Monday, 18 February 2013

ग़ज़ल 8

ग़ज़ल 8

तुम क्यों इतना अब रह-रह के शरमाने लगे हो?
दिल की बातों को संकेतों में बतलाने लगे हो।

ज्यों ज्यों दिन पास आ रहे हैं मिलने के हमारे
नए सिरे से इस रिश्ते को समझाने लगे हो।

कहाँ तो बोलते हुए कभी तुम थकते नहीं थे
कहाँ अब मौन हो कर मुझको तरसाने लगे हो।

हमारे बीच में ऐसी तो कोई रीत ना थी
मेरे अब रूठ जाने पर तुम मनाने लगे हो।

तुम्हारी दोस्ती और प्रेम की गाथा अलग है
मुझे तुम दोनों के अर्थों में भरमाने लगे हो।

कितना बदलाव तुममें आ गया है इन दिनों में
हर तूफ़ान, हर आंधी को अपनाने लगे हो।

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