Thursday, 24 January 2013

फेसबुक का नशा


फेसबुक का नशा

फेसबुक का नशा सारे नशों से बढ़ कर है। मुझे लगता है, हम सारे पागल हैं। सुबह आँख खुलते ही फेसबुक में लग जाते हैं। रात आँख बंद होने तक फेसबुक में लगे होते हैं। सारे काम चौपट करके रख दिए इस फेसबुक ने। और भी काम हैं ज़िन्दगी में फेसबुक के सिवा। पर नहीं, सब कुछ त्याग कर हम फेसबुक में लगे रहते हैं। अच्छा भी है, रचनाओं पर प्रतिक्रिया तुरंत मिल जाती है। क्या इससे प्रिंट मीडिया की अहमियत कम हो रही है? पता नहीं, पर फेसबुक की अहमियत ज़रूर बढ़ रही है। मैंने इस पर दो कवितायेँ लिखी और वाहवाही लूटी। पेश हैं ....

फेसबुक अकेलों के लिए मन का बहल है
सेवानिवृत्तों के लिए यह बेदखल है
कामकाजी महिलाओं का मंच प्रबल है
घरेलु महिलाओं के लिए भी शगल है
राजनीति के लिए नारों की नई फसल है
साहित्य की चर्चा भी कभी-कभी सफल है
बच्चा-बच्चा तक बड़ों के बीच में चपल है
बेकार मनचलों का भी इसमें दखल है
महफ़िलों की एक खूबसूरत नक़ल है
सच कहें तो रोज़ गई जाने वाली ग़ज़ल है।

दिलजले

यह कैसी बू आ रही है
कुछ दिलजले भी इस महफ़िल में हैं।

यह कैसा भ्रमित जाल
कुछ सिरफिरे भी इस महफ़िल में हैं।

यह कैसी लाग-लपेट
कुछ सिरचढ़े भी इस महफ़िल में हैं।

यह कैसा तन्त्रजाल
कुछ यूं फँसे भी इस महफ़िल में हैं।

यह कैसा आन्दोलन
कुछ लड़-भिड़े भी इस महफ़िल में हैं।

यह कैसी द्विअर्थी बात
कुछ रंगीले भी इस महफ़िल में हैं।

ये कैसे शब्द-पुष्प
कुछ सच भले भी इस महफ़िल में हैं।

सारे काम के नहीं लगते
कुछ निठल्ले भी इस महफ़िल में हैं। (ध्रुव गुप्त द्वारा जोड़ा गया)

महफ़िल जमाई है आपने
तो मुझ सरीखे भी इस महफ़िल में हैं। (प्रमोद शुक्ल द्वारा जोड़ा गया)

2 comments:

  1. कोकिन सी मादकता के मारे
    फिसबुकियों की जमात भी इस महफिल में हैं। - चुन्नी

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  2. कोकिन सी मादकता के मारे
    फिसबुकियों की जमात भी इस महफिल में हैं। - चुन्नी

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