Friday, 23 November 2012

प्रार्थना Kavita 84

प्रार्थना

बुझता हुआ एक अंगार
वाद्य का टूटा हुआ तार
फीका-फीका सा श्रृंगार
प्रतीक्षारत दर-ओ-दीवार।

कभी न बुझने वाली प्यास
त्राहि-त्राहि करता संत्रास
जागती रोज़ नई एक आस
मन में फिर भी है विश्वास।

प्रार्थना में उठते हैं हाथ
कभी न छूटे अब यह साथ
सँवारे जाएं सारे पाथ
तेरा हर गम मेरे सर माथ।

बने कोई ऐसा संयोग
कि मिट जाएं सारे दुर्योग
भाग्य चमके जैसे निःरोग
सितारे दें सारा सहयोग।

रहेंगे साथ सितारों पर
चलेंगे साथ अंगारों पर
लिखेंगे गीत बहारों पर
रचेंगे चित्र नज़ारों पर।

Thursday, 22 November 2012

शब्दों का आसरा Kavita 83

शब्दों का आसरा

तुम ऐसे देश में हो
जहां से लौटना असंभव नहीं
तो मुमकिन भी नहीं।
हो सकता है तुम कभी न लौटो।

ऐसे कभी न लौटने वाले से प्यार करना
जैसे एक संगीन जुर्म हो अपने ही साथ
यह कितनी बड़ी चुनौती है
तुम क्या जानो।

आगे तो कोई रास्ता ही नहीं है
और पीछे लौटना नामुमकिन है।
आगे देखो तो दिखता है एक बंद दरवाज़ा
पीछे मुड़ने पर खड़ी मिलती है एक दीवार।

एक सौभाग्य है
उम्मीद की एक ही किरण
कि शब्दों को मुझ तक पहुँचाने की
सुविधा है तुम्हे।

जानलेवा गुमराह करने वाले शब्द
जब तुम फेंकते हो मेरी ओर
तो एक शाश्वत अमृतव्य
सरसराने लगता है शिराओं में।

तुम जैसे एक नशा हो।
किसी भी नशे से बड़ा नशा।
कितना बड़ा भुलावा है यह।
कितना बड़ा छलावा है यह।

तुम्हारे जानलेवा शब्द
मेरे जीने का सहारा हैं
शब्द नहीं मिलेंगे तो सच
डोर टूट जाएगी जीवन की।

Monday, 19 November 2012

पतन Kavita 82

पतन

वह पूजा नहीं, वह तो पतन था।
वह कोई सात्विक उत्थान नहीं
राजसी और तामसी भावों का
उन्नयन था।

अपने आराध्य देव के सम्मुख
अपने अहम् का सम्पूर्ण समर्पण।
प्रेम की उत्कृष्टता की
निःसंग आराधना।
पर न्यौछावर होने का अर्थ
न्यौछावर होते ही बदल गया था।
रह गया था मात्र चाहना का आवेग
संयोग समा गया था दुर्योग में।

पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए
चिंतन के बादल चिंता बन छा गए थे
कितना असंगत होता है लुढ़का देना
कलकल करता मंगल कलश
अर्चना के लिए सजी रोली की थाली
पूजा के बहाने
गलत समय पर गलत जगह
निरीह भाव से।

चेहरे जो नज़र आते हैं सौम्य सुन्दर
अक्सर धोखा दे जाते हैं।
शब्द जो टपकाते रहते हैं शहद
भीतर खंजर छुपाए होते हैं।
भाव किसी के साझे नहीं होते
अपने-अपने दुर्भाव समेटे होते हैं।
अपनत्व के दिलासे दिखाई देते हैं जो
आस्तीन के सांप बन कर डस लेते हैं।

Saturday, 17 November 2012

शब्दों के उपहार दो Kavita 81

शब्दों के उपहार दो

तुमसे मिलने के बाद
ज़िन्दगी लग रही थी आसान
पर तुम कितने मुश्किल हो
मैं सच कितनी थी नादान।

कुछ तो अनसुलझा है तुम में
कुछ तो अनचाहा है तुम में
बार-बार जो अवरोध बन कर
खड़ा हो जाता है हमारे बीच।

डगमगाते हैं मेरे कदम
बीच खुद जाती है एक गहरी खाई
ठहर जाता है आगे बढ़ता हुआ समय
बदलने लगते हैं अर्थ सुबह-शाम के।

तुम्हारी जिद है कि तुम रहोगे बंद
अपने मन के कारावास में
खुली हवा में सांस लेना दूभर है
अपनी ही पाबंदी में रहना है तुम्हें।

खोलो द्वार हवा को आने दो
रुक्षता को भगाओ प्यार की नमी से
आँखें खोल कर देखो अपने चारों ओर
प्रकृति दे रही सर्वस्व अपना ख़ुशी से।

क्यों जकड़ जाते हो तुम प्रतिदान में?
क्यों तुम्हारी मुस्कुराहटों में कमी?
क्यों नहीं तुम शब्दों के उपहार से
शुष्क दिनों को बनाते उत्सवी?

Friday, 16 November 2012

खींचो एक बड़ी लकीर Kavita 80

खींचो एक बड़ी लकीर

तुम्हें खींचनी होगी एक बड़ी लकीर
क्योंकि वास्तविक जीवन में
संशोधन नहीं होते।

तुम्हें बिना शर्त के जीना होगा जीवन
क्योंकि अक्सर प्यार के
संबोधन नहीं होते।

तुम्हें सीखनी होगी एक नई कला
क्योंकि बिना साज-संवार के
रसबोधन नहीं होते।

तुम्हें चुनना होगा निर्विवाद रिश्ता
क्योंकि सच्चे रिश्तों में
विवाद नहीं होते।

तुम्हें पार करनी है आग से भरी नदी
क्योंकि इस इम्तहान में
दोहराव नहीं होते।

तुम्हें झुकना होगा बवंडर के सामने
क्योंकि अक्खड़ झंझावात मे
अहसास नहीं होते।

प्यार पर लिखोगे तुम और कई गीत
क्योंकि लेखन की दुनिया में
हिसाब नहीं होते।

Thursday, 15 November 2012

ख़ामोशी Kavita 79

ख़ामोशी

वह एक दिन था
उस दिन मैं खामोश थी
तुमने मेरी ख़ामोशी को पढ़ लिया था
और खुद भी खामोश हो गए थे।

तुमने मुझे अपनी बाहों में भरा था
मेरे सूनेपन को सजाने के लिए
अपने प्यार के हीरे-मोती
मेरी ख़ामोशी पर जड़ दिए थे।

मैं तुम्हारे अन्दर डूब रही थी
तुम भी मेरे अन्दर डूब रहे थे।
ख़ामोशी शब्दशः संवाद बन
हमारे बीच पसरी हुई थी।

बिना कुछ कहे-सुने भी
हमारे दिल का हाल
मौन तरंगों के ज़रिये
एक-दूसरे तक पहुंच रहा था।

फिर तुमने बोला था एक शब्द
वह शब्द था मेरा नाम
मैंने भी बोला था एक शब्द
वह शब्द था तुम्हारा नाम।

फिर फैल गई एक लम्बी ख़ामोशी
एक लम्बे भाष्य का पर्याय बन
न कुछ तुमने कहा, न कुछ मैंने कहा
एक मधुर शोर फिर भी हमारे कानों में था।

Saturday, 10 November 2012

तुम मेरे कौन हो Kavita 78

तुम मेरे कौन हो

तुम मेरे कौन हो?
आकाश से टूटे हुए तारे की तरह
झर रहे हो मेरे इर्द-गिर्द
किसी अच्छे मुहूर्त की मानिन्द।

स्याह अँधेरी रात में
चाँद का रुपहला अक्स लेकर
उतर रहे हो आसमान से नीचे
शीतलता की प्रतिध्वनि बन।

बादलों में छुपे थे बारिश की तरह
बरस रहे हो शुष्क रूखी ज़मीन पर
बेहिसाब सन्नाटे को चीर कर 
छमछम छमछम।

मैदानों में तुम्हारे आने की खबर
आग की तरह फैली है
कि कोई फ़रिश्ता संजीवनी बूटी लेकर
मृत प्राणों में जीवन का संचार करने आया है।

कि उसके आने से लहक उठी हैं दिशाएं
सायं-सायं गुनगुना रही है हवा
बतरस में संलग्न हैं फूल-पत्ते
सांस ले रहे हैं पत्थर भी।

कि उसने छेड़ा है एक नया राग
अनजानी धुन है पर अपनी सी लगती है
प्रेम रस में आवेष्ठित सुर हैं
मादक तरंगों से पीड़ित है गान।

कि सरेआम कोई कह रहा है चीख-चीख
हर बेकार पड़ा पल सार्थक होगा अब
हम ऐसा भी करेंगे प्यार और वैसा भी
पाबंदियों के बीच नहीं रहना हमें।

Wednesday, 7 November 2012

चमत्कार होते हैं

चमत्कार होते हैं

हमारे जीवन में जो घटनाएं अप्रत्याशित घटती हैं तथा जिनके परिणाम पूर्णतः सुखद होते हैं, वे चमत्कार कहलाती हैं। कुछ लोग इसे संयोग कहते हैं परन्तु यह संयोग से आगे की स्थिति है। पूर्णतः दुखद परिणाम वाली अप्रत्याशित घटनाएं हादसा के नाम से जानी जाती हैं। हादसा दुर्योग से आगे की स्थिति है।

मेरे जीवन में कई संयोग बने और कई चमत्कार घटित हुए। आज तक मैं अपने साथ होने वाली चमत्कारिक घटनाओं को देख कर अचंभित हूँ कि आखिर मुझे यह सब कैसे मिला। मैं हैरान हूँ कि जो सपने मैंने कभी नहीं देखे, जिन सुखो, सहूलियतों की मैंने कभी चाहना नहीं की, जो अदृश्य एवं अतिरिक्त ख़ुशी पाने के लिए मैंने कभी प्रयास नहीं किया, वह सब अचानक जैसे ऊपर से टपका।

मेरे साथ कोई हादसा कभी नहीं हुआ बल्कि कई हादसे होने से टले। यदि वो हादसे स्वतः न टलते और मेरी ज़िन्दगी में कहर ढाते तो दुर्भाग्य के वशीभूत कुछ भी अनहोना हो सकता था। मेरे प्रयास के बिना मेरी रक्षा हुई।

मैं पहले भगवान् को नहीं मानती थी। लेकिन अपने जीवन की घटनाओं को देख कर मुझे यह विश्वास हुआ कि कोई अनदेखी, असीम शक्ति है जो हमारे जाने बिना हमारे जीवन की गति को संचालित करती है और मैं उस असीम शक्ति की फेवरेट चाइल्ड हूँ।

मैं उन अर्थों में धार्मिक नहीं हूँ कि मंदिर जाऊं, पूजापाठ करूँ। धर्म के कर्मकांडी स्वरुप में मेरा कोई विश्वास नहीं। 

मैं मन ही मन उस असीम शक्ति के प्रति नतमस्तक और श्रद्धावनत हूँ।

प्रभु ! मेरा ख्याल ऐसे ही रखना। और मेरे अपनों का भी।


Monday, 5 November 2012

चमत्कार Kavita 77

चमत्कार

ना ना
मुझे तुमसे अब कोई प्यार नहीं
मेरे मन में तुम्हारे लिए
अब कोई चाह नहीं
मैं तुम्हें ढूंढ ज़रूर रही हूँ
पर अपने लिए नहीं
अपने किसी लगाव के लिए नहीं
मैं सिर्फ तुम्हें बताना चाहती हूँ
कि उम्र के इस आखिरी दौर में
मेरे जीवन में एक तूफ़ान आया है
एक ज़लज़ला
जिसने तहस-नहस करने की बजाय
संवार दिया वह सब कुछ
जो तुम उजाड़ कर गए थे।

बिना किसी आस के
बिना किसी प्रयास के
चमका वह धूमिल धरातल पर
चन्द्रमा की शीतलता लिए
सूर्य के प्रकाश की तरह।

मैंने उसे बुलाया नहीं
उसके या किसी के भी
आने के बारे में
संभावना तो क्या
ख्याल भी नहीं था
रंचमात्र भी।

यह कोई सपना नहीं था
पर सच हो गया
यह मेरी कल्पना में नहीं था
पर कार्यान्वित हो गया।

उसका मेरे जीवन में आना
मात्र संयोग नहीं
चमत्कार है।
यह कोई प्यार-व्यार नहीं
आत्मा का आत्मा से
रूह का रूह से
अनोखा मिलन है।
इस अनोखे मिलन में
एक अनोखी तड़प है
एक अनोखी संतुष्टि है
और वह सब कुछ है
जिसे तुमने नकारा था।

मैं तुम्हें सुनाना चाहती हूँ
मैं तुम्हें बताना चाहती हूँ
कि कभी-कभी ऐसा भी होता है
कि हमारे जाने बिना
कि हमारे चाहे बिना
कि हमारे मांगे बिना
हमें मिल जाता है वह सब कुछ
जो कल्पना की सीमाओं के परे है
जो तार्किक हदों के पार है
जिसका कर्त्ता केवल वह है
जिसे किसी ने कभी नहीं देखा
वह असीम शक्ति
जिसके आगे मैं नतमस्तक हूँ।