Wednesday, 16 January 2013

तुम मुझे छोड़ दो Kavita 90

तुम मुझे छोड़ दो

सपनों का हिंडोला था
आँख बंद करके झूल रहे थे
आँख खुली तो देखा
हम ज़मीन पर थे।

टूटे हुए सपनों की
बिखरी हुई किरचें
पाँव में चुभ रही थी
उफ़ उफ़ उफ़।

हम एक-दूसरे के लिए
नहीं बने, मेरे मीत
चाहे हम कितने भी गा लें
प्यार के गीत।

मौत से पहले मौत आती नहीं
जीते जी चाहे कोई
मरता रहे बार-बार
एक ही किस्सा हज़ार बार।

तुम जैसी नहीं हूँ मैं
मुझ जैसे नहीं हो तुम
पाटना मुश्किल है
इस अमापी दूरी को।

मैं इस तरफ हूँ, तुम उस तरफ हो
बीच में समुद्र है
समुद्र के किनारे
कभी आपस में नहीं मिला करते।

कौन से मुहूर्त का इंतज़ार है
कौन से दिन होंगे हमारे?
अब कभी फूल नहीं खिलेंगे
मौसम भी हमारे खिलाफ है।

तुम मुझे छोड़ दो
बेरहम हो कर तोड़ दो
जी लूंगी मैं, जी लोगे तुम
कौन मरता है यहाँ किसी के बिना।

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