Wednesday, 10 October 2012

अब तुम बरसो Kavita 72

अब तुम बरसो

मैं जन्मों की प्यासी हूँ
अब तुम बरसो गरज गरज.

मन में ज्यों कुछ कसक रहा
लगा इसे है मरज मरज.

भाग रहा विक्षिप्त ह्रदय
चुप बैठाया बरज बरज.

बलिहारी उस बंधन की
लिपटी तुमसे लरज लरज.

मोह-माया में डूब रही
जैसे मुझ पर करज करज.

अपनी गुमनामी में तुम
ज्यों कीचड में सरज सरज.

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