Wednesday, 16 January 2013

कागज़ की नाव Kavita 89

कागज़ की नाव

तुमने कहा था, बहती लहरों में कागज़ की नाव चलाएंगे
मैंने कहा था, ज्यादा देर तक नहीं चलेगी, गल जाएगी।

तुमने कहा था, आकाश में उड़ेंगे, चाँद-तारों को पकड़ेंगे
मैंने कहा था, सपनों की बातें हैं, सोते हुए सपनों में देखेंगे।

तुमने कहा था, सागर किनारे बैठ कर रेत के घर बनाएंगे
मैंने कहा था, लहर बहा ले जाएगी या खुद ही ढह जाएंगे।

तुमने कहा था, हाथ पकड़े, गुनगुनाते पहाड़ों पर चढ़ेंगे
मैंने कहा था, कैसे चढ़ पाऊंगी मैं, पहाड़ ऊंचे होते हैं।

तुमने कहा था, हर वक्त हंसती मुस्कुराती रहा करो
मैंने कहा था, कितना भी हंसूं, मैं ऐसी ही दिखूंगी।

तुमने कहा था, मैं जैसी भी हूँ, वैसी ही तुम्हें पसंद हूँ
मैंने सोचा था, तुम जैसे भी हो, वैसे ही मुझे पसंद हो।

तुमने कहा था, कभी हम एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे
मैंने सोचा था, कई जन्मों का बंधन है यह, कैसे छूटेगा।

जो कुछ कहा था, तुमने ही कहा था, मैंने नहीं कहा था
मैंने 'हाँ' ज़रूर किया था, तुम्हारी हर बात को डरते-डरते।

जैसे एक सम्मोहन में डूबी थी मैं, डगमगा रहा था हर कदम
सम्मोहन छल गया, मेरे मन का सूरज शाम से पहले ढल गया।

मेरा अपना राग वीतराग कर रहा है मुझे, जन्मों के साथी,
तुम अब आना मत, मैं तुम्हे सच भूलने की कोशिश में हूँ।

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