Monday, 11 February 2013

प्रेम दंश Kavita 103

प्रेम दंश

क्यों किसी के भीतरी अंतस में घुसना बिन बुलाए
कि दिखाई देने लगें उसके दहकते से ज़ख़म।
क्यों किसी की बंद पड़ी किताब को पढने की जिद
क्यों किसी का दिल दुखा कर तोड़ना कोई भरम।

एक अनोखे तार में बंध कर खिंचा जाता है मन
छोड़ दो इस को खुला तो अनगिनत बहने लगेगा.
दूर रहने पर तुम्हारे पास आने को तरसता
पास आए तो ना जाने कौन सा नाटक रचेगा।

मैं नहीं और तुम नहीं, यह ज़िन्दगी कुछ भी नहीं
सोच-सोच कर यह मन, वैरागी हुआ बार-बार।
डर है कि ताले लगा कर बंद न कर दूं कहीं मैं
सारे अहसासों के कक्ष, सारे भावना के द्वार।

एक खामोशी सी छाती जा रही है चेतना पर
ज्यों कि सारे सुर सिमट कर हो गए हों चुप कहीं।
मैं हवाओं से कहूँगी वो उड़ा ले जाए सब कुछ
मैं तुम्हारी हूँ नहीं और तुम भी मेरे हो नहीं।

यह हमारे बीच जो है, वह नहीं है प्यार सा कुछ
तुम हो बातों के सहारे, मैं हूँ खामोशी में गुम।
ज़िन्दगी आसान नहीं, बीच में मुश्किल खड़ी है
प्रेम का यह दंश कैसे झेल पाएंगे कभी हम।

9 comments:

  1. man par paas aaye to na jaane koin saa natak rachega ....bahut achchi kavita hai

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    1. Dhanyavaad, Kamlesh kumar Diwan ji. Main aabhaari hoon ki aap meri rachnaaon ko pasand kar rahe hain.

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    2. This comment has been removed by the author.

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  2. एक खामोशी सी छाती जा रही है चेतना पर
    ज्यों कि सारे सुर सिमट कर हो गए हों चुप कहीं।
    मैं हवाओं से कहूँगी वो उड़ा ले जाए सब कुछ
    मैं तुम्हारी हूँ नहीं और तुम भी मेरे हो नहीं।

    बेहतरीन एहसास


    सादर

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  3. Yashwant Mathur ji, thanks for liking this poem.

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  4. बसन्त पंचमी की हार्दिक शुभ कामनाएँ!


    दिनांक 15 /02/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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