Sunday, 27 January 2013

शुक्र कर नादान Kavita 98

शुक्र कर नादान

शुक्र कर नादान कि तुझे मैं मिली
वरना कौन है ऐसा दिलदार
जो तेरी चुप्पियों के सहता प्रहार
जो तेरे वार पे पलट न करता वार
जो तेरी हर अदा को समझता प्यार।

शुक्र कर नादान कि तुझे मैं मिली
वरना कौन है ऐसा नरम-दिल
जो तेरी हर बात में ढूंढ ले औचित्य
तू अपनी मर्ज़ी से मिल या न मिल
जिसकी शरणस्थली रहा हो साहित्य।

शुक्र कर नादान कि तुझे मैं मिली
वरना कौन है ऐसा बिन्दास
जिसे उद्वेलित करती मिलन की आस
लेकिन अंतहीन इंतज़ार का संत्रास
जिसे भटकाता नहीं कहीं आसपास।

शुक्र कर नादान कि तुझे मैं मिली
वरना कौन है ऐसा संपन्न
जो तेरी चाह में रह न जाएगा सन्न
जो सिर्फ इस बात के सहारे जी लेगा
कि तुझमें कुछ भी नहीं है प्रच्छन्न।

शुक्र कर नादान कि तुझे मैं मिली
वरना कौन है ऐसा निर्द्वन्द
जो आँख बंद करके करता तुझसे प्यार
तू कहता दिन तो दिन और रात तो रात
जो विरह में भी लिखता प्यार को सौगात।

शुक्र कर नादान कि तुझे मैं मिली
वरना कौन है ऐसा जो बुझने न देता
पल-पल टूटती हुई उम्मीद का दीया
मन के अंधेरे कोनों में जल-बुझ होती है
तेरा पहली बार का मिलना संभालता है मुझे।



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