Monday, 19 November 2012

पतन Kavita 82

पतन

वह पूजा नहीं, वह तो पतन था।
वह कोई सात्विक उत्थान नहीं
राजसी और तामसी भावों का
उन्नयन था।

अपने आराध्य देव के सम्मुख
अपने अहम् का सम्पूर्ण समर्पण।
प्रेम की उत्कृष्टता की
निःसंग आराधना।
पर न्यौछावर होने का अर्थ
न्यौछावर होते ही बदल गया था।
रह गया था मात्र चाहना का आवेग
संयोग समा गया था दुर्योग में।

पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए
चिंतन के बादल चिंता बन छा गए थे
कितना असंगत होता है लुढ़का देना
कलकल करता मंगल कलश
अर्चना के लिए सजी रोली की थाली
पूजा के बहाने
गलत समय पर गलत जगह
निरीह भाव से।

चेहरे जो नज़र आते हैं सौम्य सुन्दर
अक्सर धोखा दे जाते हैं।
शब्द जो टपकाते रहते हैं शहद
भीतर खंजर छुपाए होते हैं।
भाव किसी के साझे नहीं होते
अपने-अपने दुर्भाव समेटे होते हैं।
अपनत्व के दिलासे दिखाई देते हैं जो
आस्तीन के सांप बन कर डस लेते हैं।

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