Friday, 1 February 2013

डिस्कसिंग पोएट्री

डिस्कसिंग पोएट्री (प्रकाशित : स्कैनर)

मुझे प्रायः रेल द्वारा यात्राएं करनी पड़ती थीं। कई बार यात्रा के दौरान कुछ ऐसी बातें घटित हो जाती हैं, जो हमेशा याद रहती हैं। बहुत वर्ष पूर्व घटित एक किस्सा दिलचस्प है। मैं ट्रेन से त्रिवेंद्रम से दिल्ली लौट रही थी। प्रथम श्रेणी के डिब्बे में चार बर्थ पर चार लोग थे। एक विदेशी गेरुएवस्त्रधारी युवा पुरुष उस कम्पार्टमेंट में आ गया। उसके पास रिज़र्वेशन नहीं था। तीन दिन का सफ़र था, इसलिए वह बहुत परेशान था। उसने कहा कि वह रात को नीचे फर्श पर ही सो जाएगा। हम चारों यात्रियों ने उसकी उपस्थिति को स्वीकार कर लिया। काफी समय वह हेडफोन लगाए धार्मिक प्रवचन सुनता रहा। बीच-बीच में बातचीत भी चलती रही। वह विदेशों से भारत में आए उन अनेक युवा साधुओं में से था जो एक विशिष्ट संस्था से सम्बंधित हैं और कृष्ण के भक्त हैं।

उसने मेरा परिचय जानना चाहा। मैंने कहा, 'आयम ऑल्सो साधु लाइक यू।' उसने मेरी ओर हैरानी से देखा तो मैंने जोड़ा, 'दो आय डोंट वेअर दिस पर्टिकुलर कलर।' मैंने उससे पूछा, 'साधु बनने के लिए इन गेरुए वस्त्रों की क्या ज़रुरत है? मन में वैराग्य हो, बस इतना काफी है।'

उसने कहा, 'ख़ास वेशभूषा धारण करने से हम अलग क्लास नज़र आते हैं, इसलिए आम लोगों से दूर रहते हैं और बुराइयों से बचे रहते हैं। बुराई की जड़ भीड़ में शामिल होना है। अकेला आदमी बुराई में उतना नहीं फंसता।'

'यानि आपका अपने मन पर नियंत्रण नहीं है? फिर आप जैसे कितने अकेले हैं जो मिल कर एक भीड़ बना रहे हैं। तो बुराई तो इस भीड़ से भी उपजेगी?' कहने के साथ मैंने उसे गर्व से बताया, 'मुझे देखो, संसार में रह कर भी मैंने संसार को त्यागा हुआ है। असली सन्यास तो यह है कि आपके पास दुनियादार बने रहने की सारी वजहें मौजूद हों, फिर भी आप मन से सन्यासी हों।'

'डोंट टेल मी दैट। यू आर सो यंग।' मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा कि उसने यह कैसे कहा। एक साधु को मेरा यंग होना क्यों नज़र आया? उसने अपने को सम्भाला और बोला, 'प्लीज़ डोंट माइंड।'

'व्हाय शुड आय माइंड? दिस इज अ कॉम्प्लीमेंट।' मेरे जवाब देने पर उसने कहा, जैसे उससे बोले बिना रहा न गया हो, 'या, दिस इज अ कॉम्प्लीमेंट।'

फिर बातचीत चली अपने-अपने काम धंधे की। हाँ, साधु होने के साथ-साथ वह अपने संस्थान में अध्यापन कार्य करता था। बातचीत में न जाने कैसे एक शब्द 'पोएट्री' आ गया तो मैंने उसे बताया कि मैं कविता और कहानी लिखती हूँ। उसने तपाक से मेरी ओर हाथ बढाया, मिलाने के लिए, फिर शायद अपने मन की सलाह पर पीछे खींच लिया और अतीत की यादों में खोता हुआ बताने लगा कि कभी वह भी पोएट्री लिखा करता था और उसका एक संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है। और भी अनेक बातें, अपने परिवार, अपने प्रेम और प्रेमिकाओं के किस्से।

'कविता लिखनी क्यों छोड़ दी? आप आश्रम में रह कर भी तो कविता लिख सकते हैं,' मैंने कहा।

'नहीं, कविता मोह पैदा करती है, भावनाओं में बहाती है, जो एक सन्यासी के लिए उचित नहीं है।'

'मुक्ति का अहसास नहीं कराती? तनावों से मुक्ति?'

'नहीं, उलझाती है, लिप्त करती है।'

'सार्थकता का बोध नहीं कराती? अपने होने की सार्थकता?'

'नहीं, भ्रम पैदा करती है, अपने होने का भ्रम।' फिर आगे बोला, 'भारत में इतने सालों से रहते हुए भी कभी किसी इंडियन परिवार से मेरी दोस्ती नहीं हुई।'

मैं मन ही मन उसके सन्यासीपन को तोलने की कोशिश कर रही थी कि वह आगे बोला, 'आपसे फ़िज़ूल इतनी बातें कीं। बट वी वर डिस्कसिंग पोएट्री, इज़ंट इट?'

'पोएट्री डिस्कस न भी कर रहे हों तो भी इतना सजग होने की क्या बात है?'

'देखिए, इसीलिए कहा है, ज्यादा लोगों से मिलने-जुलने से, ज्यादा बात करने से मन चंचल होता है। आफ्टर ऑल, वी साधूज आर ऑल्सो ह्यूमैन बींग।'

उस समय मैंने सोचा था, जिस व्यक्ति को जितना ज्यादा आप जानेंगे, उतनी ज्यादा उसकी कमजोरियां सामने आएंगी। जितना गहरा किसी के दिल में झांकेंगे, वहाँ उतनी ही गन्दगी मिलेगी। इसलिए जिस पर जो आवरण पड़ा है, वह पड़े रहने देना चाहिए, चाहे वह आवरण गेरुए रंग का ही क्यों न हो।

उसके दोनों नाम (साधु होने के बाद का, जो उसका कहना था, अब यही प्रचलित है और साधु होने से पूर्व का जिसे, उसका कहना था, अब वह भूल चुका है और सिर्फ मुझे बताने के लिए अपने अतीत में लौटा था), आज मुझे याद नहीं हैं पर सोच रही हूँ, अपनी रेल यात्रा के इस साथी पर मैंने आज तक कोई कहानी क्यों नहीं लिखी?

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