Saturday, 19 January 2013

आवाज़ का स्पर्श Kavita 92

आवाज़ का स्पर्श

आवाज़ में होता है श्रवण गुण
पर यह कैसी आवाज़ थी तुम्हारी
जो छू गई मुझे भीतर बाहर से?
आवाज़ स्पर्श भी करती है
मैंने जाना आज।
तुमने क्या बोले शब्द?
मैंने सुने नहीं
नहीं ... नहीं ... सुने तो थे
पर उन शब्दों का अर्थ
मुझ तक पहुँचने से पहले
मेरा तन मन हो गया स्पर्शित
और मैं बावली सी
ढूँढने लगी तुम्हें अपने इर्द-गिर्द।
मेरे सामने शब्द नहीं
ध्वनियों के अम्बार थे
मुझ तक पहुँच रहा था
केवल एक ही अर्थ
तुम हो, तुम हो, तुम हो
यहीं कहीं मेरे आसपास।
कितने पास थे तुम
दिख नहीं रहे थे पर
अनुभूत सत्य की तरह
फैले थे हवाओं में।
तुम्हारी आवाज़ का जादू
महका गया
मेरे गंधहीन पल-छिन
धरोहर की तरह रखूंगी मैं इन्हें
हर दिन। गिन गिन।

2 comments: