Wednesday, 23 January 2013

साथ मिल कर रोने से Kavita 94

साथ मिल कर रोने से

तुमने अपने इतने करीब नहीं रखा मुझे
कि मैं सुन सकती
तुम्हारे छुपे हुए ज़ख्मों की आवाज़।
एक दीवार बीच में खड़ी करनी
तुम्हें ज़रूरी लगी
न जाने क्यों?
मुझ से क्या खतरा हो सकता था तुम्हें
सिवाय इसके
कि मैं तुम्हें
और ज्यादा प्यार करूं
तुम्हारे ज़ख्मों को सहलाऊँ
तुम्हें हँसता हुआ देखने के लिए
अपने प्यार के हीरे-मोती
तुम पर लुटाऊँ।
पर तुम?
खुद भी रोओगे अलग बैठ कर
और मुझे भी अलग रुलाओगे
तुम्हें नहीं पता
साथ मिल कर रोने से
ज़िन्दगी कितनी खूबसूरत लगती है।

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