Tuesday, 5 February 2013

कभी तो कर भरोसा Kavita 102

कभी तो कर भरोसा 

तुझे कोई बददुआ भी दें अब तो कैसे दें
क्या कुछ तो जीवन में झेल कर बैठा है तू।
तुझे कोई दुआ देने का अब मन ही नहीं
नासमझी में रिश्तों से खेल कर बैठा है तू।

तेरी नादानियों की कोई सीमा ही नहीं
दरिन्दे दुश्मनों से मेल कर बैठा है तू।
तुझे आता नहीं जीना तो कोई क्या कीजे
छुकछुकी बच्चों की रेल पर बैठा है तू।

हमेशा ही तेरी जिद पर बनाए और तोड़े
कभी सपनों में जीने भी नहीं देता है तू।
फरेबी आँख तेरी देख ही लेती है जिसे
मेरी उम्मीद का दीपक बुझा देता है तू।

तेरा ईमान धरम कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं
तेरा जब चाहे मन विपरीत भी चलता है तू।
तेरे ईमान के सदके, बेइमान के सदके
मेरे दिल को दुखा के बहुत ही फलता है तू।

कभी तो सुन बिना शब्दों के जो है बज रहा
कभी तो झाँक इन आँखों के तहखानों में तू।
कभी तो कर भरोसा मेरी इस दीवानगी पर
कभी तो रख मुझे अपनी ग़ज़ल के मायनों में तू।

2 comments:

  1. बहुत ही बढ़िया मैम!
    आपके ब्लॉग पर आ कर अच्छा लगा।


    सादर

    ReplyDelete
  2. धन्यवाद, यशवंत जी।

    ReplyDelete