Thursday, 15 November 2012

ख़ामोशी Kavita 79

ख़ामोशी

वह एक दिन था
उस दिन मैं खामोश थी
तुमने मेरी ख़ामोशी को पढ़ लिया था
और खुद भी खामोश हो गए थे।

तुमने मुझे अपनी बाहों में भरा था
मेरे सूनेपन को सजाने के लिए
अपने प्यार के हीरे-मोती
मेरी ख़ामोशी पर जड़ दिए थे।

मैं तुम्हारे अन्दर डूब रही थी
तुम भी मेरे अन्दर डूब रहे थे।
ख़ामोशी शब्दशः संवाद बन
हमारे बीच पसरी हुई थी।

बिना कुछ कहे-सुने भी
हमारे दिल का हाल
मौन तरंगों के ज़रिये
एक-दूसरे तक पहुंच रहा था।

फिर तुमने बोला था एक शब्द
वह शब्द था मेरा नाम
मैंने भी बोला था एक शब्द
वह शब्द था तुम्हारा नाम।

फिर फैल गई एक लम्बी ख़ामोशी
एक लम्बे भाष्य का पर्याय बन
न कुछ तुमने कहा, न कुछ मैंने कहा
एक मधुर शोर फिर भी हमारे कानों में था।

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