Sunday, 16 December 2012

दिलजले Kavita 86

दिलजले

यह कैसी बू आ रही है
कुछ दिलजले भी इस महफ़िल में हैं।

यह कैसा भ्रमित जाल
कुछ सिरफिरे भी इस महफ़िल में हैं।

यह कैसी लाग-लपेट
कुछ सिरचढ़े भी इस महफ़िल में हैं।

यह कैसा तन्त्रजाल
कुछ यूं फँसे भी इस महफ़िल में हैं।

यह कैसा आन्दोलन
कुछ लड़-भिड़े भी इस महफ़िल में हैं।

ये कैसे शब्द-पुष्प
कुछ सच भले भी इस महफ़िल में हैं।

4 comments:

  1. आज के संदर्भ की सार्थक रचना- भावपूर्ण कहन----बधाई

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  2. kuchh such bhale bhi is mahfil mai hai
    achchi rachna hai ek bimb samne hota hai .badhai

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    1. Maine yah kavita facebook ke bare me likhi thi. Mitron ne pasand ki. Aapko bhi pasand aai, achchha laga.

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