Monday, 31 December 2012

आज का युवा वर्ग

आज का युवा वर्ग

मैं दस वर्ष मुंबई और विदेश में गुजारने के बाद 1992-1993 में वापस अपनी धरती पर यानि दिल्ली लौटी थी। उन दस वर्षों के बाद मुझे दिल्ली बहुत बदली हुई लगी थी, प्रगति और गुंडागर्दी, दो लिहाजों से। प्रगति, पहली नज़र में, इस रूप में कि जगह-जगह पी सी ओ के बोर्ड नज़र आ रहे थे और सड़कों पर कारों की भरमार थी। गुंडागर्दी की तीन घटनाएं आप लोगों के साथ बांटना चाहती हूँ। 1. मैं बस से कहीं जा रही थी। लेडीज़ सीट पर मेरे पास एक टीनेजर लड़का आकर मुझसे चिपक कर बैठ गया। मैंने उसे दूर करते हुए कहा, 'ठीक से बैठो।' वह ढिठाई से बोला, 'क्यों, आपको कोई बीमारी है क्या?' मैं सीट से उठी, उसके दो चांटे लगाए और उसे सीट से नीचे धकेल दिया। बस में सारे चुप। तभी बस रुकी और वह उतर गया। उसके उतारते ही कुछ लोग बोले, 'आपको ऐसे नहीं करना चाहिए था, आजकल इन लड़कों का कोई भरोसा नहीं, चाक़ू-छुरा मार दें तो?' तब से दस वर्ष पूर्व हम बसों में ही आया-जाया करते थे लेकिन ऐसी गुंडागर्दी नहीं थी। मैंने उसी दिन फैसला किया, अब मुझे बस में कभी सफ़र नहीं करना। 2. मैं बस में लोदी रोड के रास्ते पर थी। दयाल सिंह कॉलेज के पास से कुछ लड़के बस में चढ़े और कंडक्टर को पकड़ कर पीटने लगे। मैं चिल्लाई, 'क्या हुआ? क्यों मार रहे हो उस बेचारे को? कोई तो रोको इन्हें।' मैंने मारते हुए एक लड़के का हाथ पकड़ लिया। उसने बिना कुछ कहे हाथ छुड़ाया और सारे लड़के कंडक्टर को लेकर नीचे उतर गए। बस खड़ी रही, नीचे कंडक्टर पिट कर लहुलुहान हो गया। मैं अन्दर लोगों से कहती रही, 'कोई उन्हें रोको।' पीट कर लड़के चले गए। कंडक्टर बस में चढ़ा। बस चल दी। कंडक्टर ने बताया, उसने पिछले दिन एक लड़के से टिकट लेने के लिए कहा था। उसी कॉलेज के लड़के उसे पीटने आए थे कि 'साले, हमसे टिकट लेने के लिए कहता है?' लोग मुझे समझाने लगे, 'आपने हद कर दी, उस लड़के का हाथ ही पकड़ लिया? कहीं वह आपको ही पीट देता तो? आजकल इन लड़कों का कोई भरोसा नहीं है, इसलिए कोई बीच में नहीं बोलता।' 3. मैं पूर्वी दिल्ली के एक बस स्टॉप पर खड़ी बस का इंतज़ार कर रही थी। तभी एक बीसेक साल के लड़के से एक वृद्ध रिक्शावाला टकरा गया। बात कुछ ख़ास नहीं थी पर लड़का अत्यंत क्रोध में उससे लड़ने लगा। लड़के ने सड़क पर पड़ा हुआ एक पत्थर उसे मारने के लिए उठाया कि मैंने उसका पत्थर पकड़ा हुआ हाथ कस के पकड़ लिया। बस स्टॉप पर खड़े कई हट्टे-कट्टे लोग यह तमाशा देख रहे थे। कोई कुछ बोल नहीं रहा था। मैंने उन्हें ललकारा, 'देख क्या रहे हो? जब मैं इसे रोक सकती हूँ, तुम लोग क्यों नहीं रोक सकते?' मेरा इतना कहना था कि लोग जैसे जागे और उस लड़के को पकड़ लिया। मैंने कहा, 'मारो इसे।' फिर वह लड़का जम के पिटा।

आखिर युवा वर्ग में इतनी गन्दगी, इतना आक्रोश आया कहाँ से? सुबह होते ही ये घर से निकलते हैं गुस्से में भरे हुए। इनके घर के हालात? गरीबी? बेरोज़गारी? अशिक्षा? कुसंस्कार? कौन है ज़िम्मेदार इन सब का? इन्हें सही दिशा देने के लिए कौन आगे आएगा?

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