Tuesday, 26 February 2013

अपराध

अपराध

दिल में जो गहरे तक उतर गया
उसे लौटाया नहीं जा सकता
मारा जा सकता है।
हत्या का यह अपराध
करना ही पड़ेगा
वरना दिल में उतरा हुआ वह
न वापस जाएगा
न मुझे जिन्दा रहने देगा।

Sunday, 24 February 2013

ग़ज़ल 11

ग़ज़ल 11

हमेशा बहस में उलझे रहे क्या पाने को ?
क्यों कहा क्यों सुना फ़िज़ूल इस फ़साने को। 

तुमने चुन-चुन के दिए हैं इस दिल को ज़ख़म
क्या कुछ नहीं किया मेंरा दिल जलाने को।

क्या अब याद करूँ तेरी नादानी को मैं
चलो छोड़ें यहीं इस दुःख भरे तराने को।

हमें आया नहीं झूठी सी तसल्ली देना
तुम तो तैयार थे बिगड़ी हुई बनाने को।

तुम्हें आदत है कुछ भी खुल के बोल देने की
अब कुछ कहना नहीं जो हो हमें रुलाने को।

झगड़-झगड़ के भी जो एक हो जाते है हम
जैसे यह सिलसिला हो प्यार आजमाने को।

चलो अब हाथ दोस्ती का मिलाएं हंस कर
और वादा करें सारी उमर निभाने को।

Friday, 22 February 2013

ग़ज़ल 10

ग़ज़ल 10

कि तुम्हें आदत है हर शिकवे को झगड़ा नाम दो
दिल को समझा कर रखा है न कोई शिकवा करे।

मैंने अपने हाथ की लकीर में ढूँढा तुम्हें
यह तुम्हारा नाम लिखा है कोई अब क्या करे

कैसे हम बच कर रहेंगे इस अनोखी आग से
राख कर देगी किसी दिन घर की चौखट पर खड़े।

प्रेम की एकतरफा धुन में बज रहा एक राग है
कह लो जो कहना है तुम्हें यह विवशता क्या करे।

बोल कर जाते हो मंदिर जा रहे हो शाम को
पर ये कैसे फूल हैं जो बीच राहों में पड़े।

चन्दनी सुगंध महके देर तक और दूर तक
पेड़-पौधे, जीव-जंतु, चर-अचर भ्रम में पड़े।

तुमने वादा तो किया था अब न जाओगे वहाँ
ढूँढने जाऊं तो मिलते हो उसी दर पर खड़े।

कौन सी मजबूरियाँ हैं जो कि तुम रुकते नहीं
मौसमों की मार हो, अंधड़ हों छोटे या बड़े।

कौन जाने कि तुम्हारे मन में क्या है चल रहा
क्या छुपा कर रख सकोगे सम्बन्धों के आँकड़े।

क्या कहूँगी मैं तुम्हें और क्या कहोगे तुम मुझे
कौन सी बातें करेंगे मिल के हम तुम सिरफिरे।

रोज़ सपनो में लगाती हूँ शिकायतों के ढेर
दिन में ही दिखने लगे हैं अब सपन ये बावरे।

रात भी ढलती नहीं और नींद भी आती नहीं
चैन मन का ले उड़े तुम बिन बताए साँवरे।

Tuesday, 19 February 2013

ग़ज़ल 9

ग़ज़ल 9

मर्सिये के रुदन में हो या सुरों की ताल में
मैं तुम्हारे साथ हूँ संगीत की हर चाल में।

मैंने मांगी है दुआओं में तुम्हारी मुक्तता
मैं तुम्हारे साथ हूँ अट्टहास में, वाचाल में।

तुम कहीं भी और कुछ भी करने को स्वतंत्र हो
मैं तुम्हारे साथ हूँ इस भाग्य के जंजाल में।

गर्दिशों की धुंध को छाना नहीं है दूर तक
मैं तुम्हारे साथ हूँ अब इस अनोखे काल में।

रात के निर्मम अँधेरे तोड़ नहीं पाएंगे
मैं तुम्हारे साथ हूँ अंधियार में उजियाल में।

दोस्ती की कोई शर्त अब हमारे बीच नहीं
मैं तुम्हारे साथ हूँ हर हाल में, बेहाल में।

मैं तुम्हारे साथ रहूँ या ना रहूँ उम्र भर
मैं तुम्हारे साथ हूँ ज्योतिष की देखभाल में।

आस्था के बीज अंकुराने लगे हैं लहक-लहक
मैं तुम्हारे साथ हूँ मंदिर की हर करताल में।

देख लो आई है सुबह महकती सी द्वार पर
मैं तुम्हारे साथ हूँ स्वागत के इस ख़याल में।

खुश रहो तुम और दिल पर बोझ कोई लो नहीं
मैं तुम्हारे साथ हूँ हर बोझ के सँभाल में।

हाट में बिकती नहीं है दोस्ती की यह मिसाल
पूर्व जन्मों का लिखा कुछ दिख रहा है भाल में।

Monday, 18 February 2013

ग़ज़ल 8

ग़ज़ल 8

तुम क्यों इतना अब रह-रह के शरमाने लगे हो?
दिल की बातों को संकेतों में बतलाने लगे हो।

ज्यों ज्यों दिन पास आ रहे हैं मिलने के हमारे
नए सिरे से इस रिश्ते को समझाने लगे हो।

कहाँ तो बोलते हुए कभी तुम थकते नहीं थे
कहाँ अब मौन हो कर मुझको तरसाने लगे हो।

हमारे बीच में ऐसी तो कोई रीत ना थी
मेरे अब रूठ जाने पर तुम मनाने लगे हो।

तुम्हारी दोस्ती और प्रेम की गाथा अलग है
मुझे तुम दोनों के अर्थों में भरमाने लगे हो।

कितना बदलाव तुममें आ गया है इन दिनों में
हर तूफ़ान, हर आंधी को अपनाने लगे हो।

Monday, 11 February 2013

प्रेम दंश Kavita 103

प्रेम दंश

क्यों किसी के भीतरी अंतस में घुसना बिन बुलाए
कि दिखाई देने लगें उसके दहकते से ज़ख़म।
क्यों किसी की बंद पड़ी किताब को पढने की जिद
क्यों किसी का दिल दुखा कर तोड़ना कोई भरम।

एक अनोखे तार में बंध कर खिंचा जाता है मन
छोड़ दो इस को खुला तो अनगिनत बहने लगेगा.
दूर रहने पर तुम्हारे पास आने को तरसता
पास आए तो ना जाने कौन सा नाटक रचेगा।

मैं नहीं और तुम नहीं, यह ज़िन्दगी कुछ भी नहीं
सोच-सोच कर यह मन, वैरागी हुआ बार-बार।
डर है कि ताले लगा कर बंद न कर दूं कहीं मैं
सारे अहसासों के कक्ष, सारे भावना के द्वार।

एक खामोशी सी छाती जा रही है चेतना पर
ज्यों कि सारे सुर सिमट कर हो गए हों चुप कहीं।
मैं हवाओं से कहूँगी वो उड़ा ले जाए सब कुछ
मैं तुम्हारी हूँ नहीं और तुम भी मेरे हो नहीं।

यह हमारे बीच जो है, वह नहीं है प्यार सा कुछ
तुम हो बातों के सहारे, मैं हूँ खामोशी में गुम।
ज़िन्दगी आसान नहीं, बीच में मुश्किल खड़ी है
प्रेम का यह दंश कैसे झेल पाएंगे कभी हम।

Tuesday, 5 February 2013

कभी तो कर भरोसा Kavita 102

कभी तो कर भरोसा 

तुझे कोई बददुआ भी दें अब तो कैसे दें
क्या कुछ तो जीवन में झेल कर बैठा है तू।
तुझे कोई दुआ देने का अब मन ही नहीं
नासमझी में रिश्तों से खेल कर बैठा है तू।

तेरी नादानियों की कोई सीमा ही नहीं
दरिन्दे दुश्मनों से मेल कर बैठा है तू।
तुझे आता नहीं जीना तो कोई क्या कीजे
छुकछुकी बच्चों की रेल पर बैठा है तू।

हमेशा ही तेरी जिद पर बनाए और तोड़े
कभी सपनों में जीने भी नहीं देता है तू।
फरेबी आँख तेरी देख ही लेती है जिसे
मेरी उम्मीद का दीपक बुझा देता है तू।

तेरा ईमान धरम कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं
तेरा जब चाहे मन विपरीत भी चलता है तू।
तेरे ईमान के सदके, बेइमान के सदके
मेरे दिल को दुखा के बहुत ही फलता है तू।

कभी तो सुन बिना शब्दों के जो है बज रहा
कभी तो झाँक इन आँखों के तहखानों में तू।
कभी तो कर भरोसा मेरी इस दीवानगी पर
कभी तो रख मुझे अपनी ग़ज़ल के मायनों में तू।

Friday, 1 February 2013

डिस्कसिंग पोएट्री

डिस्कसिंग पोएट्री (प्रकाशित : स्कैनर)

मुझे प्रायः रेल द्वारा यात्राएं करनी पड़ती थीं। कई बार यात्रा के दौरान कुछ ऐसी बातें घटित हो जाती हैं, जो हमेशा याद रहती हैं। बहुत वर्ष पूर्व घटित एक किस्सा दिलचस्प है। मैं ट्रेन से त्रिवेंद्रम से दिल्ली लौट रही थी। प्रथम श्रेणी के डिब्बे में चार बर्थ पर चार लोग थे। एक विदेशी गेरुएवस्त्रधारी युवा पुरुष उस कम्पार्टमेंट में आ गया। उसके पास रिज़र्वेशन नहीं था। तीन दिन का सफ़र था, इसलिए वह बहुत परेशान था। उसने कहा कि वह रात को नीचे फर्श पर ही सो जाएगा। हम चारों यात्रियों ने उसकी उपस्थिति को स्वीकार कर लिया। काफी समय वह हेडफोन लगाए धार्मिक प्रवचन सुनता रहा। बीच-बीच में बातचीत भी चलती रही। वह विदेशों से भारत में आए उन अनेक युवा साधुओं में से था जो एक विशिष्ट संस्था से सम्बंधित हैं और कृष्ण के भक्त हैं।

उसने मेरा परिचय जानना चाहा। मैंने कहा, 'आयम ऑल्सो साधु लाइक यू।' उसने मेरी ओर हैरानी से देखा तो मैंने जोड़ा, 'दो आय डोंट वेअर दिस पर्टिकुलर कलर।' मैंने उससे पूछा, 'साधु बनने के लिए इन गेरुए वस्त्रों की क्या ज़रुरत है? मन में वैराग्य हो, बस इतना काफी है।'

उसने कहा, 'ख़ास वेशभूषा धारण करने से हम अलग क्लास नज़र आते हैं, इसलिए आम लोगों से दूर रहते हैं और बुराइयों से बचे रहते हैं। बुराई की जड़ भीड़ में शामिल होना है। अकेला आदमी बुराई में उतना नहीं फंसता।'

'यानि आपका अपने मन पर नियंत्रण नहीं है? फिर आप जैसे कितने अकेले हैं जो मिल कर एक भीड़ बना रहे हैं। तो बुराई तो इस भीड़ से भी उपजेगी?' कहने के साथ मैंने उसे गर्व से बताया, 'मुझे देखो, संसार में रह कर भी मैंने संसार को त्यागा हुआ है। असली सन्यास तो यह है कि आपके पास दुनियादार बने रहने की सारी वजहें मौजूद हों, फिर भी आप मन से सन्यासी हों।'

'डोंट टेल मी दैट। यू आर सो यंग।' मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा कि उसने यह कैसे कहा। एक साधु को मेरा यंग होना क्यों नज़र आया? उसने अपने को सम्भाला और बोला, 'प्लीज़ डोंट माइंड।'

'व्हाय शुड आय माइंड? दिस इज अ कॉम्प्लीमेंट।' मेरे जवाब देने पर उसने कहा, जैसे उससे बोले बिना रहा न गया हो, 'या, दिस इज अ कॉम्प्लीमेंट।'

फिर बातचीत चली अपने-अपने काम धंधे की। हाँ, साधु होने के साथ-साथ वह अपने संस्थान में अध्यापन कार्य करता था। बातचीत में न जाने कैसे एक शब्द 'पोएट्री' आ गया तो मैंने उसे बताया कि मैं कविता और कहानी लिखती हूँ। उसने तपाक से मेरी ओर हाथ बढाया, मिलाने के लिए, फिर शायद अपने मन की सलाह पर पीछे खींच लिया और अतीत की यादों में खोता हुआ बताने लगा कि कभी वह भी पोएट्री लिखा करता था और उसका एक संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है। और भी अनेक बातें, अपने परिवार, अपने प्रेम और प्रेमिकाओं के किस्से।

'कविता लिखनी क्यों छोड़ दी? आप आश्रम में रह कर भी तो कविता लिख सकते हैं,' मैंने कहा।

'नहीं, कविता मोह पैदा करती है, भावनाओं में बहाती है, जो एक सन्यासी के लिए उचित नहीं है।'

'मुक्ति का अहसास नहीं कराती? तनावों से मुक्ति?'

'नहीं, उलझाती है, लिप्त करती है।'

'सार्थकता का बोध नहीं कराती? अपने होने की सार्थकता?'

'नहीं, भ्रम पैदा करती है, अपने होने का भ्रम।' फिर आगे बोला, 'भारत में इतने सालों से रहते हुए भी कभी किसी इंडियन परिवार से मेरी दोस्ती नहीं हुई।'

मैं मन ही मन उसके सन्यासीपन को तोलने की कोशिश कर रही थी कि वह आगे बोला, 'आपसे फ़िज़ूल इतनी बातें कीं। बट वी वर डिस्कसिंग पोएट्री, इज़ंट इट?'

'पोएट्री डिस्कस न भी कर रहे हों तो भी इतना सजग होने की क्या बात है?'

'देखिए, इसीलिए कहा है, ज्यादा लोगों से मिलने-जुलने से, ज्यादा बात करने से मन चंचल होता है। आफ्टर ऑल, वी साधूज आर ऑल्सो ह्यूमैन बींग।'

उस समय मैंने सोचा था, जिस व्यक्ति को जितना ज्यादा आप जानेंगे, उतनी ज्यादा उसकी कमजोरियां सामने आएंगी। जितना गहरा किसी के दिल में झांकेंगे, वहाँ उतनी ही गन्दगी मिलेगी। इसलिए जिस पर जो आवरण पड़ा है, वह पड़े रहने देना चाहिए, चाहे वह आवरण गेरुए रंग का ही क्यों न हो।

उसके दोनों नाम (साधु होने के बाद का, जो उसका कहना था, अब यही प्रचलित है और साधु होने से पूर्व का जिसे, उसका कहना था, अब वह भूल चुका है और सिर्फ मुझे बताने के लिए अपने अतीत में लौटा था), आज मुझे याद नहीं हैं पर सोच रही हूँ, अपनी रेल यात्रा के इस साथी पर मैंने आज तक कोई कहानी क्यों नहीं लिखी?