महफ़िल में लेकिन हम होंगे. उसने बीअर के हल्क़े-फुल्क़े खुमार में बार-बार उसके गले में बाहें डाली थीं और बार-बार खुद भी गाया था, ' सच कहती हूँ, तेरी महफ़िल में लेकिन हम होंगे. तेरी महफ़िल में लेकिन मैं होंगी. लेकिन, मेरी महफ़िल में तुम हमेशा होंगे. मोहब्बत करने वाले तुम ही होंगे.'
          उस चुलबुली को बहकने के सिवा और आता ही क्या था. उम्र बढ़ रही थी और चुलबुलापन जा ही नहीं रहा था. आखिर खो ही दिया ना उस मनहूस को
          ' हाय राम ! अब मैं क्या करूँ ? ' वह रुआंसी थी.
          ' अब तू माला जप. उसके नाम की नहीं, भगवान् के नाम की. ताकि वह तुझे सद्बुद्धि दे और तू अपने से छोटे लड़के की तरफ ध्यान देना बंद करे.'
          ' यह कौन बोला ? '
          ' अपने भीतर झाँक.'
          ' ओह ! जय जय शिव शंकर. काँटा लगे कंकर...... '

          आज सचमुच में वह महफ़िल उजड़ने का दिन गया था. उसका पत्र उस एक लाइन में ही समाप्त नहीं हो गया था, उसने आगे लिखा था, ' तूने ये शब्द सुने होंगेन्हेरी दा बुल्लातरथल्लीतो वह है तूतेरे भीतर-बाहर हर वक़्त एक हलचल मची रहती है. तेरी इतनी हलचल देख कर मैं बुझ जाता हूँ. मैं शांतिप्रिय हूँ. इतना लाउड नहीं हूँ. तुझमें और मुझमें आधारभूत अंतर है, ज़मीन आसमान का. तेरे मेरे बीच का यह अंतर मैं पाट नहीं सकता. अगर तू चाहे तो मैं आगे से तुझे ' आप ' बुलाया करूँ ? अगर तू दोस्ती में विश्वास रखती है तो मुझे दोस्ती मंज़ूर है.'         
          हे भगवान्, यह सब लिख कर उसने बदतमीजी की हद पार की थी. नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज को चली थी. उसे क्षमा करना प्रभु, वह नादान था. उसे प्यार करने की समझ ज़रूर थी पर उसे अच्छे-बुरे, सही-गलत का ज्ञान नहीं था. वह सिर्फ अपने मन की करना चाहता था. उसने वह हर संभव काम किया था जो उसे बेचैन करने, उसकी शान्ति हरने के लिए उत्तरदायी था. या तो वह उसे नज़रंदाज़ करता था, जिसकी भनक उसे शुरू में ही लग गई थी. (जब बार-बार किसी को कहना पड़े, मुझे फोन करो, मुझे पत्र लिखो, मुझसे मिलो, तो समझ लो, रिश्ते का अंत गया है. उसे ज़बरदस्ती कितना आगे तक खींच पाओगे ? ) या उसके प्रति अपने को प्रेमातुर दिखाता था.
          उस दिन उसकी प्रेमातुरता चरम सीमा पर थी. अपने शहर वापस लौटने से पहले वाले दिन, अपने मिलन के आखिरी दिन वह आया था, उसके हाथ में लाल गुलाबों का एक बड़ा गुच्छा था. उसने एक-एक गुलाब निकल कर उसे दिया था और बोला था, ' यह उस दिन के लिए जब...... और यह उस दिन के लिए जब...... और यह उस दिन के लिए जब...... उसके सामने लाल गुलाबों का ढेर लग गया था. वह फिर बोला था, भारी आवाज़ में, ' तू इन फूलों को समेट कर, इन दिनों को सहेज कर मेरे वापस आने तक संभाल कर रखना. मैं जल्दी आऊँगा.' आवाज़ में भारीपन ऐसा कि आंसू अब छलके, अब छलके.  यह क्या,वे कार में बैठे तो अश्रु धारा उसके गालों पर फिसल रही थी. वह उससे लिपट गया था और भीगी आवाज़ में कह रहा था, ' ये आंसू आज पहली बार निकले हैं किसी के लिए, तेरे लिए.'
          वह उस दिन अपेक्षाकृत शांत थी. उसके ह्रदय में गहरे कहीं खुद गया था कि इस रिश्ते में अब दम नहीं है. उसकी रोज़-रोज़ की बेरुखी से वह मुरझाई हुई थी. इतने ज्यादा इमोशनल ड्रामे की उसे उम्मीद भी नहीं थी. लेकिन लाग-लपेट उसने उतना ही दिखाया, जितना वह दिखा रहा था. बल्कि उसके विदा लेते-लेते तो वह वापस पुराने ढर्रे पर गई थी और मन ही मन अफ़सोस करने लगी थी कि क्या पता, वही उसे समझ पाई हो. उसके मन में शायद इतना ही लगाव हो. लेकिन अब उसने जो दोस्ती भरा हाथ बढ़ाया है तो वह भीतर से पीड़ित, आहत, बिखरी हुई, टूटी हुई उससे पूछ रही है, जैसे वह उसके सामने खड़ा हो और वह उसे संबोधित करके कह रही हो, ' बेईमान, दोस्ती ही करनी थी तो उस दिन पीले गुलाब क्यों नहीं लाए ? लाल गुलाब देकर फिर एक गलतफहमी क्यों सौंप गए थे ? '
          तो ऐसा था वह. एकदम गरम या एकदम नरम. एकदम मोहाविष्ट या एकदम निर्मोही. एकदम मीठा या एकदम खट्टा. एकदम सजग या एकदम सिरफिरा. बीच का कोई रास्ता उसके पास था ही नहीं. यही उसका स्वभाव था.
          उसने अपने को शांतिप्रिय लिखा था. पर सचाई यह थी कि बचपने से भरपूर था वह. चाइल्डलाइक नहीं. चाइल्दिश. हर वक्त कुछ कुछ बोलते रहना शांतिप्रिय होने की निशानी है क्या ? क्या वह वाकई लाउड नहीं था? खुद को बेवजह ज़ाहिर करने वाला ? फिर, उससे पूछे कोई कि यह किसने कहा था..... ' तुम्हारे बच्चों का ख्याल होता तो तुम्हें उठा कर ले जाता..... ' और यह..... ' तुमसे शादी करूंगा तो मुझे एक रेडीमेड फैमिली मिल जाएगी, वाओ...... ' और यह..... ' दहेज़ में तुम कार तो लाओगी ही..... ' यूं उसकी बातें उसे कभी बुरी नहीं लगीं, अच्छी ही लगती थीं. वह जो भी कहता, वह रीझती ही. वह यह भी सोचती, हो सकता है, इतना मनचला वह उसके ही सामने हो, बाकी सब के सामने धीर-गंभीर रहता हो. प्यार चंचल बना देता है. यह उसे भी तो सोचना चाहिए था. हमें जीवन में वैसे ही लोग नहीं मिलते, जैसों की हमें आदत पड़ी होती है. भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग मिलते हैं जिनके साथ हमें हंस के निभाना होता है. यह भिन्नता ही तो जीवन में रस भरती है. पर उसने क्या लिख दिया...... ज़मीन आसमान का अंतर...... यानि दो अलग-अलग धुरियाँ और वह इस अंतर को पाट नहीं सकता...... भई, तुम सीधा ही कह दो, मैं तोड़ रहा हूँ. यह कौन सा ऐसा गुनाह है, जो तुम फांसी पर चढ़ा दिए जाओगे. इस दुनिया में रोज़ दिल टूटते हैं. किसी को पता भी नहीं चलता. टूटा हुआ दिल लेकर लोग सारे काम करते हैं और कोई जान भी नहीं पाता कि वे भीतर खून के आंसू रो रहे हैं. चीज़ें समय के साथ ख़त्म होनी ही हैं पर जिस तरह उसका प्यार ख़त्म हुआ, इस से बेहतर होता, वह मर जाती, सचमुच की मौत. यह जीते जी मरने वाली मौत नहींजो उसने उसे दी.
          उस मनमौजी का अपना मन होता था तो पूरा-पूरा दिन उसके साथ बिता देता था. उसका मन हो तो जिद करते रह जाओ, पांच मिनट के लिए नहीं मिलेगाउस दिन बैठे थे वो दोनों उस रेस्टो-बार में. हैप्पी आवर में जाना उसे बहुत पसंद था. शराब अच्छे रियायती दर पर मिलती थी. पर शराब वह पीता नहीं था. पीता था सिर्फ बीअर. है तो वह भी आखिर शराब ही. वह बेचारी निम्बू पानी से काम चलाती. इस मामले में वह बड़ा भारतीय संस्कारों वाला था. जैसे वह उसकी बीवी हो जो घर से बाहर होटल में बैठ कर बीअर नहीं पिएगी. बीअर के साथ मुफ्त में मूंगफली आती थी. उसे पसंद था फिश टिक्का और चिकन टिक्का. कितनी तो बीअर पी जाता था वह. चढ़ने का नाम नहीं. तो उस दिन सच कमाल हो गया. लंच भी वहीँ, डिनर भी वहीँ, बीच के हैप्पी आवर भी वहीँ. दोपहर के दो बजे से रात के नौ बज गए थे. उन्हें यह ख्याल ही नहीं आया कि बार वाले हैरान हो रहे होंगे. वो कपल के रूप में कपल नहीं लगते थे. इतनी बड़ी औरत इस लड़के के साथ इस शराबखाने में क्या कर रही है ? ओह्हो, इसे शराबखाना कह कर इसकी तौहीन करो. यह एक फाइव स्टार होटल का शानोशौकत से भरा रेस्टो-बार है. वहाँ निश्चित ही सबने सोचा होगा, यह अमीर महिला इस लडके को साथ लेकर बैठी है. पैसा लुटा रही है. ऐय्याशी के लिए लड़का पाल रखा है. कहीं यह जिगैलो तो नहीं ? कॉल ब्वाय ? लौंडेबाजसाली. उसने सोचा था, वह आगे से ध्यान रखेगी इन सब बातों का. बदनामी वगैरा का. वह तो परदेसी था. उसके पास खोने को क्या था. पर वह तो उसी शहर की थी......
        शायद बातें करना ही उसका स्वार्थ हो. वह बातूनी बहुत था. बोले बिना रह ही नहीं सकता था. उस के रूप में उसे एक अच्छी श्रोता मिली हुई थी. वह लगातार बोलता रहता, वह लगातार सुनती रहती. इस शहर में उससे बोलने-सुनने वाला कोई नहीं था. उसे उस पर तरस भी आया था. वह यहाँ अकेला है, कितना अकेला, मेरे सिवा कौन है उसका यहाँ ?

          उसके पत्र ने उसे इतना व्याकुल किया कि वह अकेली ही उठ कर फिल्म देखने चली गई. हालाँकि फिल्म देखने का उसे कोई शौक नहीं. बस टाइम पास करने के लिए चली गई. वक़्त काटे नहीं कट रहा था, वक़्त काटने के लिए चली गई. मन बहल नहीं रहा था, मन बहलाने के लिए चली गई. उसने फिल्म ' बरफी ' देखी तो फूट-फूट कर रोते हुए देखी. उसका तारतम्य बैठा, औस्टीज्म बीमारी की शिकार नायिका के साथ. वह भारी मन से घर लौटी. उसके ख्यालों में सिर्फ वह ही वह. उसका अपना वह. रात को सपने में क्या देखती है कि वह उसके साथ सोई हुई है एक ही बिस्तर पर, उसकी ऊँगली में अपनी ऊँगली फंसा कर. उसने आगे देखा, वह ट्रक पर सवार जा रहा है, उससे पीछा छुड़ा कर. वह नादान समझ भी नहीं पा रही उसकी मंशा और ट्रक के पीछे दौड़ी चली जा रही है पुकारती हुई, बफ्फी......  बफ्फी...... घबरा कर उसकी आँख खुल गई. उफ़ ! बस इतना सा ही तो सहारा चाहिए था उसे, ऊँगली में ऊँगली फंसाने जितनावह कितनी उस औस्टीज्म की शिकार नायिका जैसी है. फिल्म की नायिका का बफ्फी उस पर तरस खा कर उसके पास लौट आया. लेकिन उसका बफ्फी कभी उस पर तरस खा कर प्यार के दो शब्द लिखने वाला नहीं है. उसका ह्रदय चीत्कार कर उठा. बफ्फी.... बफ्फी.... बड़े बेवफा हैं हसीं आजकल के.
          वह सोच रही थी और तड़प रही थी और भुन रही थी और भभक रही थी, ' वाह रे मेरे बेवफा प्रेमी, तुम्हें मैं ही मिली थी दिल जोड़ने और तोड़ने के लिए. तुम्हारी उम्र की सारी कन्याएं क्या घास चरने गई थीं ? या मेरी उम्र के किसी दिलजले के साथ मस्ती मार रही थीं ? यह उलट-पुलट कैसे हो जाता है तुझसे भगवान् ? चीज़ें तरतीब से तो रख.'
          वह सोच रही थी, ' मुझसे दोस्ती की उम्मीद रखने वाले, दोस्ती में भी एक वफ़ा की ज़रुरत होती है. निभानी पड़ती है दोस्ती भी. प्रेम से ज्यादा मुश्किल होती है दोस्ती. तुम गिनती उल्टी गिनना चाहते हो. अब तुम मुझे ' आप ' बुलाना चाहते हो. क्या पहले ऐसा नहीं करना चाहिए था कि ' आप ' बुलाते, दोस्ती करते, धीरे-धीरे फिर जो रिश्ता ठीक लगता, वह चुनते ? रिश्ते शुरू से शुरू होते हैं, आखिर से नहीं. पहले दोस्ती होती है, बाद में प्यार, कि इसका उल्टा. और फिर जब मैं तुम्हें पसंद ही नहीं तो दोस्ती भी क्यों ? दोस्ती भी उन से की जाती है जो अच्छे लगते हैं. जिनके जीने के तौर-तरीके हमारे अपने तौर-तरीकों से मिलते हैं. मैं तुम्हारे लिए क्षणिक आवेग, क्षणिक उत्तेजना को शांत करने का माध्यम भर थी. अच्छा होता, हम कभी मिलते ही नहीं.'
          वह सोच रही थी, ' कहने को अब कुछ भी नहीं बचा, फिर भी लिख सकती हूँ अनगिनत शब्द तुम्हारे प्यार पर. उससे भी ज्यादा तुम्हारे प्यार के मर जाने पर.'
          सोचते-सोचते, उसे लगा, उसका दिमाग बंद हो गया. उसने उसकी चिट्ठी फाड़ी और कूड़ेदान में डाल दी.