Thursday, 31 January 2013

बालिग़ कौन?


बालिग़ कौन?

बलात्कार काण्ड (मशहूर। नहीं बदनाम) के छठे मुजरिम, जिसे नाबालिग ठह्रराया गया है, की जन्मतिथि है 4 जून, 1995 है यानि उसकी उम्र 16 दिसंबर को 17 साल, 6 महीने, 11 दिन थी। वाह वाह। बालिग़ होने से सिर्फ 5 महीने 19 दिन छोटा रह गया। काम में वहशी और उम्र में नादान। मैं तो कहती हूँ, इस लड़के को तड़पा-तड़पा के मारना चाहिए। देश के रहनुमां, क़ानून के रखवाले, यहाँ भी लड़की-लड़के के बीच यह भेदभाव? लड़कों की उम्र का ख्याल। लड़कियों की तो उम्र मायने ही नहीं रखती ना? 3 साल की बच्ची हो या 30 साल की औरत। छोटी से छोटी उम्र की लड़की और बड़ी से बड़ी उम्र की औरत का बलात्कार होता आया है। हरेक के बलात्कारी को एक जैसी सज़ा? यहाँ सज़ा के प्रावधान में लड़की की उम्र का ध्यान क्यों नहीं रखा जाता? कहाँ तक सुधारेंगे इस देश की क़ानून व्यवस्था को? इसकी जड़ें खोखली हुई पड़ी हैं। कानून की देवी की आँखों पर ही सिर्फ पट्टी नहीं बंधी, उसके कान भी बंद हैं और दिमाग भी।

जिस प्रकार बलात्कार या किसी भी जुर्म में लडकों की आयु का निर्धारण किया गया है कि 18 वर्ष से नीचे के युवक नाबालिग की श्रेणी में आते हैं, इसलिए उन्हें बालिगों की तरह सज़ा नहीं दी जाएगी। इसी प्रकार यह भी नियम बनना चाहिए कि 18 वर्ष से कम आयु की नाबालिग लड़की और बच्ची के बलात्कारी को निश्चित रूप से फांसी की सज़ा दी जानी चाहिए या उसकी सजा बड़ी आयु की स्त्री का बलात्कार करने वाले से अधिक होगी।

वैसे 18 वर्ष की उम्र में बालिग़ होने का निर्धारण, पता नहीं, किस आधार पर किया गया है? क्या सिर्फ उम्र के आधार पर? तो इसी उम्र को बालिग़ क्यों मानें? लड़के / लड़कियों के शरीर में 12-13 वर्ष की उम्र से यौवन में प्रवेश के परिवर्तन लक्षित होने शुरू हो जाते हैं। जहाँ तक मानसिक परिपक्वता की बात है तो उसका औसत क्या इसी उम्र में निकलता है? आजकल बच्चों को अधिक एक्सपोज़र मिल रहा है, अतः उनमें मानसिक परिपक्वता भी उम्र से पहले आ रही है। शारीरिक रूप से सक्षम लोग जुर्म करते हैं, इसलिए शारीरिक आयु के हिसाब से वयस्कता 12-13 वर्ष की आयु में आ जाती है। इसलिए बालिग़ होने की उम्र अधिक से अधिक 15 वर्ष होनी चाहिए। यूं भी, क़ानून में अनेक संशोधनों की आवश्यकता है। जब पूरी सभ्यता-संस्कृति परिवर्तित हो रही है तो नए क़ानून अपेक्षित हैं।

Wednesday, 30 January 2013

ग़ज़ल 7

ग़ज़ल 7

फूल  कुम्हलाने लगे  हैं, आज  मन  उदास  है
देर से बरसा ना सावन, अनबुझी सी प्यास है।

किस दिशा ले जाएंगी, दिल की बेसुध भटकनें
रास्ते  में   कुछ   नहीं, संत्रास  ही  संत्रास  है।

कैसा   यह   जंजाल   है,  मुक्त जो करता नहीं
किसको आखिर दोष दें, भाग्य का परिहास है।

काल    सर्पों   के   सताए,  ये   सितारे   रो   रहे    हैं
जब कभी मिलना ही नहीं, क्यों मिलन की आस है।

आ चलें, अब लौट चलें, इस सफ़र को छोड़ कर
मंजिलें  कैसे  मिलेंगी,  धुंध    आसपास     है।

जब तुम मुझे मिले Kavita 101

जब तुम मुझे मिले

तुमसे मिलने से पहले भी
खुश थी मैं, बहुत खुश
हंसी लहराती थी मेरे द्वार पर
ठहाके टकराते थे दीवारों से
घंटियाँ बजती थी मेरे आँगन में
रंग बिखरे पड़े थे कण-कण में।
लेकिन अनजान थी मैं कि
इससे भी बड़ी ख़ुशी होती है कोई
जो तुम्हारे मौन में झलक जाएगी
जो बिन आवाज़ मेरे मन के
तहखानों में बरस जाएगी
जब तुम आओगे मेरे जीवन में।

तुमसे मिलने से पहले भी
मैं रहती थी निश्चिन्त
आकाश लगता था निस्सीम
बारिश भिगोती थी मेरा अंतर्मन
क्षितिज तक खिंची चली जाती थी
मेरी बिंदास बेफिक्री।
लेकिन मुझे नहीं पता था कि
मुक्त होना किसे कहते हैं
तुमने मुझे हल्का कर दिया इतना कि
मैं उड़ने लगी आसमान में
तुम्हारे प्यार का वज़न इतना कि
मैं डूबने लगी सागर की गहराई में।

तुमसे मिलने से पहले भी
मैं जानती थी खुद को, पहचानती भी थी
पता था, कब हंस दूँगी और कब रो दूँगी
कब निकल पडूँगी हवाओं के साथ
कब उछल पडूँगी सितारों को तोड़ने के लिए
कब भागूंगी सपनों के पीछे-पीछे।
लेकिन मैं नहीं जानती थी कि
तुम एक सपना बन कर मेरे पीछे आ रहे हो
तुम ढूंढोगे मुझ में ऐसा कुछ
जो मुझे ही नहीं पता था
खोजोगे मेरे जीवन के और नए मायने
दोगे एक नई परिभाषा मुझे।

तुमसे मिलने से पहले भी
मैं जानती थी, प्रेम किसे कहते हैं
किताबों में पढ़ा था मैंने
सहेलियों के मुंह से सुना था मैंने
जब देखती थी चिड़ियों को उड़ते हुए
समझ लेती थी कि यह प्रेम है।
लेकिन तुमसे मिलने के बाद लगा
पहले मैं कितनी थी अनजान
तुमने खोले प्यार के नए अर्थ
तुमसे दीप्त हुआ वह सब
जो बिखरा पड़ा था मेरे इर्द-गिर्द
तुमने लिखा प्यार का नया इतिहास।

तुमसे मिलने के बाद छंट गई हर धुंध
रात में ही जैसे हो गया हो सवेरा
बिन मौसम के आ गया हो बसंत
सर्दी में भी गुनगुनेपन का अहसास
ठंडी हवाओं में सिहर-सिहर जाता है तन
लाख संभालो, बहक-बहक जाता है मन।
तुमसे मिलने के बाद हो गई मैं पूर्ण
तुम्हारा होना ही काफी है मेरे होने के लिए
मेरी आँखों में तुम्हारे सपनों की छाया है
मेरा मन तुम्हारी बातों में भरमाया है
अब लिखा जाएगा ऐसा कुछ जो
सदियों से नहीं लिखा किसी ने।

मैं 'मैं' नहीं Kavita 100

मैं 'मैं' नहीं


तुम्हारा होना मेरी ज़िन्दगी में
एक खूबसूरत करामात है प्रभु की
यूं लोग तो और भी थे
पर कोई दिल के इतना करीब न था।

तुम धीरे से आए
और उतरते चले गए
दिल में गहरे, और गहरे
जैसे वह तुम्हारा अपना ही घर हो।

कब हो गई मैं अपने से दूर
कब रहा नहीं कुछ भी मेरा मेरे बस में
कब तुम्हारा नाम लिखा गया मेरी रूह पर
कब तुमने कर लिया कब्ज़ा मेरे 'मैं' पर?

अब जो भी शब्द मुंह से निकलता है
तुम्हारा ही नाम होता है वह
अपनी ही तस्वीर देखती हूँ तो
तुम्हारी ही छवि उभर आती है।

तुम दूर बैठे भी कर रहे हो कैसा जादू
मैं कुछ करना चाहती हूँ
तो भी कर नहीं पाती हूँ
अकर्मण्य, निष्क्रिय की श्रेणी में आती हूँ।

Monday, 28 January 2013

एक प्रार्थना Kavita 99

एक प्रार्थना


भगवन !
यह तेरे लिए इतना असंभव भी नहीं
तू इसे संभव कर दे
मेरी उम्र की है यह आखिरी इच्छा
तू इसे पूरा कर दे
फिर चाहे तू मेरी
बची-खुची उम्र भी ले ले।

भगवन !
मुझे तुझ पर भरोसा है
क्योंकि तूने बनाए हैं मेरे सारे काम
तूने हमेशा दिया है मुझे
बिन मांगे सब कुछ
चमत्कृत करने की हद तक
संभाले न संभले जो।

भगवन !
तूने ऐसे सपने किए हैं पूरे
जो मैंने कभी देखे ही नहीं थे।
और यह सपना जो आज मैंने देखा है
तूने ही दिखाया है
सपना जो खुद चल कर मेरे पास आया है
तेरी ही रजामंदी से ना।

भगवन !
तेरे चाहे बिना पत्ता तक नहीं हिलता
कहते हैं लोग।
फिर तू कैसे नहीं बनाएगा यह संयोग?
अपने सिर क्यों लेगा तू कोई दुर्योग?
मैं अपने लिए नहीं मांग रही कुछ
तू जानता है, जानता है सब कुछ।

भगवन !
मुझे अब ऐसी कोई चाह नहीं
जीने की परवाह नहीं
उसके लिए मांग रही हूँ तुझसे
जिसे तूने बेरहमी से छोड़ा हुआ है
जिसकी तरफ से तूने मुंह मोड़ा हुआ है
जिसकी आवाज़ तुझ तक नहीं पहुँचती।

भगवन !
उसके अगर कोई गुनाह हैं
तो उन्हें मेरी झोली में डाल।
ऐसा तो गुनाह कोई नहीं होता
जिसकी सज़ा कभी ख़त्म न हो?
जिसकी कोई माफ़ी न हो?
अपनों से दूर होना ही सबसे बड़ी सज़ा है।

भगवन !
तूने हमेशा मुझ पर कृपा की
इसलिए जो मेरा है, वह तेरा भी तो है।
वह मेरा पुत्र है, वह मेरा मित्र है
वह मेरा प्रियतम है, वह मेरा सबकुछ है।
वह आना चाह रहा है तो उसे मेरे पास ला
यह चमत्कार पूरा तो कर।

भगवन !
अजनबी देश से उसे वापस लौटा
गैरों के बीच फंसा हुआ है वह
अपनों के पास आने को तड़प रहा है वह।
तू अपनी क्रोधाग्नि से मुझे भस्म कर, प्रभु
उसके पाप, यदि कोई हैं, मैं अपने सिर लेती हूँ, प्रभु
मेरे पुण्य, यदि कोई हैं, मैं उसे देती हूँ, प्रभु।

Sunday, 27 January 2013

शुक्र कर नादान Kavita 98

शुक्र कर नादान

शुक्र कर नादान कि तुझे मैं मिली
वरना कौन है ऐसा दिलदार
जो तेरी चुप्पियों के सहता प्रहार
जो तेरे वार पे पलट न करता वार
जो तेरी हर अदा को समझता प्यार।

शुक्र कर नादान कि तुझे मैं मिली
वरना कौन है ऐसा नरम-दिल
जो तेरी हर बात में ढूंढ ले औचित्य
तू अपनी मर्ज़ी से मिल या न मिल
जिसकी शरणस्थली रहा हो साहित्य।

शुक्र कर नादान कि तुझे मैं मिली
वरना कौन है ऐसा बिन्दास
जिसे उद्वेलित करती मिलन की आस
लेकिन अंतहीन इंतज़ार का संत्रास
जिसे भटकाता नहीं कहीं आसपास।

शुक्र कर नादान कि तुझे मैं मिली
वरना कौन है ऐसा संपन्न
जो तेरी चाह में रह न जाएगा सन्न
जो सिर्फ इस बात के सहारे जी लेगा
कि तुझमें कुछ भी नहीं है प्रच्छन्न।

शुक्र कर नादान कि तुझे मैं मिली
वरना कौन है ऐसा निर्द्वन्द
जो आँख बंद करके करता तुझसे प्यार
तू कहता दिन तो दिन और रात तो रात
जो विरह में भी लिखता प्यार को सौगात।

शुक्र कर नादान कि तुझे मैं मिली
वरना कौन है ऐसा जो बुझने न देता
पल-पल टूटती हुई उम्मीद का दीया
मन के अंधेरे कोनों में जल-बुझ होती है
तेरा पहली बार का मिलना संभालता है मुझे।



Saturday, 26 January 2013

हिन्दी और बिन्दी Kavita 97

हिन्दी और बिन्दी

हिन्दी और माथे की बिन्दी
दोनों की हो गई
चिन्दी चिन्दी।

फैशन के बदले मापदंड
फूहड़ता हो गई
नए युग की पसन्दी।

संस्कारों का बुझने लगा दीप
खुलने लगी सरेआम
अनाचारों की पुलिन्दी।

मर रहे हैं जीवन के मूल्य
कौन करेगा इन्हें
फिर से जिन्दी।

अपनी जड़ों को पहचाने हम
आओ फिर से खेलें
हिन्दी हिन्दी।

फैशन में शुमार करें
मस्तक की शान
हमारी बिन्दी।

Thursday, 24 January 2013

फेसबुक का नशा


फेसबुक का नशा

फेसबुक का नशा सारे नशों से बढ़ कर है। मुझे लगता है, हम सारे पागल हैं। सुबह आँख खुलते ही फेसबुक में लग जाते हैं। रात आँख बंद होने तक फेसबुक में लगे होते हैं। सारे काम चौपट करके रख दिए इस फेसबुक ने। और भी काम हैं ज़िन्दगी में फेसबुक के सिवा। पर नहीं, सब कुछ त्याग कर हम फेसबुक में लगे रहते हैं। अच्छा भी है, रचनाओं पर प्रतिक्रिया तुरंत मिल जाती है। क्या इससे प्रिंट मीडिया की अहमियत कम हो रही है? पता नहीं, पर फेसबुक की अहमियत ज़रूर बढ़ रही है। मैंने इस पर दो कवितायेँ लिखी और वाहवाही लूटी। पेश हैं ....

फेसबुक अकेलों के लिए मन का बहल है
सेवानिवृत्तों के लिए यह बेदखल है
कामकाजी महिलाओं का मंच प्रबल है
घरेलु महिलाओं के लिए भी शगल है
राजनीति के लिए नारों की नई फसल है
साहित्य की चर्चा भी कभी-कभी सफल है
बच्चा-बच्चा तक बड़ों के बीच में चपल है
बेकार मनचलों का भी इसमें दखल है
महफ़िलों की एक खूबसूरत नक़ल है
सच कहें तो रोज़ गई जाने वाली ग़ज़ल है।

दिलजले

यह कैसी बू आ रही है
कुछ दिलजले भी इस महफ़िल में हैं।

यह कैसा भ्रमित जाल
कुछ सिरफिरे भी इस महफ़िल में हैं।

यह कैसी लाग-लपेट
कुछ सिरचढ़े भी इस महफ़िल में हैं।

यह कैसा तन्त्रजाल
कुछ यूं फँसे भी इस महफ़िल में हैं।

यह कैसा आन्दोलन
कुछ लड़-भिड़े भी इस महफ़िल में हैं।

यह कैसी द्विअर्थी बात
कुछ रंगीले भी इस महफ़िल में हैं।

ये कैसे शब्द-पुष्प
कुछ सच भले भी इस महफ़िल में हैं।

सारे काम के नहीं लगते
कुछ निठल्ले भी इस महफ़िल में हैं। (ध्रुव गुप्त द्वारा जोड़ा गया)

महफ़िल जमाई है आपने
तो मुझ सरीखे भी इस महफ़िल में हैं। (प्रमोद शुक्ल द्वारा जोड़ा गया)

Wednesday, 23 January 2013

रसहीन Kavita 96

रसहीन

मैं कविता लिखती हूँ
इसीलिए व्यवहारिक नहीं हूँ।
तुम व्यवहारिक हो
इसीलिए भावुक नहीं हो।

मैं कविता लिखती हूँ
इसीलिए भावुक हूँ।
तुम गद्य लिखते हो
इसीलिए व्यवहारिक हो।

क्या तर्क हैं तुम्हारे?

जाओ, रस हीन,
अपना नीरस गद्य लिखो।
मुझे सरस कवितायेँ लिखने दो।

सच यह है Kavita 95

सच यह है

तुम्हारा मौन
मुझे और खींचता है
तुम्हारी तरफ।
तुम यूं चुप न रहो
कुछ तो कहो।
तुम्हारी वेदना
मुझ तक पहुँच रही है
तुम्हारी आँखों से छन कर।
तुम्हारे शब्द
संतुलित होते-होते
बिखर जाते हैं
और जो पीड़ा
तुम छुपाना चाहते हो
मुखर हो कर पसर जाती है
मेरे सम्मुख।
तुम कहते हो
तुम अपने दुःख से
मुझे दुखी नहीं करना चाहते
पर सच यह है कि
हम अपना दुःख बता कर
एक-दूसरे के दुःख में समा कर
होते हैं पूर्ण।
सम्पूर्ण।

साथ मिल कर रोने से Kavita 94

साथ मिल कर रोने से

तुमने अपने इतने करीब नहीं रखा मुझे
कि मैं सुन सकती
तुम्हारे छुपे हुए ज़ख्मों की आवाज़।
एक दीवार बीच में खड़ी करनी
तुम्हें ज़रूरी लगी
न जाने क्यों?
मुझ से क्या खतरा हो सकता था तुम्हें
सिवाय इसके
कि मैं तुम्हें
और ज्यादा प्यार करूं
तुम्हारे ज़ख्मों को सहलाऊँ
तुम्हें हँसता हुआ देखने के लिए
अपने प्यार के हीरे-मोती
तुम पर लुटाऊँ।
पर तुम?
खुद भी रोओगे अलग बैठ कर
और मुझे भी अलग रुलाओगे
तुम्हें नहीं पता
साथ मिल कर रोने से
ज़िन्दगी कितनी खूबसूरत लगती है।

एकांत Kavita 93

एकांत

एक था राजा, एक थी रानी
फिर भी नहीं बनी कोई कहानी।

कहानियाँ ज़रूरी हैं दिल बहलाने के लिए।
प्रेम से घृणा तक रिश्ता निभाने के लिए।

रिश्ते जो निभाए जाते हैं कैसे न कैसे
टूटने से पहले फूल खिलते हैं जैसे।

फूल तो फूल हैं, फूलों की बात क्या
दिल को मिली है प्यार की सौगात क्या।

प्यार को प्यार सब यूं ही नहीं कहते हैं
करने वाले हर वक्त नींद में रहते हैं।

फिर भी नींद आती नहीं जागते हैं रात भर
आंसुओं में डूब जाते हैं मिलन की याद कर।

अब तुम्हारा मिलना क्या और न मिलना भी क्या
फिर गुफाओं में हुआ जाने को तत्पर मन तो क्या।

वो मेरा वैराग्य मुझे ढूंढता सा आ गया
फिर वही एकांत मेरी चेतना पर छा गया।

छोटी कविता : 6

छोटी कविता : 6

सपने देखने की भी एक उम्र होती है।
उस उम्र के बीतने का अहसास
छोड़ गया है मुझे
खालीपन के अहसास के बीच।
मैं वापस लौट रही हूँ
अपनी खोह में।
तुम मुझे लौटाना नहीं।
मेरे पास आना नहीं।

Saturday, 19 January 2013

आवाज़ का स्पर्श Kavita 92

आवाज़ का स्पर्श

आवाज़ में होता है श्रवण गुण
पर यह कैसी आवाज़ थी तुम्हारी
जो छू गई मुझे भीतर बाहर से?
आवाज़ स्पर्श भी करती है
मैंने जाना आज।
तुमने क्या बोले शब्द?
मैंने सुने नहीं
नहीं ... नहीं ... सुने तो थे
पर उन शब्दों का अर्थ
मुझ तक पहुँचने से पहले
मेरा तन मन हो गया स्पर्शित
और मैं बावली सी
ढूँढने लगी तुम्हें अपने इर्द-गिर्द।
मेरे सामने शब्द नहीं
ध्वनियों के अम्बार थे
मुझ तक पहुँच रहा था
केवल एक ही अर्थ
तुम हो, तुम हो, तुम हो
यहीं कहीं मेरे आसपास।
कितने पास थे तुम
दिख नहीं रहे थे पर
अनुभूत सत्य की तरह
फैले थे हवाओं में।
तुम्हारी आवाज़ का जादू
महका गया
मेरे गंधहीन पल-छिन
धरोहर की तरह रखूंगी मैं इन्हें
हर दिन। गिन गिन।

Wednesday, 16 January 2013

भेजो कोरे कागज़ Kavita 91

भेजो कोरे कागज़

निराशावाद का घनघोर अँधेरा
फैल रहा है मेरे चारों ओर
कर रहा है समस्त चेतना को शून्य।
तुमने शब्द तो अच्छे ही दिए थे मुझे
न जाने क्यों, उनके अर्थ गड़बड़ा गए।
सच दिख रहा है झूठ जैसा
ईमानदारी बन गई है जालसाजी
विश्वास बदल रहा है शक में
कोई भी तुम्हारा शब्द नहीं है मेरे हक़ में।
तुम्हारा कहना ठीक है
दूर बैठे तुम मुझे
शब्दों से ही बहला सकते हो
मुझे बहलना है तो मैं बहलूं
नहीं तो क्या कर सकते हो तुम?
प्यार का यकीन दिलाने को
और कुछ नहीं है तुम्हारे पास
शब्दों के सिवा।
कहने को कह लो तुम मुझे बेवफा
पर अब और शब्द नहीं।
भेजो कोरे कागज़
शायद वही यकीन दिलाएं
तुम्हारे दिल के खालीपन का
और फिर से डूब जाऊं
मैं उस खाली दिल में।

तुम मुझे छोड़ दो Kavita 90

तुम मुझे छोड़ दो

सपनों का हिंडोला था
आँख बंद करके झूल रहे थे
आँख खुली तो देखा
हम ज़मीन पर थे।

टूटे हुए सपनों की
बिखरी हुई किरचें
पाँव में चुभ रही थी
उफ़ उफ़ उफ़।

हम एक-दूसरे के लिए
नहीं बने, मेरे मीत
चाहे हम कितने भी गा लें
प्यार के गीत।

मौत से पहले मौत आती नहीं
जीते जी चाहे कोई
मरता रहे बार-बार
एक ही किस्सा हज़ार बार।

तुम जैसी नहीं हूँ मैं
मुझ जैसे नहीं हो तुम
पाटना मुश्किल है
इस अमापी दूरी को।

मैं इस तरफ हूँ, तुम उस तरफ हो
बीच में समुद्र है
समुद्र के किनारे
कभी आपस में नहीं मिला करते।

कौन से मुहूर्त का इंतज़ार है
कौन से दिन होंगे हमारे?
अब कभी फूल नहीं खिलेंगे
मौसम भी हमारे खिलाफ है।

तुम मुझे छोड़ दो
बेरहम हो कर तोड़ दो
जी लूंगी मैं, जी लोगे तुम
कौन मरता है यहाँ किसी के बिना।

कागज़ की नाव Kavita 89

कागज़ की नाव

तुमने कहा था, बहती लहरों में कागज़ की नाव चलाएंगे
मैंने कहा था, ज्यादा देर तक नहीं चलेगी, गल जाएगी।

तुमने कहा था, आकाश में उड़ेंगे, चाँद-तारों को पकड़ेंगे
मैंने कहा था, सपनों की बातें हैं, सोते हुए सपनों में देखेंगे।

तुमने कहा था, सागर किनारे बैठ कर रेत के घर बनाएंगे
मैंने कहा था, लहर बहा ले जाएगी या खुद ही ढह जाएंगे।

तुमने कहा था, हाथ पकड़े, गुनगुनाते पहाड़ों पर चढ़ेंगे
मैंने कहा था, कैसे चढ़ पाऊंगी मैं, पहाड़ ऊंचे होते हैं।

तुमने कहा था, हर वक्त हंसती मुस्कुराती रहा करो
मैंने कहा था, कितना भी हंसूं, मैं ऐसी ही दिखूंगी।

तुमने कहा था, मैं जैसी भी हूँ, वैसी ही तुम्हें पसंद हूँ
मैंने सोचा था, तुम जैसे भी हो, वैसे ही मुझे पसंद हो।

तुमने कहा था, कभी हम एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे
मैंने सोचा था, कई जन्मों का बंधन है यह, कैसे छूटेगा।

जो कुछ कहा था, तुमने ही कहा था, मैंने नहीं कहा था
मैंने 'हाँ' ज़रूर किया था, तुम्हारी हर बात को डरते-डरते।

जैसे एक सम्मोहन में डूबी थी मैं, डगमगा रहा था हर कदम
सम्मोहन छल गया, मेरे मन का सूरज शाम से पहले ढल गया।

मेरा अपना राग वीतराग कर रहा है मुझे, जन्मों के साथी,
तुम अब आना मत, मैं तुम्हे सच भूलने की कोशिश में हूँ।

Monday, 14 January 2013

प्यार की धुन Kavita 88

प्यार की धुन

वह तुम्हारी बतरसी चंचल
वह तुम्हारे तैरते से शब्द
मैं कहाँ पकडूं किसे कह सुन।

सुन शर्मीली पास आ कर सुन
अब नहीं कहना कभी ऐसे
मैं कहाँ पकडूं किसे कह सुन।


परत दर परत खुल रहे थे तुम
और कानों में मेरे गूंजी
प्रेम की अद्भुद मधुर सी धुन।

सुन नशीली पास आ कर सुन
बज रही मेरे ह्रदय में भी
प्रेम की अद्भुद मधुर सी धुन।

तुम मुखर थे और मैं खामोश
मन को यह किसने दिया आदेश
आँखें बंद करके सपन बुन।

सुन छबीली पास आ कर सुन
मैंने भी सच में सुना यह
आँखें बंद कर के सपन बुन।


ढेर बातों के लगा कर तुम
कह रहे हों जैसे मुझसे यूं
मैंने तुझे चुना, तू मुझे चुन।

सुन सपनीली पास आ कर सुन
कह रही है प्यार की यह धुन
मैंने तुझे चुना, तू मुझे चुन।

Wednesday, 2 January 2013

छोटी कविता : 5

छोटी कविता : 5
तुम्हारे नाम का अर्थ है लाल
कैसा है कमाल.
लहु का रंग भी लाल है
प्यार का रंग भी लाल.
लाली मेरे लाल की
जित देखूं तित लाल.
लाली देखन मैं गई 
मैं भी हो गई लाल.

प्यार का पैगाम Kavita 87

प्यार का पैगाम
          जब तुम आए थे
         जैसे चारों तरफ फूल मुस्कुराए थे.
         पर मिलन की बेला में
         ये आंसू क्यों मेरी आँख में भर आए थे?
तुमने कहा
तुम वहाँ रहोगे
और मैं यहाँ
भागते जीवन की यही शर्त है.
ज़िन्दगी की भागदौड़ में
पिछड़ गया है प्रेम.
भौतिक तथ्यों की भीड़ में
प्रतीक्षारत है प्रेम.
         जो स्वतः मिला
         उसे लिया
         भगवान् के प्रासाद की तरह
         स्वीकार किया।
बिना समझौते का प्यार
मेरे तुम्हारे बीच.
शिकायतों का न होना
मेरे तुम्हारे बीच.
         उम्र के इस पड़ाव पर
         आओ जल्दी-जल्दी जी लें.
         समय की पाबंदी में
         प्यार का अमृत पी लें.

         अब तुम्हारे अनगिनत पत्र
         पत्रों में अनगिनत शब्द
         शब्दों में एक ही शब्द
         प्रेम.... प्रेम.... प्रेम.....
  
         तुमने कहा था
         मैं एक खूबसूरत ख्वाब हूँ
         जिसे तुम जी लेना चाहते हो.
         जागने के बाद भी
         अब तुम नींद में रहोगे.

         चलो, यहाँ से कहीं दूर चलें.
         सपना जो दिखाया है तुमने
         उसे पूरा तो करें !