Wednesday, 10 October 2012

शब्दों के दंश Kavita 70

शब्दों के दंश

शब्दों के दंश बहुत मारक होते हैं
तीर की तरह चुभते हैं
तेज़ धार वाली तलवार की तरह काटते हैं
चीर कर रख देते हैं गहराई से.

क्या कहा तुमने
मैं अन्यायी अत्याचारी हूँ ?
इतना तो तुमने मुझे कभी प्यार किया नहीं
जितनी मैंने तुम्हें गालियाँ सुना दीं ?

क्या कहा तुमने
मैं चिडचिडी बददिमाग हूँ ?
इतना तो तुम मुझ पर कभी रीझे नहीं
जितनी मैंने तुम पर खीज निकाली ?

क्या कहा तुमने
मैं जिद्दी और पाखंडी हूँ ?
इतना अधिकार तुमने मुझे कभी दिया नहीं
जितना मैंने छीन-झपट के लिया ?

क्या कहा तुमने
मैं झूठी मजमेबाज हूँ
इतनी हमदर्दी कभी तुमने मुझसे चाही नहीं
जितनी हमदर्दी मैंने लोगों से चाही ?

कहो कहो, जो कहना है, तुम ही कहो
कटघरे में तो आज तुम ही खड़े हो
अपने पक्ष में जुटाओ दलीलें तुम
फैसले की घड़ी आनी बाकी है.

No comments:

Post a Comment