Tuesday, 9 October 2012

यह मत समझना Kavita 69

यह मत समझना

जब भी आते हो तुम याद
झटक देती हूँ दिमाग को
व्यस्त हो जाती हूँ अन्य कहीं.
पर यह मत समझना
मेरा दर्द कम हो गया है.

हर वक़्त हंसती रहती हूँ
बच्चों-सी खिलखिलाहटें
मेरे चेहरे पर बिछलती हैं.
पर यह मत समझना
आंसू सूख चुके हैं मेरी आँखों में.

तुम्हारे बिना जीने की आदत
डाल ली है मैंने
हो गई हूँ नितांत अकेली.
पर यह मत समझना
बहुत साहसी हूँ मैं.

भगवान् पर विश्वास करती हूँ
वह रखेगा हमेशा मुझे छाँह में
तपिशों से दूर.
पर यह मत समझना
मुझे डर नहीं लगता.

सुलझा लेती हूँ मैं
जीवन में आई हर मुश्किल
संवार लेती हूँ बिगड़े हुए काम.
पर यह मत समझना
मेरे मन में कोई उलझन नहीं.

तुम्हारे बिना
मर जाऊंगी मैं
मैंने ऐसा तो नहीं कहा.
पर यह मत समझना
इस बात की कोई सम्भावना नहीं.

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