Friday, 26 October 2012

अन्तरंग सखा Kavita 75

अन्तरंग सखा

मेरे अन्तरंग सखा !
घर के आँगन में रंगोली तो सजाओ।
भाग्य आया है तुम्हारे द्वार पर
उसकी अगवानी में बाहर तो आओ।

तुम एक अजनबी देश के वासी
धीरे-धीरे पहचाने जा रहे हो
इस नई दुनिया में समा रहे हो
जादू की तरह अस्तित्व है तुम्हारा
लोग भ्रमित हैं तुम्हारे परिचय से
लगता नहीं कि तुम परदेसी हो
तुम्हारी शक्ल-ओ-सूरत
इस देश के इंसानों से मिलती है।
मेरे अन्तरंग सखा !
आकर अपनी कहानी तो बताओ।

बिना किसी उत्सव के ज़िन्दगी जी तुमने
जो अनसुने रह गए तुम्हारे गान
जिन शोलों से खेले तुम
बच-बच कर जले बिना
तुम्हारी नसों में जो बह रहा है
प्यार का दरिया युगों से
तुम्हारी साँसों में जो कुलबुलाहट है
निश्छल अभिव्यक्ति की।
मेरे अन्तरंग सखा !
रुके हुए जल को रवानी में तो लाओ।

संकोच से क्यों सिले हैं तुम्हारे होंठ
कदम क्यों ठहर-ठहर जाते हैं
शब्द क्यों बहक-बहक जाते हैं
कसमसा रहा है कम्पन
तुम्हारे हाथ में पकड़ी कलम में
तुम्हारी चाहत की मद्धम तपन में
दूर कहीं टिमटिमा रही है एक आस
वही बनेगी तुम्हारा सम्बल।
मेरे अन्तरंग सखा !
मन-वीणा पर कोई तान तो सुनाओ।

पिछला सब भूल कर आगे बढ़ो तुम
नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू करो तुम
तुम्हारे स्वागत में प्रकृति हंस रही है
रास्ता कंकट-विहीन सामने है
हर नज़ारा है तुम्हारे दृश्य-पथ पर
तुमसे मिलने के लिए उत्सुक दिशाएं
सौभाग्य ने दस्तक दी है द्वार पर
प्रत्येक ज़िक्र और चर्चा में तुम हो।
मेरे अन्तरंग सखा !
अपनी मेहमानी के लिए तो आओ।

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