Wednesday, 16 January 2013

भेजो कोरे कागज़ Kavita 91

भेजो कोरे कागज़

निराशावाद का घनघोर अँधेरा
फैल रहा है मेरे चारों ओर
कर रहा है समस्त चेतना को शून्य।
तुमने शब्द तो अच्छे ही दिए थे मुझे
न जाने क्यों, उनके अर्थ गड़बड़ा गए।
सच दिख रहा है झूठ जैसा
ईमानदारी बन गई है जालसाजी
विश्वास बदल रहा है शक में
कोई भी तुम्हारा शब्द नहीं है मेरे हक़ में।
तुम्हारा कहना ठीक है
दूर बैठे तुम मुझे
शब्दों से ही बहला सकते हो
मुझे बहलना है तो मैं बहलूं
नहीं तो क्या कर सकते हो तुम?
प्यार का यकीन दिलाने को
और कुछ नहीं है तुम्हारे पास
शब्दों के सिवा।
कहने को कह लो तुम मुझे बेवफा
पर अब और शब्द नहीं।
भेजो कोरे कागज़
शायद वही यकीन दिलाएं
तुम्हारे दिल के खालीपन का
और फिर से डूब जाऊं
मैं उस खाली दिल में।

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