Tuesday, 31 December 2013

ग़ज़ल 33

ग़ज़ल 33

दिल करता है, तेरे नाम पर मर जाने को
कितने फसाद किए तूने मुझे रुलाने को.

मेरा चमन उजाड़ कर भी चैन न मिला तुझे
रोज़ भेजता है लाल फूल दिल जलाने को.

खुद अँधेरों में बैठा है तो मैं क्या करूँ
क्यों चला आता है मेरी रोशनी बुझाने को?

कितनी बदसलूकियाँ, कितनी बदतमीज़ियाँ
कितने तामझाम मेरा सब्र आज़माने को?

कौन से पल में मेरी तकदीर ने धोखा किया
याद क्यों रखूँ उसे पर क्या करूँ भुलाने को?

Wednesday, 11 December 2013

आज की प्रार्थना Kavita 181

आज की प्रार्थना

चलो, चलें एक ऐसी राह
जहाँ न हो कोई परवाह।

हम अपने में हों संतुष्ट
मन में नहीं किसी की चाह.

हँसी का हस्तक्षेप रहे
न कोई दर्द, न कोई आह.

द्वेष घृणा सब जाएँ भूल
किसी से न हो कोई डाह.

सुलझें सब उलझे हुए धागे
मस्त चैन की न कोई थाह.

बुझ जाएँ जलते अंगार
जीवन ऐसा कि वाह वाह.

Wednesday, 4 December 2013

ग़ज़ल 32

ग़ज़ल 32

एक खूबसूरत रिश्ते का अंत
कब आया, कब बीत गया बसंत।

शुरु-शुरू में जिसकी थी विभावरी 
कहीं खो गया वह पागल महंत।

सहम गया देखा जो इतना धन
कि दिल कब से था बैरागी संत.

सूनेपन में गूँजी थी सरगम
लहराई थी स्वर की छवि अनंत।

अश्रु-ताप ऐसा कि झुलसे स्वप्न
जूझने को रह गए प्रश्न ज्वलंत।

अब कोई उत्सुकता शेष नहीं
सम्भावनाओं का शापित अंत.

Friday, 29 November 2013

अंतर्द्वन्द Kavita 180

अंतर्द्वन्द

मैं कहाँ हूँ?
मैं दोनों तरफ हूँ
पुरातन में भी, अधुनातन में भी
भारतीय में भी, पाश्चात्य में भी
प्राचीन में भी, नवीन में भी.
मैं परम्परा और आधुनिकता का
सही मिश्रण हूँ.
मैं नए युग की हूँ,
मैं समकालीन हूँ
अपनी जड़ों से जुड़ी हुई समकालीन।

क्या मैं सही हूँ?
या मैं कहीं की नहीं हूँ?
मैं पूरी पुरानी भी नहीं बचीं
मैं पूरी नई भी नहीं बनीं
मुझे पुरातनपंथी पसंद नहीं करते
क्योंकि मैं आधुनिक हूँ
मुझे आधुनिक पसंद नहीं करते
क्योंकि मैं परम्परावादी नज़र आती हूँ
मैं कहीं की नहीं हूँ
मैं अधर में लटकी हुई हूँ.

शायद अधर में लटके हुए लोग बेहतर होते हैं
हर घेरे में ठीक से समा जाते हैं
हर जगह अपनाए जाते हैं
चुस्त और दुरुस्त।
मुझे दोनों तरफ रहना है.

नहीं, अधर में लटके लोग समझौतापरस्त होते हैं
सुधर जाओ
या तो इधर हो जाओ या उधर हो जाओ
वरना हवा में उड़ती रहोगी
फटे कागज़ के टुकड़ों की तरह.

Sunday, 10 November 2013

एक अजीब प्रार्थना Kavita 179

एक अजीब प्रार्थना

भगवन, तूने की हैं ये सब गड़बड़ें।
जिसमें लबालब भरने की सामर्थ्य थी
उसे खाली रहने दिया,
जो दौड़-भाग में चतुर था
उसे बैसाखियाँ थमा दीं,
जो अपने धर्म में लगा था
उसकी राह में प्रेम रख दिया,
जो कर्तव्य निभा रहा था
उसके आगे ऐश्वर्य के ख़ज़ाने खोल दिए.
यह तूने क्या किया, भगवन, यह तूने क्या किया?

दिशा-भ्रम में घूम रहे हैं सब
भीतर-बाहर उलट-पलट हो रहा है,
शंका-आशंका के बीच
मृगतृष्णा दौड़ा रही है,
स्वर्ण-रजत सी उम्मीदें
मारक बन जाती हैं,
निर्णय की घड़ी में 
साँस बची रहने का भरोसा नहीं।
यह क्या हो रहा है?
सच में नहीं पता, भगवन, यह क्या हो रहा है?

आएगा चल कर कौन सी दिशा से
भावी का अनजाना प्रेत?
दूर-दूर क्षितिज तक
अँधेरा ही अँधेरा है.
कौन सी बाधाएँ मिट पाएँगी?
कौन सी दुआएँ फलेंगी, कब?
रास्ते के कंकड़-पत्थर
बुहारने के लिए आएगा कौन?
तूने ही सारी गन्दगी फैलाई है
तू ही अब आ, भगवन, और समेट इसे.

Tuesday, 5 November 2013

अब ना खिलूँगी मैं Kavita 178

अब ना खिलूँगी मैं

खो दिया, सच में उसने मुझे खो दिया
कि ढूँढने से भी अब ना मिलूँगी मैं
शाख से टूट कर गिरा हुआ फूल हूँ
कि अब ना कभी भी, अब ना खिलूँगी मैं.
उसका कहीं कोई अस्तित्व नहीं था
बिना रोशनी के भी रोशनी थी तब
जलाने की कोशिश में एक नया दीप
बुझा गया पहले से जले चिराग सब.

कि सपनों में मिलना, सपनों में जीना
शब्दों का खेल था, खेल में थी प्रीत
कि शब्द सब टूट गए, खेल सब छूट गए
भावनाएँ मृत हुईं, मौन हुए गीत.

आँखों के द्वार बंद कर देखती थी 
मन के आँगन में खिलती हुई कलियाँ
खुली आँखों से देखा मुरझ गए फूल
रौनकें ख़त्म हैं, सूनी पड़ी गलियाँ

सतरंगी फूलों में सुगंध नहीं है
बुझी हुई आस के किनारे नहीं हैं
कि लहरों के साथ बहने में था रास
कि अब वही धार के सहारे नहीं हैं.

Sunday, 20 October 2013

शारीरिक सुख

शारीरिक सुख

शारीरिक सुख, जिसे वासना का दर्जा दे कर धिक्कार दिया जाता है, मनुष्य के जीवन में एक अहम् रोल अदा करता है. विवाह संस्था में भी इसे फलीभूत होते देखा जा सकता है, जहाँ सुहाग रात पहले होती है, बाद में दंपत्ति धीरे-धीरे मन के मेल-मिलाप की ओर बढ़ते है.
संतानोत्पत्ति में अक्षम होने पर नियोग से संतान-प्राप्ति की कहानियाँ इतिहास एवं धर्मग्रंथों में भरी पड़ी हैं. राजा-महाराजाओं के ज़माने में नियोग से संतानोत्पत्ति की चाह व कोशिश वंश-परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए ज़रूरी समझी जाती थी. आज का पति क्या टेस्ट ट्यूब बेबी और सरोगेट मदर वाले तरीके छोड़ पत्नी को उसके ही किसी मित्र से संतान प्राप्ति की सहर्ष अनुमति दे सकता? संभव है, बहुत से लोग चोरी-छुपे यह करते हों. आपको सुरेन्द्र वर्मा का वह नाटक याद होगा, 'सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक', जिसमें एक राजा ने अपनी रानी के पास अपने दास को भेजा था, नियोग से संतान प्राप्त करने के लिए. उस दास के साथ रात भर रहने के बाद रानी ने सुबह वापस राजा के पास लौटने से इनकार कर दिया था. इस विषय पर एक फिल्म भी बनी थी (नाम याद नहीं), जिसमें पत्नी रानी मुखर्जी पति सलमान खान को संतान पाने हेतु स्वेच्छा से, शरीर-व्यवसाय में लगी एक औरत प्रीति ज़िंटा के पास भेजती है, ताकि प्रीति ज़िंटा उसके पति का बच्चा पैदा करे जिसे पति-पत्नी ले लें. बाद में सलमान प्रीति के साथ भावात्मक लगाव महसूस करता है.…. आज के समय में भी ऐसा हो सकता है लेकिन इसमें यह खतरा है कि स्त्री जिस पुरुष से प्रेम का सुख, शरीर का सुख प्राप्त करे, वह वापस अपने पति के पास लौटना ही न चाहे। And vice versa. उपर्युक्त कहानियों में शरीर-सुख के बाद, शरीर-सुख के कारण, मन में भावनाओं की उत्पत्ति देखी गई है. इसीलिए मैंने कहा, शारीरिक सुख, जिसे वासना का दर्जा दे कर धिक्कार दिया जाता है, मनुष्य के जीवन में एक अहम् रोल अदा करता है. विवाह संस्था में भी इसे फलीभूत होते देखा जा सकता है, जहाँ सुहाग रात पहले होती है, बाद में दंपत्ति धीरे-धीरे मन के मेल-मिलाप की ओर बढ़ते है.

Friday, 18 October 2013

दुःख लिख दो Kavita 177

दुःख लिख दो

मैं तुम पर कोई कहानी नहीं लिखूँगी
लिखूँगी तो स्मृतियाँ भटकेंगी
स्मृतियाँ भटकेंगी तो आँखें बरसेंगी
आँखें बरसेंगी तो मन बौरा जाएगा
मन बौरा जाएगा तो फिर कैसे लिखूँगी?

मैं तुम्हें भूल रही हूँ
भूल रही हूँ तो भूल जाती हूँ कि मुझे क्या भूलना है
क्या कुछ भूलते-भूलते मुझे क्या कुछ याद आ जाता है
याद आ जाता है तो मैं भूल नहीं पाती
भूल नहीं पाती वह सब, वह सब जो मुझे भूलना है.

तुम हर मामले में कितने बेफिक्र थे
बेफिक्र थे इसीलिए तुमसे दुःख लिखे गए
दुःख लिखे गए, या कागज़ कोरे छूटे
कोरे छूटे या तुम दुःख लिखने ही आए थे?
तुम दुःख लिखने आए थे, लिख कर चले गए.

अधलिखे कागज़ उलट-पुलट रही हूँ
लिखने को लिखा तो सिर्फ दुःख
पढने को पढूं तो सिर्फ दुःख
कहने को कहूँ तो सिर्फ तुमसे
सुनने को सुनूँ तो सिर्फ तुम्हें।

खाली पन्नों जैसा खाली मन
खाली है इसलिए दोबारा लिखा जा सकता है
दोबारा लिखोगे तो भी तुम ही लिखोगे
लिखो, फिर से दुःख लिख दो
तुम्हारे दुःख से इतर कोई सुख नहीं।

तुम मुक्त उड़ रहे हो मेरे आकाश में
मेरे आकाश में मैं उड़ नहीं सकती
उड़ नहीं सकती क्योंकि मैं कैद हूँ
मैं कैद हूँ तुम्हारे होने, न होने के बीच
बीच में होना, न होने जैसा ही।

Monday, 14 October 2013

रामायण

रामायण

हमारी समस्त पौराणिक गाथाएं हमें आज जीवन को जीने की राह दिखाती हैं. वे तर्कसहित हमारे सामने सही और गलत का भेद प्रस्तुत करती हैं. वेद-पुराणों की उन कथाओं को आज के सन्दर्भ में समझेंगे तो बहुत सारी मुश्किलों के समाधान स्वमेव निकाल पाएंगे। रामायण हो, महाभारत हो, अन्य कोई भी धार्मिक ग्रन्थ हो, इनकी कहानियाँ मनोरंजन मात्र के लिए नहीं हैं. वे हमें शिक्षा देती हैं, एक सही जीवन जीने के लिए. जब तक हम अपने जीवन में तर्क को स्थान नहीं देंगे, हमें जीवन जीने की कला नहीं आएगी। धर्मग्रंथों में प्रकारांतर से यही बताया गया है.

रामायण एकमात्र ऐसा धार्मिक ग्रन्थ है जो धार्मिक ही नहीं, अपितु मनुष्य को सदाचार, सभ्यता, सद्व्यवहार का प्रशिक्षण देता है. इसकी पूरी कथा में कोई प्रसंग, कोई पात्र, कोई घटना ऐसी नहीं जो हमें आदर्श जीवन जीने के लिए प्रेरित न करती हो. इसके नकारात्मक पात्र भी सकारात्मक पात्रों की अच्छाइयों को उभारने के काम में योगदान देते हैं. हम तर्क की कसौटी पर इससे बहुत कुछ सीख सकते हैं.

राजा दशरथ ने कैकेई को वचन दे दिया कि कुछ भी माँग लेना। 'कुछ भी' में 'सब कुछ' शामिल होता है, अब या तो आप मरें या अपना वचन तोड़ें, बेहतर यही है कि इस तरह की प्रतिज्ञा ही न करें।

लंका में रावण सीता को हाथ नहीं लगा सका. यह एक नारी का तेज है, जिसके सम्मुख एक बलशाली पुरुष भी निस्तेज हो जाता है.

रावण बहुत बड़ा ज्ञानी था, लेकिन एक मामले में उसने जो नादानी बरती, तो विनाश को प्राप्त हुआ. उसे अंत तक समझ नहीं आया कि 'ज़िद' बड़े से बड़े ज्ञानी को धूल-धूसरित कर देती है.

रामायण में कुछ अन्य संकेत भी महत्वपूर्ण हैं, जैसे, सीता ने राम से स्वर्ण मृग लाने को कहा. राम ने एक बार भी नहीं सोचा कि क्या मृग भी कभी सोने का होता है? राम द्वारा विवेक से काम न लिए जाने के कारण वह सारा काण्ड हुआ. राम चूँकि सीता से अत्यधिक प्रेम करते थे, इसलिए उन्होंने सीता की माँग के आगे कुछ सोचने-समझने की आवश्यकता नहीं समझी। इसे पूर्ण प्रेममय होने का भाव कहें या कुछ भी कहें, था यह अनुचित। यूँ यह संयोग बना राक्षस-समाज का ध्वंस करने के लिए. इस प्रसंग का सही अर्थ यही है कि जब व्यक्ति, चाहे पुरुष हो या नारी, अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं करता, तो उसके अविवेकी कृत्य से बड़ी से बड़ी तबाही हो सकती है.

रामायण में पुत्र द्वारा पिता की आज्ञा का पालन, सीता का अतुल्य पति-प्रेम, भाइयों के बीच प्रेम भाव अनुकरणीय है.

राम से जुडी कथाओं में राम को एक आम इंसान ही बताया गया है, इसीलिए तो सामाजिक निन्दा का भय उनसे सीता की परीक्षा करवा गया. सही कहा जाए तो रामायण की कथा जनमानस की कथा है. राम आदर्श पुरुष थे, निःसंदेह मर्यादा पुरुषोत्तम थे. राम से जुडी कथाओं में राम को एक आम इंसान ही बताया गया है. अनेक बार उनके द्वारा ली गई सीता की अग्निपरीक्षा की निंदा की जाती है. मेरा तर्क यह है कि राम एक सद्चरित्र व्यक्ति थे, उनके जीवन में किसी अन्य स्त्री के प्रवेश की कोई कथा पढ़ने-सुनने में नहीं आती. वे सीता से असीम प्रेम करते थे. वे पुरुषों में उत्तम थे. एक सद्चरित्र व्यक्ति अपने नाम के साथ कोई कलंक लेकर नहीं जीना चाहता। इसीलिए उन्हें समाज का भी भय था.  एक तो सामाजिक निन्दा का भय उनसे सीता की परीक्षा करवा गया. दूसरे, जिस व्यक्ति के खुद कभी किसी से अनैतिक सम्बन्ध न रहे हों, वह पत्नी भी शुद्ध चाहे तो इसमें क्या बुराई है? दूसरी ओर अन्य देवताओं को देखिए। कृष्ण की सोलह हज़ार रानियां थीं, अनेक गोपियों के साथ रासलीला रचाते थे, राधा के साथ प्रेम सम्बन्ध था. वे क्या किसी की अग्निपरीक्षा लेते? सूर्य देवता ने अविवाहिता कुंती के साथ सम्बन्ध बना कर उसे पुत्र कर्ण सौंपा। इंद्र देवता ने भेष बदल कर ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या के साथ समागम किया। महाभारत के पाण्डु ने नियोग से संतानें उत्पन्न करवाईं। ऐसे देव क्या किसी की अग्निपरीक्षा लेते? एक राम ही निष्कलंक छवि के हैं. सीता की अग्निपरीक्षा में उनका ध्येय सीता पर अविश्वास नहीं, अपितु अपनी निष्कलं छवि को बनाए रखने की कोशिश भर थी. राम मेरे प्रिय पात्र। सदैव पूजनीय।

राम आदर्श पुरुष थे, निःसंदेह मर्यादा पुरुषोत्तम थे. उन्हें भगवान हमने बनाया। ठीक भी है, जिसने राक्षसों का सर्वनाश किया हो, ऋषिओं का जीवन आसान किया हो, जिनकी कथा एक सफल जीवन जीने की राह दिखाती है, वह भगवान नहीं तो और क्या। राम पूजनीय हैं.

हम जो भी धार्मिक प्रसंग उठा लें, उसे आज के सन्दर्भ से जोड़ें तो हम बहुत कुछ सीख सकते हैं. वरना आप गाते रहिये, भज गोविन्दम, भज गोविन्दम, भज गोविन्दम मूढ़मते। मूढ़मते तो वे हैं, जो मात्र नाम का जाप करते हैं, उस नाम के साथ जुडी कहानियों से कुछ सीखते नहीं।

Thursday, 10 October 2013

स्त्री विमर्श 2

स्त्री विमर्श 2


मेरे तईं स्त्री विमर्श की सार्थकता तब है जब इसकी शुरुआत स्त्रियों द्वारा पुरुष की दी गई सुविधाओं को नकारने से हो. मैं स्त्रियों की आज़ादी के पूर्णतया पक्ष में हूँ. लेकिन कानून द्वारा स्त्रियों को जो सुविधाएं दी गई हैं, प्रायः उनका अनुचित लाभ उठाते स्त्रियों को देखा गया है. मेरी जानकारी में अनेक ऐसे किस्से हैं, जहाँ औरतों ने आउट ऑफ़ द वे जाकर अपने पक्ष में लड़ाई की और जीती है. लड़की की शादी के लिए लड़के के स्टेटस को मुख्यता दी जाती है, उनके आपसी व्यक्तित्व तथा मानसिकता के विरोधी स्वरुप की ओर ध्यान नहीं दिया जाता। लड़की वालों को पहले बता दिया जाता है कि फलां घर का रीति-रिवाज़ इस तरीके का है, लड़की एडजस्ट कर पाएगी या नहीं, देख लें लेकिन लड़की वालों का प्रयास ऐसा रहता है कि लड़के की आर्थिक स्थिति देख कर किसी तरह एक बार शादी के बंधन में उसे बाँध लिया जाए, किसी तरह एक बार उसके घर में घुस जाएं, बाद में तो हमारी पाँचों उंगलियाँ घी में हैं, ठीक से निभेगा तो ठीक, वरना उसका पैसा ऐंठ कर चलते बनेंगे। शादी के शुरू में भी लड़की को बता दिया जाता है कि देखो, इस घर का रीति-रिवाज़ यह है, चुनाव तुम्हारे हाथ में है, रहो या जाओ, लेकिन लड़की चूंकि लड़की है और अपने अधिकारों के प्रति सजग है, तो उसका रवैया यही रहता है कि बच्चू, देख, तुझे कैसा सबक सिखाती हूँ. लड़कियों को सास, ससुर, ननद, देवर वाले घर में जाना पसंद नहीं होता, लेकिन वे सोचती हैं कि इनसे तो बाद में निबट लेंगे। ऐसे विचारों की लडकियां जो खप जाती हैं, वे अपने विवाह को सफल कहती हैं. यह घर-घर की कहानी है कि लडकियां ज़बरदस्ती लड़कों और उनके परिवार पर थोपी जाती हैं. असल में इसका कारण यह है कि आज भी लड़कियों को अच्छे लड़के मुश्किल से मिलते हैं और लड़के के लिए एक वैवाहिक विज्ञापन देते ही लड़कियों के बायोडाटा के ढेर लग जाते हैं. लोग अपनी बेटियों के रिश्ते लेकर पीछे पड़े रहते हैं. मित्रों, मैं खुद एक स्त्री होने के नाते स्त्री-विरोधी कदापि नहीं हूँ, लेकिन स्त्रियों द्वारा अपने स्त्री होने का फायदा उठा कर अत्याचार किए जाने के पक्ष में भी नहीं हूँ. आजकल विवाह एक प्रेम का रिश्ता नहीं, व्यवसाय बन कर रह गया है. है कोई ऐसी स्त्री जिसने पुरुषों से बराबरी का रोना तो रोया हो लेकिन पुरुषों द्वारा प्रदत्त सुविधाओं पर आश्रित न रही हों?

स्त्री विमर्श 1

स्त्री विमर्श 1 : (प्रकाशित : बिंदिया, नवम्बर, '13)

मैत्रेयी पुष्पा के लेख के सन्दर्भ में

मैत्रेयी पुष्पा के लेख का शीर्षक सिर्फ 'स्त्री विमर्श' नहीं है, बल्कि 'स्त्री विमर्श और आत्मालोचन' है. उन्होंने स्त्री विमर्श की समर्थक लेखिकाओं को अपने भीतर झाँकने की सलाह दी है, लेकिन उन्होंने स्वयं अपने आत्म का कितना अवलोकन किया है, यह बात देखने योग्य है. वे लेख के पूर्वार्ध में संतुलित तरीके से बात कहती हैं लेकिन लेख के उत्तरार्ध में उनका संतुलन बिगड़ गया लगता है. उनका गुस्सा युवा लेखिकाओं पर क्यों निकला, इसकी वजह वही जानती हैं. वह तो उन्हें लेखिका तक कहने को तैयार नहीं। मैत्रेयी का यह कथन ….  "उन रचनाकारों को सचेत होना पड़ेगा जिनको हम लेखिका कहते हैं." आपत्तिजनक है. जो हैं ही लेखिका, उन्हें आप लेखिका कह कर अहसान नहीं कर रहे. इस कथन से यह ध्वनित होता है कि मैत्रेयी अपने अतिरिक्त अन्य किसी को लेखिका कहा जाना पसंद नहीं करतीं।

दूसरा आपत्तिजनक कथन है, "वे (युवा लेखिकाएं) लेखन के हल्केपन की परवाह नहीं करती, जवानी को संजोए रखने की फ़िक्र में हैं." और अपनी असली उम्र नहीं बतातीं। अरे मैत्रेयी जी, हमारी-आपकी जवानी जा रही है, तो इसका यह मतलब नहीं कि दूसरों की जवानी से जलें। यह विचारणीय प्रश्न है कि युवा लेखन कैसे निर्धारित हो? क्या लेखक की उम्र से या लेखन की उम्र से? जिन लेखक / लेखिकाओं ने चालीस वर्ष की उम्र के बाद लेखन की दुनिया में प्रवेश किया, वे अपनी किस उम्र तक या अपनी लिखी कितनी पुस्तकों तक युवा कहलाएंगे? स्त्री विमर्श की चर्चा करते समय लेखिकाओं को इन शब्दों में ललकारना निन्दास्पद है एवं विषयांतर भी.

मैत्रेयी का तीसरा प्रश्न जो स्त्री विमर्श से जुड़ा है वह है, "आज की रचनाओं में लिव इन रिलेशनशिप, अफेअर, मैरिज, डाइवोर्स, और कितने-कितने लोगों से यौन सुख का रिफ्रेशमेंट उफ़ ! यह स्त्री विमर्श? स्त्री का मनुष्य रूप केवल यही है? उसने अपने हक़-हकूक केवल इसी स्थिति के लिए लेने चाहे थे?" लेकिन बाद में उन्होंने मान भी लिया कि यह सही है, इस विषय पर रचनाएं आनी चाहिए।

विज्ञापनों में स्त्री देह को माध्यम बनाने का विरोध सही है लेकिन मैत्रेयी को विवाह के मौके पर स्त्री का साज-श्रृंगार करना भी नहीं सोहता। क्या विमर्श के नाम पर स्त्री अपनी इयत्ता को खो दे?

मैत्रेयी को क्यों है युवा लेखिकाओं पर इतना क्रोध? क्यों है युवा लेखिकाओं से इतनी ईर्ष्या? क्या इसलिए कि उन्हें अपना युवा वक़्त ख़त्म होता हुआ लग रहा है?

ग़ज़ल 31

ग़ज़ल 31

जो डूबे हुए थे अथाह गहरे सागर
कि उनकी भी आँखों में पानी नहीं है.

सुनाने लगेंगे तो रोके ना कोई
यह कोई ज़रा सी कहानी नहीं है.

तूने जो फेंका था स्वप्नजाल उसमें
बिना तेरे जीना आसानी नहीं है

तेरी बातें चंचल, तेरी चाह अद्भुद
कि मुझ सी कोई धुन दीवानी नहीं है.

मेरे पाँव डगमग, मेरी चाल लड़खड़
सफ़र में कोई भी सैलानी नहीं है.

कि कैसे वहाँ पहुँच पाएँगे कब तक
कोई राह जानी-पहचानी नहीं है.

Monday, 7 October 2013

नहीं आती है तेरी याद Kavita 176

नहीं आती है तेरी याद

सोच-सोच कर मैं परेशान थी
कि मैं क्या भूल रही हूँ
तभी याद आया कि मैं
तुझे याद करना भूल रही हूँ.

याद भी अब तेरी आती नहीं
जिससे पहले भरा रहता था
मन और मस्तिष्क का कोना-कोना
तेरी याद के बिना
अब सब खोखला हो गया है.

जीने की वजह अब भी नहीं है पास
चारों ओर अनजाने हो जाता है उदास
लगता है, थकान है यह उम्र की.

खालीपन को किसी भी काम से भरूँ
भरता नहीं है, और मरता है
सोचूँ तेरे बारे में तो भर उठती हूँ
दर्द से, अकेलेपन के अहसास से.

तू न सही, तेरी याद सही
जीने के लिए एक वजह तो थी
अब जीऊँ तो किसलिए जीऊँ?
आजा, याद आजा
मेरे जीने का कम से कम
इतना बहाना तो बन.

Friday, 4 October 2013

अनामिका (कहानी)

अनामिका  (कहानी)

(प्रकाशित : 'बिंदिया' मार्च, 2014)

मैं किसी काम से कनौट प्लेस जा रही थी. अभी मैं घर से निकली ही थी कि एक लड़की ने अँगूठा दिखा कर लिफ्ट माँगी. अमूमन तो मैं किसी को लिफ्ट नहीं देती लेकिन वह लड़की ऐसी जगह खड़ी थी जो न बस स्टॉप था, न ऑटो स्टैंड. उसका मकसद जैसे किसी न किसी से लिफ्ट लेना ही था. मैंने कार रोक दी. उसने बताया, उसे काफी दूर जाना है, पर मैं उसे कनौट प्लेस तक ही छोड़ दूं. मैंने उसे अपने साथ बैठा लिया.

रास्ते में, ज़ाहिर है, कुछ न कुछ बात होनी ही थी. वही अपने बारे में बताती रही, 'अब कौन बसों के धक्के खाए, ऑटो कोई सस्ते हैं क्या? मैं ऐसे ही लिफ्ट लेकर गुज़ारा कर लेती हूँ.'

मैंने मन में सोचा, वाह वाह, कमाल है. चालू, चंट, चतुर, चालाक, ये चार शब्द मेरे मस्तिष्क में स्वतः लहरा गए.

फिर उसने बताया कि उसने एक बार आधी रात को किसी से लिफ्ट ली थी. गाड़ी में दो लड़के थे, आगे बैठे हुए थे, वह पीछे बैठी थी. मैंने पूछा, तुम्हें डर नहीं लगा तो वह बोली, 'डरना कैसा? डर तो उन लड़कों को मुझसे लगना चाहिए था. मुझे पीछे बैठाते हुए उन्होंने नहीं सोचा कि कहीं मैं उन्हें पीछे से चाक़ू-गोली ना मार दूँ?'

तुम धन्य हो, मैंने कहा नहीं, सिर्फ सोचा। निकला मेरे मुँह से यह, 'फिर भी .... अखबारों में नहीं पढ़तीं, कितने हादसे रोज़ होते हैं? तुम इतनी छोटी, सुन्दर सी लड़की, कहीं किन्हीं वहशियों के हाथ पड़ गईं तो?'

उसने तुरंत उत्तर दिया, 'अरे मैडम, ज्यादा से ज्यादा वो क्या कर लेंगे? अपन का उसूल है, कहीं फँस जाओ और ज़िन्दगी व मौत के बीच बाज़ी लगी हो तो ज्यादा हो-हल्ला नहीं करने का, आराम से एंज्वाय करने का.'

माई गुडनेस ! मैं उसकी बात सुन कर धक्क रह गई. बड़ा बिन्दास तरीका है जीने का. बोल ऐसे रही है, जैसे अभी कोई बम्बइया फिल्म देख कर आई है. या कहीं यह लड़की मुंबई से ही तो नहीं है? बात करने का लहज़ा मुम्बइया है. छोडो, मुझे क्या? पर यदि यही इन्तेहा है तो भई डटे रहो. लेकिन कहा मैंने उससे यह, 'कोई दूसरा तुम्हारे साथ कुछ क्यों करे? तुम करो जो करो. च्वाएस तुम्हारी हो, दूसरे की नहीं.'

उसने एक क्षण मेरी ओर देखा, जैसे आँखों ही आँखों में मेरी बात की सचाई को तोल रही हो. फिर बोली, 'आपने बड़ी ग्रेट बात कही मैडम,' कह कर वह हँस दी.

मैंने उसके बारे में जानने की नीयत से कहा, 'अनमैरिड लगती हो. वैसे आजकल पता नहीं चलता, कौन शादीशुदा है, कौन क्वारा?'

'शादी जल्द ही करने वाली हूँ. लड़का मेरी च्वाएस का है. वेरी वेल-टु-डू. शादी के बाद मुझे लिफ्ट लेने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी.'

'क्यों? क्या हर वक्त वह तुम्हें छोड़ा करेगा?' मैंने कहा, यद्यपि मुझे यह नहीं पता था कि रोज़ उसे कहीं जाना भी होता है या नहीं?

'नहीं जी, शादी के बाद मेरे पास मेरी अपनी कार होगी. उसने वादा किया है.' अभिमान का तेज उसकी आँखों में दिखाई दिया.

'तो तुम उस पर आश्रित रहोगी?' मेरी बात उसे तीर की तरह चुभी. वह जैसे बिलबिला उठी.

'मैडम, शादी एक गिव एंड टेक है. क्या वह कार मुझे मुफ्त में देगा? क्या उसे मुझसे कुछ नहीं मिलेगा?' 

उसकी बात मुझे आश्चर्यचकित करने वाली थी. उसका गणित पक्का था. मैंने कभी इस लेन-देन की मानसिकता की ओर ध्यान नहीं दिया था. मैं बोली, 'पर जो उसे तुमसे मिलेगा, वह तुम्हें भी तो उससे मिलेगा? क्या तुम्हारे लिए उस प्यार का, उस सुख का कोई महत्त्व नहीं?'

कनौट प्लेस आ गया था. मैंने जनपथ पर अपनी गाड़ी पार्क की. हम दोनों कार से उतरे. मुझे उसकी बातें दिलचस्प लग रही थीं. शायद उसे भी. मैंने कहा, 'तुम्हारे पास टाइम है तो कॉफ़ी पिएँ?'

उसके 'हाँ' कहने पर हम दोनों मैकडोनल्ड में घुस गए. अब हम एक छोटी सी मेज़ को घेर कर आमने सामने बैठे थे.

मैंने पहली बार उसे गौर से देखा, तीखे नैन-नक्श की, गौरवर्णी, जिसे निःशंक सुन्दर कहा जा सकता था, उम्र होगी, बीस-पच्चीस के आसपास, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली, ग्रेजुएट तो होगी ही, पहनावा आधुनिक यानि टाँगों से चिपकी हुई जीन्स के ऊपर एकदम टाइट टॉप, शरीर के सारे उभार और कटाव सलीके से नज़र आ रहे थे. आँखों में अपने खूबसूरत होने का अहसास था. चेहरे पर स्वाभिमान का रुआब था.

कॉफ़ी न लेकर हम ने फाउन्टेन पेप्सी लिया और स्ट्रॉ को होठों में दबा कर बात शुरू करने का इंतज़ार करने लगीं. बात मैंने ही शुरू की, 'तो? तुम्हारी नज़रों में शादी एक गिव एंड टेक है?'

'और नहीं तो क्या? मैडम, आपके ज़माने में औरतें गिव ही गिव करती थीं, हम नई पीढ़ी ने टेक के बारे में भी सोचा. आखिर कब तक पिसते रहें हम इन मर्दों की ज्यादतियों तले?' उसकी आवाज़ आक्रोश से थरथरा रही थी. 'मर्द' शब्द जैसे एक गाली को प्रतिध्वनित कर रहा था.

'किस ने ज्यादती की तुम्हारे साथ?' मेरे पूछने मात्र से वह भड़क उठी, 'मैडम, आप इतना भी नहीं समझतीं कि मैं एक आम औरत की बात कह रही हूँ, व्यक्तिगत नहीं? कितना सहा है, हम औरतों ने? बस, अब और नहीं.'

'ऐसी बात नहीं है, मैं भी औरत की आज़ादी के पक्ष में हूँ. इतनी भी पुरानी नहीं हूँ जितनी तुम सोच रही हो. मेरी पूरी कोशिश रहती है, नए ज़माने के साथ कदम से कदम मिला कर चलने की,' कहते हुए मेरे चहरे पर ज़रूर बेचारगी का भाव रहा होगा, क्योंकि मैं इस मलाल में थी कि काश ! मेरी उम्र इस लड़की की उम्र के बराबर होती तो आज मैं भी खुद को नई पीढ़ी की कह कर गर्वोन्नत होती. मेरे भीतर एक अजीब सी मायूसी उभर आई और कुछ पलों के लिए मैं अपने अन्दर के किसी अँधेरे तहखाने में गुम हो गई.

'मैडम, आप नहीं सोचतीं कि अब तक औरत के साथ अन्याय होता आया है?' उसकी आवाज़ से जैसे मेरी तन्द्रा टूटी. मैंने एकबारगी यह भी सोचा, वह किसी महिला संस्था या महिलाओं के पक्ष में काम कर रही किसी एन जी ओ से तो सम्बद्ध नहीं है? कहीं वह ऐसे ही किसी प्रचार के लिए तो मुझे माध्यम नहीं बना रही? मुझे सैकड़ों औरतों की सिसकियाँ सुनाई देने लगीं, जिनके साथ हुए अन्याय-अत्याचार की कहानी मैं सुन चुकी थी. कई स्त्रियों को पुरुष से यह प्रशंसा सुननी तो नसीब हुई थी कि उन्होंने पुरुष का जीवन निखारने-सँवारने में योगदान दिया, लेकिन उनका अपना जीवन ना निखरा था, ना सँवरा था. अमीर घरों की स्त्रियाँ पैसे के बल पर सुखी नज़र आती थीं, लेकिन प्यार के बल पर वहाँ भी शून्य था. उनके पास कपड़ों-गहनों के ढेर थे लेकिन जीवन में कोई निर्णय लेने का अधिकार नहीं था.

मैं सोच में डूबी हुई थी कि उसकी आवाज़ ने मुझे फिर से झकझोर दिया, 'मैडम, हमें चुप नहीं बैठना है. हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी. इन कमीनों को सबक सिखाना होगा.'

मैंने हकलाते हुए कहा, 'हाँ आँ ..... तुम सही कह रही हो. पर किन कमीनों को?'

'नासमझी की हद कर दी आपने, अरे इन पुरुषों को ..... '

ओह, कैसे बोल रही है? इसे मेरी उम्र का कोई लिहाज नहीं? बच्ची, मैं तुझसे बड़ी हूँ कितनी, कुछ तो इज़्ज़त कर. लेकिन मैंने अपनी कोई नापसंदगी ज़ाहिर नहीं की. ज़ाहिर किया तो यह, 'ओह ! छोडो, गाली मत दो .....'

'यह भी कोई गाली हुई, मैडम? गालियाँ तो मेरी सहेलियाँ देती हैं, एकदम शुद्ध लड़कों वाली। मैं तो 'कुत्ता', 'कमीना' से आगे नहीं बढ़ पाती.'

शुक्र है, मैंने मन में सोचा, बोला यह, 'मेरे दिमाग में आज़ाद औरत की एक तस्वीर है, एक कल्पना है, एकदम फूलप्रूफ ..... '

'बताइए ना प्लीज़, जल्दी ..... ' 'जल्दी' उसने ऐसे कहा जैसे वह अभी उस पर अमल कर लेगी.

'देखो, आज़ाद होना है तो पहले आर्थिक स्वतन्त्रता होनी चाहिए ..... '

'यह बात बहुत पुरानी हो गई. सबको पता है. कोई नई बात बताएँ.'

'तुम पति से कार लेने की बात कर रही थीं ना? उसकी दी हुई चीज़ों पर ऐश करने की बजाय तुम इस काबिल बनो कि उसे कार दो ..... '

'व्हाट अ नॉनसेंस ! सौरी मैडम ..... पर बात कुछ जमी नहीं.'

'जमेगी, पूरी सुनो। खर्च का बराबर बटवारा करो ..... '

'आप तो ग़ज़ब हैं, मैडम। बड़ी विचित्र बात कह रही हैं आप. हम उसके बच्चे भी पैदा करें और पैसा भी खर्च करें?'

मुझे लगा, बड़ा कठिन है, इस कदर हिसाबी-किताबी लड़की से स्वस्थ संवाद बनाए रखना. फिर भी, जवाब तो देना था. इसलिए मैंने कहा, 'बच्चे तुम्हारे भी तो कहलाएँगे. तुम माँ होने के नाते बच्चों से ज्यादा प्यार करोगी, भावात्मक रूप से उन पर ज्यादा निर्भर रहोगी.'

'बस मैडम बस, वह हमारे शरीर का इस्तेमाल करेगा तो हम पर खर्च भी नहीं करेगा?' वह खीज कर बोली. मुझे किसी के द्वारा कही गई या कहीं पढ़ी हुई यह सूक्ति स्मरण हो आई कि वाइफ़ इज़ अ लीगल प्रोस्टिच्यूट. उफ़ ! मुझे स्वयं से घिन होने लगी, मैंने ऐसा क्यों सोचा. कहने को कहा मैंने
यह, 'तुम भी तो उसके शरीर का इस्तेमाल करोगी? क्या शारीरिक सुख सिर्फ वह भोगेगा, तुम नहीं? और इस सुख को केवल शरीर तक सीमित मत करो. प्रेम से उसके मन के भीतर उतरना होगा और उसे अपने मन में बैठाना होगा.'

'ओह हो ! और फिर एक दिन उसका दिमाग खराब हो गया तो वह हमें घर से निकाल कर बाहर खड़ा करेगा?'

उसकी यह बात सुन कर मुझे उस पर तरस आया. इसने ज़रूर कुछ ऐसी दुर्घटनाएँ करीब से देखी हैं, जिनके काले साए इसके दिलो-दिमाग पर छाए हुए हैं. यह लड़की ज़रूर चोट खाए हुए है. मैंने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया, मानो किसी नामालूम दुःख के लिए उसे सान्त्व्ना दे रही होऊँ. इस स्पर्श ने जादू का सा असर किया. उसकी आँखों में पानी-सा नज़र आया, जो मेरे कुछ सोचने से पहले धार-धार उसके गालों पर बहने लगा. मैंने आँसू पोंछने के लिए उसे टिशू पेपर दिया, अपनी कुर्सी से उठ कर उसके पास आई, उसके कन्धों को थपथपाया और बोली, 'रोते नहीं, यू आर अ ब्रेव गर्ल.'

उसने भर्राए गले से कहा, 'वह साला कमीना था.'

'कौन?' मैंने पूछा. सोचा, शायद किसी लड़के से धोखा खाए हुए है. नवयुवा है, सुन्दर है, पीछे लगने वाले लड़कों की क्या कमी होगी? हर लड़का वफादार नहीं होता. सच है, लड़का कोई कुत्ता नहीं होता जो वफादार हो. छिः छिः, मुझे अपने आप पर शर्म आई, मैं क्यों उसके शब्दों में सोच रही हूँ?

'मेरा बाप, साला कुत्ता,' उसके मुंह में इतनी कडवाहट थी, मानो, बाप के नाम पर वह वहीँ थूक देगी. तो इसलिए लड़कों और ज़िन्दगी के प्रति उसका इतना चलताऊ रवैया है? शायद यही कारण है कि उसने जैसे अपने को फ़ेंक दिया है, बहती लहरों के बीच, जो उसे पार तो लगाने से रहीं, उसके डूबने की ही अधिक संभावना है. यूँ मझधार में छलाँग लगा देना उसका साहस नहीं, कमजोरी है. पहले अच्छी तरह तैरना तो सीख ले, पगली. शायद वह एक आत्महन्ता मनस्थिति से गुज़र रही है, मैं सोचे जा रही थी, लेकिन उसके मन में उलझी गुत्थियों को सुलझाने का सिरा नहीं ढूँढ पा रही थी.

जल्दी ही उसने खुद को सँभाल लिया और आगे कहा, 'वैसे मैडम, मैं शादी करने से डरती हूँ. कहीं वह भी मेरे बाप जैसा कमीना निकला तो ..... '

मैंने अपनी कुर्सी उसकी कुर्सी के पास खिसका ली और उसका कंधा थपथपाते हुए बोली, 'इसका भी इलाज है ..... '

'क्या?' उसने पूछा तो मैं एकबारगी रिश्तों के खोखलेपन की बात सोच कर भीतर ही भीतर सम्वेदना शून्य हो गई. क्या ऐसा संभव है कि हम अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी जी पाएँ? हाँ, संभव तो है, लेकिन उसके लिए आवश्यक है, आपकी खुद की कमाई हई एक बेहद सुविधाजनक जीवन शैली और ज़माने भर की लानतों के बीच से गुज़रने का साहस. कठिन कुछ भी नहीं है, बस, एक बार आप ठान लें.

मैंने उसे उपचार सुझाने के अनुमान से कहा, 'उसके घर में रहने की बजाय उसे अपने घर में रखो ताकि कभी रिश्ते बिगड़ने की नौबत आए तो घर से वह निकले, तुम नहीं ....., ' कहते हुए मुझे लगा, कहीं मैं मज़ाक में तो बात को उड़ाने की कोशिश नहीं कर रही? मैंने पहले तो कभी इस तरह से नहीं सोचा, फिर आज कहाँ से यह विचार उत्पन्न हो गया? हो सकता है, मेरे अवचेतन मन में यह फितूर चल रहा हो कि औरत को आज़ाद होना है तो सबसे पहले उसे मर्द की दी हुई सुविधाओं से अपने को मुक्त करना होगा, उसे इस काबिल बनना होगा कि वह ठीक उसी अंदाज़ में अपने मनचाहे पुरुष को एक घर का सुख देकर अपने पास रख सके, जैसे पुरुष उसे आजतक रखता आया है. पुरुष सत्तात्मक समाज को बदलना है तो इस तरह आगे बढ़ो, अन्यथा प्रेम में तो पुरुष स्त्री, दोनों एक दूसरे के तलवे चाटते हैं, इस सत्य से कौन परिचित नहीं है?

वह चुप, कुछ सोचती सी बैठी रही. जैसे वह भी मेरी तरह आत्म-मंथन में फँसी हो. मैंने आगे कहा, 'ज़िन्दगी की शुरुआत नकारात्मक सोच से नहीं होती. अभी शादी का विचार दिल से निकाल दो, अभी पढ़ो-लिखो, कुछ बनो, कुछ साल बाद शादी करने की सोचना ..... '

'आपका कहना ठीक है, आंटी, अभी मेरी उम्र ही कितनी है? सिर्फ बाइस वर्ष ही तो है, पहले कुछ बन जाऊँ.'

उसने पहली बार मुझे 'आंटी' कहा था, मैं खुश हुई. मुझे लगा, मेरी बात उसके भीतर कहीं तो उतरी है. एक अनजाना सा अपनापन मुझे उसकी ओर खींचने लगा. मैंने उसे गले से लगा लिया.

हम उठ खड़े हुए. 'थक गई ना? भूख लगी होगी?' मैंने कहा और मैकडोनल्ड से बाहर निकलने से पहले बर्गर खरीदे. बर्गर का पैकेट उसे पकड़ाते हुए कहा, 'रास्ते में खा लेना.'

मैं अपनी कार की ओर बढ़ी, वह दूसरी दिशा में. मैंने उस पर एक नज़र डाली, मेरी ओर उसकी पीठ थी. छरहरी देहाकृति पर ब्वाय कट, लम्बे बालों में वह ज्यादा सुन्दर लगती. सुन्दर तो वह थी ही पर और ज्यादा सुन्दर लगती. मैंने सोचा. तभी मुझे ख्याल आया, अरे, उसका नाम .... ? लेकिन वह दूर जा चुकी थी. पूछना नामुमकिन था. मैंने उसके लिए दुआओं में हाथ ऊपर उठा दिए, प्रभु, उसकी रक्षा करना.

Wednesday, 2 October 2013

मुठभेड़ - ध्रुव गुप्त

मुठभेड़ - ध्रुव गुप्त

मुठभेड़ - ध्रुव गुप्त का पहला कहानी संग्रह, जो राजकमल द्वारा सन 2004 में प्रकाशित हुआ था, मेरे सामने है. मुझे नहीं मालूम था, ध्रुव गुप्त कहानियाँ भी लिखते हैं. मैं उन्हें गज़लकार / कवि के रूप में जानती थी. लेकिन जब उनकी एक कहानी 'अपराधी' मैंने फेसबुक पर पढ़ी, तो उनके गद्य ने मुझे उनकी लिखी गजलों / कविताओं से ज्यादा प्रभावित किया और मेरा प्रयास रहा कि मैं उनकी लिखी अन्य कहानियाँ भी पढूँ। अब जब मैंने 'मुठभेड़' की कहानियाँ पढ़ीं तो मैं निश्चित रूप से कह सकती हूँ कि वे कवि से बढ़ कर कहानीकार हैं. यह बात दूसरी है कि उनकी कहानियों के भीतर से उनका कवि ह्रदय झाँकता है, उनकी कहानियों में उनका कवि ही मुखर है.

इस संग्रह में 12 कहानियाँ संकलित हैं, जो उनके पुलिस की नौकरी के अनुभवों से रँगी हुई हैं. कहानियाँ पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि हम पुलिस महकमे के भीतर खड़े हुए वहाँ की कार्यप्रणाली को देख रहे हैं. उन्होंने निःसंग भाव से पुलिस के अन्दरूनी राज़ कुछ इस तरह खोले हैं, जैसे पुलिस में नौकरी करने का उनका मकसद केवल कहानियों के लिए विषय जुटाना था, क्योंकि उनके द्वारा निर्मित कहानियों का नायक, जो एक पुलिस अधिकारी है और इस चरित्र में लेखक की अपनी प्रतिच्छवि है, वह अपने भावुक ह्रदय, दयाभाव, कल्पनाशीलता के कारण स्वयं को इस नौकरी के काबिल नहीं पाता. पाठक की दृष्टि में भी उसकी छवि एक ऐसे अधिकारी की हैं जो मानो किसी अवांछित नौकरी में फँसा हुआ है. ज़ाहिर है, उसका कोमल ह्रदय पुलिस की क्रूर एवं हृदयहीन कार्यशैली के साथ समझौता नहीं कर पाता। वह इस नौकरी के खुरदुरेपन से कोसों दूर है. कहानी 'थर्ड डिग्री' में थर्ड डिग्री का प्रयोग, कहानी 'मुठभेड़' में झूठी मुठभेड़ दिखा कर निर्दोष युवकों की हत्या करना, अपने काम को जस्टिफाई करने की पैंतरेबाजी, गलत को भी सही सिद्ध करने के लिए जुटाए गए ऐसे तर्क जो जनता को अत्यंत प्रमाणिक लगें, पुलिस का सच्चा चिट्ठा जैसे खोल कर रख देते हैं.

भावनाप्रधान कहानियों में 'हत्यारा' एवं 'अपराध' जैसी कहानियों को रखा जा सकता है. 'अपराध' कहानी आज के दामिनी के बलात्कार काण्ड की याद दिला जाती है, जिसमें एक निहत्था आदमी एकाधिक गुंडों के सामने कुछ न कर पाने की स्थिति में मन मसोस कर रह जाता है और लड़की को बचा न पाने के लिए खुद को दोषी मानने लगता है. सच है, आप किसी को बचाने के लिए कितने भी ईमानदार हों, कितने भी बलशाली हों, सशस्त्र गुंडों के सामने आप विवश हैं, खामोश रह कर सब सहने के लिए. कहानी 'हत्यारा' में प्रेम की इन्तेहा है. पुलिस की नौकरी आदमी को शुष्क बना देती है, निरंतर ह्त्या, चोरी, डकैती आदि की घटनाओं से गुज़रते हुए संवेदनशीलता चुक ही जाती होगी लेकिन लेखक का ह्रदय संवेदनशील है, तभी वह इस कहानी में ऐसे नायक-पात्र की रचना कर सका जो बिना किसी शर्त के प्रेम करता है और उस प्रेम का निबाह भी करता है.

अन्य कहानियों में 'नाच', 'काण्ड', 'आरा', 'कल्कि अवतार', 'डाइन', 'अंत', 'लाइन ऑफ़ कंट्रोल', 'आरम्भ' हैं. हर कहानी में एक कहानी है, कहानी के ब्यौरे हैं और हालात से निबटने के अलग-अलग रास्ते हैं. 'आरम्भ' एक अलग किस्म की कहानी है जो उम्रदराज़ हो गए एक स्त्री-पुरुष के द्वारा नए जीवन की शुरुआत करने की सम्भावना की ओर संकेत करती है.

पहले भी इस तरह की कहानियाँ लिखी जाती रही हैं लेकिन मुझे नहीं ध्यान कि किसी अन्य लेखक ने इतनी ईमानदारी से इस महकमे की सचाई को उजागर किया हो. पुलिस के अत्याचार, जो पुलिस की नौकरी में एक अनिवार्य एवं सामान्य व्यवहार है, जैसे सचित्र सामने आ खड़े हुए हों और हम खुली आँखों से उन्हें घटता देख रहे हों. पढने के बाद एक इच्छा सी जागी कि भई, यह महकमा तो गज़ब का है, स्याह-सफ़ेद कुछ भी कर लो और कानों-कान किसी को खबर न हो. ऐसी नौकरी जिससे सब डरें, बस दिल मज़बूत होना चाहिए दरिन्दगी के बीच ज़िन्दा रहने के लिए, अन्यथा आदमी ध्रुव गुप्त की तरह मन ही मन बिलखता रहेगा और कहानियों के ज़रिये अपने मन के भारीपन को हल्का करता रहेगा। बुरा नहीं है यह करना।

ध्रुव जी, अब आप कुछ और कहानियाँ लिखिए, बल्कि सिर्फ कहानियाँ ही लिखिए, कहानियों में आप स्वयं को बेहतर तरीके से अभिव्यक्त कर पा रहे हैं. आपकी कहानी ने दिल को हिला कर रख दिया। अब बताइए, कितने ही कानून बन जाएं, कितनी ही फांसी की सजाओं को मान्यता मिल जाए, शहर की लडकियां कितनी ही दबंग क्यों न हो जाएं, इस तबके की लड़कियाँ, बल्कि किसी भी तबके की, ऐसे माहौल में बच ही नहीं सकती। इस स्थिति को बदलने के लिए केवल और केवल पुरुष को अच्छे संस्कार की ज़रुरत है। जब तक पुरुष की सोच में बदलाव नहीं आएगा, तब तक महिलाएं इसी प्रकार ज़ुल्म की शिकार होती रहेंगी। पुरुष की सोच में बदलाव के लिए आवश्यक है कि छोटे शहरों, गाँवों, पिछड़े इलाकों में शिक्षा के प्रसार की ओर सरकार ध्यान दे। / आपने कहानी के मुख्य पात्र का चित्रण बहुत ही सधे हाथों से किया है। उसके मन में लड़की के प्रति आकर्षण स्वाभाविक है। फिर लड़की को असहाय अवस्था में देख कर भी उसका चाहते हुए भी कुछ न कर पाना, उसके मन के भीतर चलने वाला संघर्ष बहुत सहज ढंग से उभर कर आया है। ऐसे हालात में कोई चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता। कुछ न कर पाने की पीड़ा और उस पीड़ा के साथ-साथ उभरा अपराध बोध, जबकि इस सब में उसका कोई कसूर ही नहीं है, फिर भी वह उसे बचाने के लिए खुद को ज़िम्मेदार समझता है और उसे न बचा पाने के लिए स्वयं को अपराधी महसूस करता है, यह एक मानवीय सचाई बड़े प्रभावी तरीके से आपने सामने रखी है। / आपने साधारण संतुलित भाषा में कथा बयान की है। ऐसा लगा जैसे आप उतने ही शब्द लिखना चाहते हैं, जितने से बात बन जाए। लेकिन यह कहानी और विस्तार मांगती है। यदि आपने यहाँ यह छोटी करके सार रूप में प्रस्तुत की है तो ठीक है। अन्यथा इस कहानी में विस्तार की बहुत गुंजाइश है। मसलन लड़के लड़की के आकर्षण को थोडा और खींचा जा सकता था। गाडी में चढ़ने से पूर्व का हिस्सा बढाया जा सकता था। इसी तरह बाद का भी और लड़के के मन-मस्तिष्क में चलने वाली कशमकश। / बहरहाल, कहानी अपने कथ्य को संप्रेषित करने में समर्थ है और यही कहानी की खासियत होती है कि वह जो कहना चाहे, प्रभावशाली ढंग से कह जाए।

Tuesday, 1 October 2013

जागृतावस्था Kavita 175

जागृतावस्था

लोग कहते हैं
मेरे चेहरे पर खूँखारियत रहती है
मेरे व्यवहार में है खुरदुरापन
मेरे सजने में है अनगढ़ता
मेरे बोलने में लापरवाही है
मेरे व्यक्तित्व में नहीं कोई आकर्षण
फिर भी तुमने मुझसे किया प्रेम का प्रदर्शन
तुम्हें डर नहीं लगा?

तुमने बताया, तुम डरते क्यों?
मैं जो भी थी, जैसी भी थी
'ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया' जैसी
अस्पर्शित, अनगाई गीत जैसी
मन और आत्मा में कुलबुलाहट को संजोये हुए
एक-एक कण में अनेक सपने बोये हुए
मेरे बेढंगेपन में एक अलग ढंग था
मेरे बदरंग जीवन का एक अलग रंग था.

लोग कहते हैं
मेरे माथे पर खड़ी रेखाएं हैं
मेरी आँखों में मुरझायापन है
मेरे होठों पर सहमी मुस्कान है
मेरी चाल में नहीं कोई सलीका
मेरे हाल लगते हैं बदहाल
फिर भी तुमने मुझसे नहीं किया कोई सवाल
तुम्हें डर नहीं लगा?



तुमने कहा, तुम डरते क्यों?
मेरी अनगढ़ता ने गढ़ा है तुम्हें
मेरी निरर्थकता में से खोजे तुमने अर्थ
मुझसे अर्थ पा तुम सार्थक हुए
तुमने अँधेरे में बनाए चित्र
मेरे सानिध्य में हुए तुम पवित्र.
मेरा अनछुआ चेतन-अवचेतन भी
तुमने छू कर जागृत कर दिया.


Monday, 30 September 2013

मेरे शब्द Kavita 174

मेरे शब्द

वह मेरे बस में है
जो मैंने नहीं कहा.
जो मैंने कह दिया
वह मेरे बस में कहाँ रहा?
वह सब तो दूसरों के हवाले हो गया.
वे जैसे चाहें, उसे समझें।

मैं बस अपने अनकहे की दावेदार हूँ.
अनकहे वे सारे शब्द जो अभी मेरे भीतर हैं
जिन्हें अभी मैंने अपने से दूर नहीं किया है
जिन्हें अभी मैंने किसी से नहीं बाँटा है
वे मेरे अपने हैं.

जो शब्द मेरे होठों से
मेरी कलम से निःसृत हो कर
मेरे चाहे-अनचाहे बाहर निकल गए
उन पर अब मेरा क्या अधिकार?
तीर कमान से निकल गया
तो बस निकल गया.

वे शब्द
अब हवाओं में घुले या बारिश में भीगें,
धूप में तपें या बहसों में खपें,
चाँदनी में नहाएँ या कहर ढाएँ, 
मुझे क्या?
मैं दूर खड़ी परायों की तरह देख रही हूँ
अपने शब्दों की खाक होती नियति।

Saturday, 28 September 2013

उसने कहा था Kavita 173

उसने कहा था
('साहित्य अमृत' जनवरी, 2014 में प्रकाशित)

उसने कहा था
तुम्हारे भीतर एक आग है
जो खींचती है मुझे तुम्हारी ओर.
अपना ही चयन उसे चुनौती सा लगा
कि एक दिन यह आग
उसे जला कर राख कर देगी.

उसने कहा था
तुम्हारे चेहरे पर
एक अजब सी रोशनी है.
और बुझ गया वह,
रोशन चेहरे की ओर देखते हुए
अन्धकार में बदल गया.

उसने कहा था
तुम्हारी बातों में कुछ ख़ास है
बड़ी महकी-सी मिठास है.
अजीब बात थी
उसके स्वाद की पहचान बदलने लगी
वही मिठास उसे ज़हर लगने लगी.

उसने कहा था
तुम्हारी हँसी में
मन्दिरों की घंटियाँ खनकती हैं.
दिन ऐसे अतीत हुए
जो एक दिन मुस्कान भी
व्यंग्य का पर्याय बन गई.

उसने कहा था
तुम सँवारोगी मेरा जीवन
दिखाओगी मुझे सही राह.
दीवाना मुझे छोड़ कर
किताबों में जीवन जीने के
नुस्खे तलाशने लगा.

रिक्त शब्दों से अनर्थ फूट रहा है
अर्थ अब भी सहमे-सहमे
हवाओं में बजबजा रहे हैं
समय ठहर गया है वहीँ का वहीँ.
उसने जो भी कहा था
उसे खुद नहीं पता कि क्यों कहा था?

Monday, 23 September 2013

ख़त्म हुई कहानी Kavita 172

ख़त्म हुई कहानी
('साहित्य अमृत' जनवरी, 2014 में प्रकाशित)

तुमने उस पल तक इंतज़ार किया
जब तक मन के निर्गंध आँगन में
महकते हुए फूल मुरझा नहीं गए.
तुमने तब तक अंधड़ बरसाए
जब तक बंजर नहीं हो गई उर्वर धरा,
सूख नहीं गया बादलों की आँख का पानी.
ख़त्म नहीं हो गई एक खूबसूरत कहानी.

तुम खिलते हुए मौसम पर
अपशकुन की तरह छाए
कि सूरज डर कर छुपा रहा
चाँद-तारे भी बेबस अँधेरे में रोते रहे
प्रकृति उलटफेर में उलझ गई.
तुममें कितनी थी नादानी.
मीठी सी कोई नहीं छोड़ी निशानी.

तुमने खुद रोपे थे प्रेम के बीज
खुद बनाई थी संगीत की धुनें
खुद चुना था साफ़-सुथरा रास्ता.
तुम्हारे आत्मघाती हमले से
सब तहस-नहस हो गया.
रुक गई एकाएक बहती हुई रवानी.
विष सी उछली मुंहफट बयानी.

धर्मग्रंथों में कथाएँ हैं ऐसी
युद्ध जीतने के लिए भी होती है नीति
अश्वत्थामा हतो, नरो वा, कुंजरो वा.
युद्ध कौशल के ज्ञान के बिना
तुम जीतने के भ्रम में युद्धरत हुए.
यह ज़िन्दगी बड़ी है शातिरानी.
तुम्हारे बस की नहीं थी यह, अज्ञानी.

तुम अपने ही हाथों मर गए.
अब कौन संजीवनी ले कर आएगा तुम्हारे लिए?
तुम बार-बार यूँ ही मरते रहोगे
तो बार-बार कौन जिलाएगा तुम्हें?
रिश्तों की डोर टूट चुकी कब की.
भगवान को सूझी यह कैसी शैतानी?
मेरा तुम्हारा मिलना था बेमानी.