Monday, 22 October 2012

शब्दों का रिश्ता Kavita 73

शब्दों का रिश्ता

हमारे तुम्हारे बीच शब्दों का रिश्ता था
शब्दों ने ही हमें बांधा था।
तुम्हारे पास ख़त्म हो गए हैं शब्द
रिश्ते की बुनियाद हो गई है कमज़ोर।

मेरे होठों पर हंसी लाने के लिए
मेरे चेहरे को खिलखिलाने के लिए
कोई नियम भंग नहीं करना था तुम्हें
कोई मर्यादा नहीं तोडनी थी।

सिर्फ जन्म देना था
अपने दिल में भावनाओं को।

तुम ज्ञानी हो
जानते हो कि
भावनाएं स्वतः जन्म लेती हैं।
ज़बरदस्ती प्रजननं असंभव है।
भावनाओं को आदेश देकर
बुलाया नहीं जा सकता
सो गई हों तो जगाया नहीं जा सकता।
भावनाएं गुलाम नहीं होती।

मैं अब तुम्हारे ख्यालों में नहीं हूँ।
मिट चुकी हूँ
तुम्हारे मानस पटल से।
अब कौन सा प्रछन्न आग्रह
प्रकट करोगे तुम
झूठी दिलासा के लिए ?

रोज़-रोज़ का जुड़ना और टूटना
कमज़ोर कर देता है
ह्रदय के तंतुजाल को
रिश्तों के ताने-बाने
होने लगते हैं ढीले
बेवजह नहीं होता चिडचिडाना।

आओ, आज इसे पूरी तरह तोड़ दें
रुक-रुक कर बहती हुई
जलधारा का रुख मोड़ दें
भिगो रही है अनावश्यक
सूखने के लिए बने हैं जो
दुर्बल निर्बल दयनीय रिश्ते।

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