Saturday, 17 November 2012

शब्दों के उपहार दो Kavita 81

शब्दों के उपहार दो

तुमसे मिलने के बाद
ज़िन्दगी लग रही थी आसान
पर तुम कितने मुश्किल हो
मैं सच कितनी थी नादान।

कुछ तो अनसुलझा है तुम में
कुछ तो अनचाहा है तुम में
बार-बार जो अवरोध बन कर
खड़ा हो जाता है हमारे बीच।

डगमगाते हैं मेरे कदम
बीच खुद जाती है एक गहरी खाई
ठहर जाता है आगे बढ़ता हुआ समय
बदलने लगते हैं अर्थ सुबह-शाम के।

तुम्हारी जिद है कि तुम रहोगे बंद
अपने मन के कारावास में
खुली हवा में सांस लेना दूभर है
अपनी ही पाबंदी में रहना है तुम्हें।

खोलो द्वार हवा को आने दो
रुक्षता को भगाओ प्यार की नमी से
आँखें खोल कर देखो अपने चारों ओर
प्रकृति दे रही सर्वस्व अपना ख़ुशी से।

क्यों जकड़ जाते हो तुम प्रतिदान में?
क्यों तुम्हारी मुस्कुराहटों में कमी?
क्यों नहीं तुम शब्दों के उपहार से
शुष्क दिनों को बनाते उत्सवी?

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