Friday, 22 February 2013

ग़ज़ल 10

ग़ज़ल 10

कि तुम्हें आदत है हर शिकवे को झगड़ा नाम दो
दिल को समझा कर रखा है न कोई शिकवा करे।

मैंने अपने हाथ की लकीर में ढूँढा तुम्हें
यह तुम्हारा नाम लिखा है कोई अब क्या करे

कैसे हम बच कर रहेंगे इस अनोखी आग से
राख कर देगी किसी दिन घर की चौखट पर खड़े।

प्रेम की एकतरफा धुन में बज रहा एक राग है
कह लो जो कहना है तुम्हें यह विवशता क्या करे।

बोल कर जाते हो मंदिर जा रहे हो शाम को
पर ये कैसे फूल हैं जो बीच राहों में पड़े।

चन्दनी सुगंध महके देर तक और दूर तक
पेड़-पौधे, जीव-जंतु, चर-अचर भ्रम में पड़े।

तुमने वादा तो किया था अब न जाओगे वहाँ
ढूँढने जाऊं तो मिलते हो उसी दर पर खड़े।

कौन सी मजबूरियाँ हैं जो कि तुम रुकते नहीं
मौसमों की मार हो, अंधड़ हों छोटे या बड़े।

कौन जाने कि तुम्हारे मन में क्या है चल रहा
क्या छुपा कर रख सकोगे सम्बन्धों के आँकड़े।

क्या कहूँगी मैं तुम्हें और क्या कहोगे तुम मुझे
कौन सी बातें करेंगे मिल के हम तुम सिरफिरे।

रोज़ सपनो में लगाती हूँ शिकायतों के ढेर
दिन में ही दिखने लगे हैं अब सपन ये बावरे।

रात भी ढलती नहीं और नींद भी आती नहीं
चैन मन का ले उड़े तुम बिन बताए साँवरे।

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