Wednesday, 24 October 2012

मैं देवी नहीं Kavita 74

मैं देवी नहीं

इसी नश्वर लोक की हूँ
कि मुझे देवी अलौकिक नाम मत दो।
ऊंचे सिंहासन के फलक पर नहीं
अपने बराबर ज़मीन पर बैठाओ।

धरा से ऊपर उठते ही
कि तापमान भस्माने लगता है जैसे।
साथ तुम्हारे कदम-कदम चलते-चलते
बूँद-बूँद पिघला करती हूँ मौसम सी।

तुमने यह जाना है आज
कि मेरी साँसों में है थिरकन तुम्हारी।
मैं तो कब से हूँ तुम्हारी राह पर
हाथ फैलाए हुए, आँखों को बिछाए हुए।

तुमसे इतर कुछ भी नहीं
कि तुम्हारी शाख से लिपटी लता हूँ।
कालसर्पों से बचाती नेह-अंकुर
जल रही हूँ रात दिन अंगार जैसी।

है नहीं दरकार मुझे
कि पुजापों में रहूँ श्रद्धावनत के।
जो समय पर खाद-पानी दे सको तो
देर तक और दूर तक महकेगी क्यारी।

No comments:

Post a Comment