Friday, 26 October 2012

मन के मीत Kavita 76

मन के मीत

मेरे मन के मीत !
तुमने छेड़ा मेरे अंतस के जंगल में
एक नया संगीत।

मेरे जीवन के सांध्य काल में तुम आए
एक नई गाथा लिखने का प्रण लेकर
लुप्त हुआ व्यतीत।

तुमने अनहोनी को होनी में बदला
एक अनोखा रिश्ता गढ़ने की जिद में
नई चला दी रीत।

एक नया इतिहास रचा अंजाना-सा
बनी-बनाई लीकों को तोडा तुमने
हुई तुम्हारी जीत।

भ्रमजालों को बुना सुनहरी सपनों से
बेगानी बातों को बदला अपनों से
गया पुराना बीत।

तुमने खोले अर्थ नए संवादों के
तुमने अस्त्र निरस्त्र किए विवादों के
तुमसे जन्मी प्रीत।

पिछली परिभाषाओं को बदला तुमने
केवल शब्दों से रंग दी दुनिया सारी
अब न कोई अतीत।

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