Sunday, 24 February 2013

ग़ज़ल 11

ग़ज़ल 11

हमेशा बहस में उलझे रहे क्या पाने को ?
क्यों कहा क्यों सुना फ़िज़ूल इस फ़साने को। 

तुमने चुन-चुन के दिए हैं इस दिल को ज़ख़म
क्या कुछ नहीं किया मेंरा दिल जलाने को।

क्या अब याद करूँ तेरी नादानी को मैं
चलो छोड़ें यहीं इस दुःख भरे तराने को।

हमें आया नहीं झूठी सी तसल्ली देना
तुम तो तैयार थे बिगड़ी हुई बनाने को।

तुम्हें आदत है कुछ भी खुल के बोल देने की
अब कुछ कहना नहीं जो हो हमें रुलाने को।

झगड़-झगड़ के भी जो एक हो जाते है हम
जैसे यह सिलसिला हो प्यार आजमाने को।

चलो अब हाथ दोस्ती का मिलाएं हंस कर
और वादा करें सारी उमर निभाने को।

No comments:

Post a Comment