Tuesday, 19 February 2013

ग़ज़ल 9

ग़ज़ल 9

मर्सिये के रुदन में हो या सुरों की ताल में
मैं तुम्हारे साथ हूँ संगीत की हर चाल में।

मैंने मांगी है दुआओं में तुम्हारी मुक्तता
मैं तुम्हारे साथ हूँ अट्टहास में, वाचाल में।

तुम कहीं भी और कुछ भी करने को स्वतंत्र हो
मैं तुम्हारे साथ हूँ इस भाग्य के जंजाल में।

गर्दिशों की धुंध को छाना नहीं है दूर तक
मैं तुम्हारे साथ हूँ अब इस अनोखे काल में।

रात के निर्मम अँधेरे तोड़ नहीं पाएंगे
मैं तुम्हारे साथ हूँ अंधियार में उजियाल में।

दोस्ती की कोई शर्त अब हमारे बीच नहीं
मैं तुम्हारे साथ हूँ हर हाल में, बेहाल में।

मैं तुम्हारे साथ रहूँ या ना रहूँ उम्र भर
मैं तुम्हारे साथ हूँ ज्योतिष की देखभाल में।

आस्था के बीज अंकुराने लगे हैं लहक-लहक
मैं तुम्हारे साथ हूँ मंदिर की हर करताल में।

देख लो आई है सुबह महकती सी द्वार पर
मैं तुम्हारे साथ हूँ स्वागत के इस ख़याल में।

खुश रहो तुम और दिल पर बोझ कोई लो नहीं
मैं तुम्हारे साथ हूँ हर बोझ के सँभाल में।

हाट में बिकती नहीं है दोस्ती की यह मिसाल
पूर्व जन्मों का लिखा कुछ दिख रहा है भाल में।

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