Saturday, 30 March 2013

ग़ज़ल 15

ग़ज़ल 15


आधी-अधूरी सी कथा में कोई रस नहीं
पढने के लिए पूरा फ़साना तो चाहिए।

मैं बार-बार उसके ख़त को देख लेती हूँ
इस दिल को जलाने को बहाना तो चाहिए।

होता नहीं यकीन कि यह कैसे हो गया
रूठे हुए रिश्तों को मनाना तो चाहिए।

लहरें नदी में हडबड़ाती बिलबिलाती सी
उछले न बेवजह यूं दबाना तो चाहिए।

आँखों में न वो सपने रहे और न आंसू
सहमे हुए होठों को हंसाना तो चाहिए।

आओ कहीं से ढूंढ कर लाएं पुराने दिन
बिगड़े हुए मंज़र को बनाना तो चाहिए।

Thursday, 28 March 2013

तुम्हारे बिना Kavita 114

तुम्हारे बिना

मैंने तुम्हारा चित्र फ्रेम से निकाल दिया है
अब खाली फ्रेम तुम्हारी याद दिला रहा है।
तुम्हारी छवि घर में चारों ओर नज़र आती है
मैं मस्तिष्क को झटक देती हूँ
कल्पना की आँखें देख ही लेती हैं फिर भी
कि तुम वहां सोफे पर बैठे थे
कि तुमने इस प्याले में चाय पी थी
कि खाने की मेज़ पर तुम्हारे हाथ से
चम्मच छूट कर खन्न से बजा था
कि तुम्हारी उपस्थिति से
मेरा घर सच में सजा था।
तुम बार-बार आए थे
तुमने हर बार नए सपने दिखाए थे
भविष्य के नक़्शे बनाए थे
मुझे नए सिरे से रचा था
प्रेम पर लिखा गया था जो महाकाव्य
उसकी परिकल्पना तुम्हारी थी
भावनाओं की कितनी ज़बरदस्त बमबारी थी।
आज भी सुनाई पड़ते हैं वो शब्द
जो तुम्हारे होठों से निकलते थे 
तो लगातार निकलते ही चले जाते थे
कितना कुछ था तुम्हारे पास कहने के लिए?
मुझे लगता, मैं तुम्हारे जैसी हो रही हूँ
तुम में हमेशा-हमेशा के लिए खो रही हूँ
अब ढूंढें न मिलूंगी खुद को भी।
मुझे अच्छे लगते थे तुम्हारे शब्द
तुम्हारी आवाज़ मुझ में गहरे उतर जाती थी
तुम्हारे अंदाज़ बहुत घातक थे
कितनी बातें करते थे तुम?
मैं बस तुम में रहती थी गुम।
मुझे लगता, मैं तुम जैसी हूँ, तुम मुझ जैसे
जैसे दो किनारे
क्षितिज पर जाकर एक हो गए हों।
तुम्हारा आना और तुम्हारा जाना
नियति का एक भयंकर मज़ाक था
मज़ाक-मज़ाक में जैसे हम खेले हों
खेल कर भूले हों
भूल कर जागे हों
जाग कर रोए हों
रो-रो कर सपनों में बार-बार खोए हों।
लो, मैंने सपने को खुद तोड़ दिया
पर जीना मुझे इसी टूटे सपने में है
तुमसे मिलने के बाद
तुमसे बिछड़ने के बाद
मुझे जीने की लगन
नहीं और किसी अपने में है।

Wednesday, 27 March 2013

मेरे आत्मन ! Kavita 113

मेरे आत्मन ! (प्रकाशित : बिंदिया, नवम्बर, '13)

मेरे आत्मन !
नाम तुम्हारा जब लूं
मन में ज्यों मंजीरे बाजे।

मेरे अन्तरंग !
बोल तुम्हारे सुन कर
तन-मन में चंचलता साजे।

मेरे सुमितम !
रूप तुम्हारा ऐसा
लगते जैसे कोई महाराजे।

मेरे सम्पूरण !
तुम पर मैंने मन से
मन के सब गुण-अगुण नवाजे।

मेरे प्रियतम !
प्रेम कथा रचने को
मन में अनगिन भाव विराजे।

Monday, 25 March 2013

होली

होली

होली का हुडदंग क्यों अब रास नहीं आता है?
क्या इसका मज़ा बचपन के साथ बीत जाता है?

होली के रंग डालें अपनों पर, बेगानों पर
इस त्यौहार में गैर भी अपना बन जाता है।

बदरंग हो रहे हैं मन के हालात प्रिय बिन
किन रंगों से चैन मिले समझ नहीं आता है।

पत्र को रंगों में डुबो कर भेजना है प्रिय को
दूर बैठे होली का शगुन तो भरमाता है।

Sunday, 24 March 2013

छोटी कविता : 7

छोटी कविता : 7

मैंने तुम्हें जितना चाहा
उतना मैं खुद से नफरत करने लगी।
मैंने तुम्हें जितना पूजा
उतना मैं खुद की नज़रों में गिर गई।

कोई किसी को इतना ना चाहे
कोई किसी को इतना ना पूजे
कि दयनीय, गिरे हुए चेहरे
दीवारों पर लटके हुए नज़र आएँ।

Saturday, 23 March 2013

अमंगल Kavita 112

अमंगल

अत्यधिक भ्रामक होता है प्यार का रिश्ता
हम उसे समझते हैं कुछ
वह हमें समझाता है कुछ और
हम उसे मानते हैं कुछ
वह हम से मनवाता है कुछ और
हम उस से चाहते हैं कुछ
वह हमसे चाहता है कुछ और
हम उसे देते हैं कुछ
वह हम से लेता है कुछ और
हम उस से कहते हैं कुछ
वह सुनता है कुछ और
हम उसके नज़दीक जाते हैं
वह दूर छिटक जाता है
वह हमारे नज़दीक आता है
हम देख नहीं पाते हैं
हम उसके स्पर्श को तरस जाते हैं
उसकी खरोंचें हमारे दिल पर खुदी मिलती हैं
हमारी सारी प्रार्थनाएं श्राप बन जाती हैं
हमारे सारे गान मर्सिया में ढल जाते हैं
हमारे मन की सुन्दरता प्रताड़ित है
पर क्यों उसका रूप इतना भ्रामक है?
हमारे मन में भावों की उथल-पुथल है
पर क्यों उसकी चाल इतनी भयानक है?
हमें भरोसा है किसी दैवी शक्ति पर
पर प्यार का आक्रमण असुराघात है
यह सम्मोहन का जंगल है
जंगल में मंगल है
मंगल में छुपा अमंगल है।

Monday, 18 March 2013

साथ जन्मों का Kavita 111

साथ जन्मों का (प्रकाशित : बिंदिया, नवम्बर, '13)

तुम्हारा मेंरा साथ जन्मों का।

लो मैंने मार दिया उसे
जो तुम्हारी साँसों में अटकता था
लो मैंने हार दिया उसे
जो तुम्हारी जीत में खटकता था।
तुम्हारा मेरा साथ युगों का।

तुमने दोहराए सारे वादे
जो मेरे जीवन के संग-संग चलते थे
तुमने लिखी फिर से इबारतें
जिनमें कभी खट्टे-मीठे सपने पलते थे।
तुम्हारा मेरा साथ बरसों का।

मौसम ने लिखा एक गीत
मुड़-मुड़  कर आती बहार के तराने का
बुझ-बुझ कर जल उठे दीप
चमक गया हर कोना मन के वीराने का।
आंसुओं से छूटा रिश्ता पलकों का।

नए दर्शन में घुल गए सब
क्या था असंगत, क्या था अतार्किक
नए अर्थ मिल गए शब्दों को
कोई न सपाट रहा, हुए सब मार्मिक।
मिलन हुआ अपनों से अपनों का।

अवसर की प्रतीक्षा में बैठे जो
मुखर हुए भाव कण कब से चुप्पाए हुए
नासमझ हो गए थे पागल से
अनधिकृत ज्ञान के मारे और सताए हुए।
जन्म हुआ फिर नए सपनों का।

Saturday, 16 March 2013

एक सहेली

एक सहेली (प्रकाशित : बिंदिया)

सच है, मैं यादों की गलियों से गुज़र रही हूँ। मेरी एक मित्र है, बड़ी गहरी और अनोखी मित्र। उसके और मेरे बीच उम्र का अच्छा-खासा फासला है। वह मेरे और मेरे पुत्र के बीच में है यानि जितने साल वह बौबी से बड़ी है, उतने ही साल मुझसे छोटी है। हमारे बीच तू-तडाक का रिश्ता है। उसकी मेरी दोस्ती लगभग तीस वर्ष पुरानी है और हमने ज़िन्दगी के अनेकों उतार चढ़ाव साथ-साथ देखे हैं। अनेक बार लडाइयां भी हुईं, बड़ी भयंकर लडाइयां हुईं, लेकिन लड़-लड़ कर हम फिर मिलते रहे। लड़ाइयों के बावजूद जो दोस्तियाँ नहीं टूटतीं, उन्हें मैं अर्जित यानि कमाई हुई दोस्ती कहती हूँ, जिसकी उम्र बहुत लम्बी होती है। वरना जो एक हलके से झटके से चटक जाए, वह क्या दोस्ती? तो हमारी दोस्ती ऐसी थी कि रात-दिन का साथ। पूरी रात बातें करते बीत जाती थी। कहाँ से आती थीं इतनी सारी बातें? पता नहीं पर सिलसिला ख़त्म ही नहीं होता था। एक विचित्र सा दुर्योग था हमारे बीच, उसे मेरी उम्र के लड़के पसंद आते थे और मुझे उसकी उम्र के। हम हंसा करते थे कि उस में पिता-ग्रंथि है, मुझ में पुत्र-ग्रंथि। उसका प्रेम अपने से लगभग 35 वर्ष बड़े व्यक्ति से हुआ, जिससे उसने शादी भी की। आज उस के पति जीवित नहीं हैं लेकिन वह उनसे गहराई से जुडा हुआ महसूस करती है और उनकी यादों के सहारे ही जीना चाहती है।

बीच में मैं अपने 13-14 वर्ष के अज्ञातवास में रही। (संभवतः) 2006 में वह एक दिन अचानक मेरे ई डी एम मॉल वाले शोरूम में मेरे सामने खड़ी थी। 'अरे मणिका, तू यहाँ?' वह अपने पति की साइड की किसी महिला के साथ थी। वह सफ़ेद लिबास में थी। उसके पति का निधन हो चुका था। मैं शोक मनाने भी नहीं गई थी क्योंकि मैं स्वयं अपने मन के अंधेरों से जूझ रही थी इसलिए एकांतवास में थी। मैंने उस से बस इतना कहा, 'सॉरी यार, मैं नहीं आ सकी। क्या करती? मैं अपने में ही नहीं हूँ।'

'कोई बात नहीं। चल, अब अपना फोन नंबर दे।' फोन नंबर लिए-दिए गए। लेकिन उसके बाद न उसने मुझे फोन किया, न मैंने उसे।

2012 से मैं एक मानसिक उलझन से गुज़र रही थी। मुझे किसी से बात करने की ज़रुरत महसूस हो रही थी, किसी ऐसे से जिसकी सेंसिबिलिटी मेरी सेंसिबिलिटी से मेल खाती हो। मुझे अपनी पुरानी प्रिय सहेली का ख्याल आया और अब 2013 में मैंने उसे फोन किया। तो 'तू मेरे घर आ।' 'नहीं, तू पहले आ।' 'नहीं तू पहले।' मेरे घर से उसके घर की दूरी 25 कि मी है। मैंने कहा, 'मैं पहली बार बौबी के साथ आउंगी। घर ढूंढना पडेगा न।' तो एक रविवार को मैं बेटे के साथ उसके घर गई। 'ओह हो, बौबी, तू इतना बड़ा हो गया ! '

उसका घर बेहद खूबसूरत। उसके तीन बेडरूम के घर की भव्य साज सज्जा थी, घर में एक सुन्दर छोटा सा बगीचा भी, बगीचे में फव्वारा, फव्वारे में मछलियाँ। बगीचे में लगी छतरी के नीचे रखी कुर्सियों पर हम बैठे। बस, फिर बातें ही बातें। उस का बात करने का अंदाज़ होता है एकदम दार्शनिक और मेरी बातों में होती हैं कहानियाँ। मैंने उसके अकेलेपन को महसूस किया और पूछा कि आगे के लिए क्या सोचा है? वह बोली, 'उन की यादों से बाहर नहीं निकल पाई हूँ।' उसके बाद मेरी और उस की बातों का मुख्य मुद्दा यह कि हम सन्यासी हैं। बहुत कम उम्र में हमसे जीवन के राग छूट गए।

वह मुझ पर रश्क करे और मैं उस पर।

'मणिका, यू आर लकी, यू हैव अ सन, यू हैव गौट अ फैमिली।'

'ओह डियर, मुझे पुराने दिन याद आ रहे हैं जब मैं अकेली ऐसे ही ठाठ-बाट से रहा करती थी।'

पूरे ठाठ-बाट हों, अकेले रहने का मूड हो, फिर अकेलेपन में अफ़सोस हो कि हाय, यहाँ सब कुछ है, बस एक 'वो' नहीं है, यह सोच कर मन में करूण रस की उत्पत्ति हो, आँखों में आंसू हों, आंसुओं की धारों में चीखें हों, दीवारों से सिर फूटें, और फिर कविता-कहानी का जन्म हो। वाह वाह ! पूर्ण समर्थ स्त्री अकेली रहती है तो मुझे बहुत अच्छी लगती है। मुझे ऐसी महिलाएं बहुत आकर्षित करती हैं जिन्हें पुरुष की ज़रुरत तो होती है पर वे किसी भी ऐरे-गैरे के साथ समझौता करके रहने की बजाय अकेली रहना बेहतर समझती हैं, जिनके लिए विवाह बुनियादी तौर पर ज़रूरी नहीं है, दुनियादारी नहीं है, जिन्हें इज्ज़त के लिए सिर के ऊपर किसी के आश्रय की छत की ज़रुरत नहीं है, जो पुरुष द्वारा पाली जाने की बजाय अपनी पसंद के पुरुष को पालने की हिम्मत रखती हैं। सच में वाह वाह!

बौबी ने उससे कहा, 'दी, हम इसी रास्ते से आपके घर के आगे से होकर आगरा जाते हैं।'

'ठीक है, अगली बार मुझे भी साथ ले लेना। मैं अपनी गाडी में .... अब बौबी, तुम ऐसा करो कि मम्मी को यहाँ छोड़ जाओ, हमें बहुत सारी बातें करनी हैं, पिछले 15 सालों की कहानियाँ कहनी-सुननी हैं।'

लेकिन वैसा संभव नहीं हुआ। 'फिर किसी और दिन मम्मी खुद आ जाएंगी,' बौबी ने कहा। उसके घर से निकल कर कार में बैठते ही बौबी बोला, 'उफ़, कितना बोलती हैं, दी? और आप भी मॉम। कमाल है, आप दोनों अपने को सन्यासिन कह रही थीं. सन्यासी लोग इतना नहीं बोलते।'

'हम सन्यासी इन अर्थों में हैं कि देखो, हमें बहुत भूख लगी है, हमारे सामने अच्छे-अच्छे खाने रखे हुए हैं, फिर भी हम नहीं खाते, हमें कोई लालच नहीं।'

'ओह्हो तो खालो न, किसने मना किया है? वॉट अ बिग डील।'

'हमारी अंतरात्मा रोकती है। हम संयमी हैं। इस प्रकार हम अपने भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा का संचयन करते हैं।'

'जब यह चुनाव आपका अपना ही है, फिर यह अफ़सोस किसलिए?'

'अफ़सोस इसलिए कि अफ़सोस से हमारे अन्दर साहित्य का जन्म होता है।'

'क्या बात है, मॉम, क्या बात है। चित भी अपनी, पट भी अपनी?'

उसके बाद से मेरे और उस के बीच फिर से पुरानी मित्रता नए सिरे से शुरू हुई। फिलहाल हम घंटों फोन पर लगे रहते हैं। हमारी रूचि के कुछ कॉमन विषय हैं। मुख्य विषय है ज्योतिष शास्त्र। उसका कहना है, 'मणिका, तू जो इतने साल अज्ञातवास में रही, इसका कारण उस समय तेरी शनि की महादशा थी। और उसके बाद जो तूने त्वरित गति से दो महीने में 100 कवितायेँ लिख मारीं, उस समय तेरी बुध की महादशा थी।' मैंने उसे कहा, 'तू ही एक दिन आजा।' बोली, 'नहीं, मेरी शनि की महादशा चल रही है। शनि परिवार में जाने से रोकता है। आना तो तुझे ही पडेगा।'

हमारी रूचि का दूसरा मुख्य विषय होता है, बार-बार जिए-मरे रिश्तों की पड़ताल करना यानि बाल की खाल निकालना यानि एक ही चीज़ को बार-बार उधेड़ना और फिर बुनना। इससे हम में ज़िन्दगी को समझने की एक सूक्ष्म दृष्टि पैदा होती है।

तीसरा विषय है,  अपना-अपना लिखा हुआ सुनाना, उस लिखने के पीछे की रचना प्रक्रिया बताना, उस पर मंतव्य देना और साथ ही यह भी खोजना कि वह रचना-विशेष किस पर लिखी और क्यों लिखी गई?

सच, सहेलियां कितनी ज़रूरी होती हैं। हमारा एक-दूसरे के घर रात-रात भर जाग कर बातें करने का सिलसिला जल्दी ही शुरू होने वाला है।

संकल्प Kavita 110

संकल्प

जिसे मैंने समझा था जीवन का आखिरी सुख
वह मेरे जीवन का आखिरी दुःख निकला।
मैं नहीं जानती थी कि
किसी पत्थर से टकरा जाऊंगी
और बिना किसी कसूर के
लहुलुहान हो जाऊंगी।
नहीं जानती थी कि
भगवान का प्रसाद जिसे समझा था
वह गरलपान की तरह
हलक के नीचे उतर जाएगा
और मेरी अंतड़ियों को जला कर
राख कर देगा।
कहाँ गए वो दिन
जब मैंने अपने जीवन के पतझर में
बसंत का आना महसूस किया था
क्यों व्यर्थ ही मुस्कुराना शुरू किया था?
मुझे आदत ही नहीं थी मुस्कुराने की
बरसों से संगत में जी रही थी वीराने की।
यह तो कोई बात नहीं हुई कि
हवा का झोंका आए,
शीतल करने की बजाय
सब कुछ बिखरा के चला जाए।
अब समेट रही हूँ तितर-बितर हुए पल
फिर से लिखूंगी विरह का कोई गीत
फिर से लूंगी संकल्प हँसते रहने का।

Friday, 15 March 2013

गिरिजा कुमार माथुर

गिरिजा कुमार माथुर

गिरिजा कुमार माथुर जी को नमन. जब वे दिल्ली रेडिओ में थे, मुझ छोटी सी को उन्होंने कविता पढने के कई अवसर दिए. उन्हें लगता था (शायद सच भी हो) कि उस समय मैं बहुत तेज़-तर्रार कवितायेँ लिखती थी। मेरा शुरूआती दौर था। एक बार उन्होंने 'परिवार नियोजन' पर कविता पढ़ने के लिए बुलाया। कई और कवि भी थे। लेकिन उन्होंने मुझसे जानना चाहां कि मैं कौन सी कविता पढूंगी। मैं एक लघु कविता पढने वाली थी जो इस प्रकार थी ....

क्वारे लड़के और लड़कियों ने
खरीद लिए हैं
पंद्रह पैसे में तीन
कितना आसान हो गया है
बेसुरी बजाना बीन।

माथुर जी ने मुझे डाँटा, बोले, 'तुम तो मेरी नौकरी गंवाओगी।' और मेरी डायरी में से दूसरी कविता चुन कर मुझे पढने के लिए कहा। वैसे मुझ पर उनका असीम स्नेह था। वो नए कवियों को बहुत अहमियत देते थे।

Wednesday, 13 March 2013

आखिरी दुःख Kavita 109

आखिरी दुःख

यह एक अंत की शुरुआत है।
ख़ुशी को आते देखा मैंने दरवाज़े पर
भाग कर उसका स्वागत किया
सोचा ऐसा क्या बचा रह गया था
जो मैंने अब तक नहीं पाया था?
ज़रूर होगा यह कुछ ख़ास
नए अर्थ होंगे इसके
ज़रूर लिखा होगा यह नसीब में
तभी खुद-ब-खुद चल कर आया है
मैंने इसे कब बुलाया है?

जीवन की आखिरी सौगात है।
इसे अपने आँचल में भर लूं
मन के भीतर कहीं बंद करके रख दूं
जब चाहूं खोलूँ, जब चाहूं देखूं
किसी की नज़र न लग जाए
मेरी ही नज़र न लग जाए
इतना अमूल्य उपहार
आसमान से सीधा
मेरी झोली में आ गिरा?
उफ़ ! उफ़ ! मैं कैसे सम्भलूं?

सुख की भी होती एक बर्दाश्त है।
यूं ही पड़े नहीं मिल जाते राह पर
हर किसी के भाग्य में नहीं लिखे होते
अनमोल होते हैं ये
कीमत चुकानी पड़ती है फिर भी
खुद मर कर इन्हें ज़िंदा रखना पड़ता है
अपने उसूल तक बेचने पड़ते हैं मुफ्त
पूर्ण समर्पण मांगता है प्यार
प्यार का दुःख भी प्यार ही होता है
बिन सहा रह गया था यह आखिरी दुःख।

Sunday, 10 March 2013

ग़ज़ल 14

ग़ज़ल 14

मैंने उसे छुआ, वह पत्थर का हो गया
शीशे का दिल मेरा, चूर-चूर हो गया।

हाथ की लकीरों में लिखा था मेरी यह
जो भी करीब आया, वही दूर हो गया।


जब रोशनी लेने के लिए हाथ पसारे
रात की स्याही को वो मंज़ूर हो गया।

कल तक रौनक लगी थीं सूने आँगन में
आज रोने-धोने को मजबूर हो गया।

पागल हवाएं बहने लगी थीं उमड़-घुमड़
बाद में मौसम भी कुछ मगरूर हो गया।

इन चमकते सितारों में ना कोई अपना
नाकामियों के बीच में मशहूर हो गया।

Friday, 8 March 2013

सीमाएं Kavita 108

सीमाएं

तुम रोज़ मेरा एक हिस्सा काट कर फ़ेंक रहे हो।
मैं टुकड़ों में मर रही हूँ।
क्यों नहीं तुम एक साथ काट देते मुझे?
रोज़-रोज़ का दंश असहनीय होता है।

मेरे दिल का खून करके बैठे हो तुम।
यह दिल का मामला है निर्मोही।
मैंने क्या कह दिया कि तुम्हें सात खून माफ़
तुम तो सचमुच गिन गिन के मार रहे हो।

तुम्हारे मन में कोई पछतावा नहीं
पछतावे के चिन्ह तुम्हारे चेहरे पर नहीं
जैसे इस काम में तुम निपुण हो
अपनी कला को आजमाने आए थे मेरे पास?

मुझे छू कर पवित्र होना चाहते थे?
मुझे देवी का दर्जा इसीलिए दिया तुमने?
मुझे छू कर धुलेंगे तुम्हारे पाप?
मुझे छूना कितना ज़रूरी था तुम्हारे लिए।

मैं सच में तुम्हें छू कर हो गई पवित्र
जैसे इस जन्म में पहली बार छुआ हो किसी को।
पर मैं मन के रास्ते तुम तक पहुंची थी
और बीच राह से वापस लौट आई।

अब तुम मुझे देवी कहो या दानवी
अक्षुण्य प्यार देने का वादा करो या न करो
अब हमारी सीमाएं निर्धारित हैं
तुम अपने देश, मैं अपने देश।

ग़ज़ल 13

ग़ज़ल 13

उसे आज तक कभी मुझ पर तरस नहीं आया
जिसके लिए रात-दिन मैंने अपने को गलाया

जिसके लिए मोड़ दिए मैंने हवाओं के रुख
उसे मेरा हवा में बहना रास नहीं आया।

जिसके लिए तोड़ दीं मैंने सारी वर्जनाएं
उसी ने मुझे अनुशासन का पाठ पढ़ाया।

जिसे प्यार करने के लिए मैंने हदें पार कीं
उसी ने मेरी निश्छलता पर अंकुश लगाया।

जिसे मैंने चाँद सितारों सी ऊंचाई दी
उसी ने मुझे मेरी ही नज़रों में गिराया।

जिसके ज़ख्मों पर मैंने लगाए लाड़ के मरहम
उसी ने मेरी आत्मा पर ज़ख्मों को सजाया।

वह सो रहा था गुमनामी की गोद में निर्द्वन्द
मैंने उसे जगा के महफ़िलों में परचाया।

मेरे सुनहरे आज पर हावी था उसका कल
मैंने उसे, वो जैसा भी था, वैसा अपनाया।

आया था वह शिष्य की तरह, बन बैठा गुरू
उसने मुझे फिर उपदेशों का पाठ पढ़ाया।

वह था उद्दंड गरजमंद, मैं थी सर्व संपन्न
उस ने मेरे दान को दयनीय कह के लजाया।

रिश्ता ख़त्म नहीं होता Kavita 107

रिश्ता ख़त्म नहीं होता

रिश्ता ख़त्म होने के बाद भी ख़त्म नहीं होता।

यह सिर्फ मीठी या कड़वी
यादों में ही नहीं जिंदा रहता
बल्कि उलझाए रखता है
सवालों में, जवाबों में।
अलग होकर भी हम
एक-दूसरे से पूछते रहते हैं सवाल
ख्यालों में।

उन सवालों के जवाब आज भी नहीं मिलते
कि आखिर जो कुछ हुआ
वह क्यों, कब, कैसे हुआ?

सवालों में होती हैं शिकायतें
शिकायतें में होती है बेचैनी
बेचैनी में होती हैं आंसुओं की धारें
आंसुओं में बेआवाज़ चीखें और चिल्लाहटें।

बेचैनी टूटे हुए रिश्ते को और तोड़ती है
जीते जी ज़िन्दगी खुद को
मौत की तरफ मोड़ती है।

Thursday, 7 March 2013

वीतराग Kavita 106

वीतराग

क्यों मन हो जाता है उदास
बार-बार।
सब कुछ रहता है वहीँ का वहीँ
घर के कोनों में सजे हुए दीपदान
आँगन में उग रही हरियाली
दीवार से सटे हुए अशोक के पेड़
गमलों में गेंदा और गुलाब
खिड़की से झाँकता हुआ सुनहरा सूरज
मंद-मंद बहती हुई ठंडी बयार
चाँद का कभी घटना, कभी बढ़ना
फ़िल्मी संगीत, मंदिर की घंटियाँ
नौकरों का आना और जाना
वही दावतें, वही मनोरंजन, वही सैर-सपाटे
अपनों का प्यार, लाड़, तकरार
सब कुछ वहीँ का वहीँ है
सब कुछ वैसा ही है
जैसा रोज़ होता है
पर मन के भीतर की पूरी दुनिया
जो अदृश्य है, अश्रव्य है
बिना कुछ कहे-सुने बदल जाती है
क्यों यह उदासी
दिल पर बार-बार छा जाती है?
कुछ भी तो ऐसा नहीं जो मेरे पास न हो
हर तरह के ऐशो आराम से भरपूर हूँ मैं
क्या मांगू तुझसे मैं और, ओ मेरे भगवन
जायज़ नाजायज़ सब कुछ तो तूने दिया
मेरे देखे बिना सपनों को पूरा किया
फिर भी क्यों मन हो जाता है उदास
बार-बार?
क्यों स्थायी भाव की तरह जुड़ा है मुझसे
यह वीतराग?
क्यों खुशियों के बीच भी फैली है
मनहूसियत?
क्यों ढूंढें नहीं मिल रहा मन का चैन?

वैराग्य Kavita 105

वैराग्य

मोह माया से आत्मा अशुद्ध हुई
राग ने अपवित्र किया अंतस को
प्रेम के बहाने से चंचल हुआ मन
सारे आकार विकार में बदल गए।

ज्ञान सारा हुआ धूल धूसरित
जो भी कमाया था, खो गया
उजालों से चमका जो परिवेश
ज़रा सा पोंछा और मिट गया।

उँगलियों पर गिन लो अनेकों उजास
सबने अंधेरों की मार मारी है
सारी शंकाएं दूर होती हैं तब
अकेले में प्रश्न जब उगते हैं।

वापस लौटना है अपनी खोह में
एकांत में दार्शनिक प्रकाश है
भीड़ में ऊबता है मन बार-बार
सिर्फ एक से आगे नहीं बढ़ना है।

Saturday, 2 March 2013

घोषणा पत्र Kavita 104

घोषणा पत्र 

मैं दिल के मामलों में
कमज़ोर नज़र आती हूँ
पर जब भी फैसले की घड़ी आती है
दिल पर हावी हो जाता है दिमाग
और नहीं करने देता
कोई भी ऐसा फैसला
जिसमें किसी और की जीत नज़र आए
और मेरी हार।

किसी भी निर्णय में मेरा हारना
मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।

संबंधों की गणना में
मेरा हिसाब कभी गलत नहीं होता।
मैं दिल से कमज़ोर ज़रूर हूँ
पर इतनी भी नहीं
कि हारने के लिए खुद को प्रस्तुत कर दूं
क्योंकि मेरा दिमाग हमेशा
दिल पर हावी रहता है।

मैं टूट सकती हूँ पर झुक नहीं सकती।

मैं धोखे से पीठ पीछे वार नहीं करती
मैं सच बता बता कर शर्मिंदा करती हूँ
ताकि दूसरा खुद चुल्लू भर पानी में डूब मरे।

मुझे चालें बहुत आती हैं अपने बचाव के लिए
उन्हीं चालों से मार सकती हूँ दूसरों को भी
पर मारती नहीं
मेरा धर्म मेरे आड़े आता है
मैं किसी पाप की भागीदार नहीं बनती।

जिसमे हिम्मत हो
वही मेरे पास आने का सोचे
क्योंकि वो या तो मेरा हो जाएगा
या जान से जाएगा।

Friday, 1 March 2013

ग़ज़ल 12

ग़ज़ल 12


कौन सा दूँगी उसे अहसास दोस्तों
मेरे पास कुछ भी नहीं ख़ास दोस्तों।

चंद भाव-पुष्प थे, वो भी मुरझ गए
सपनों की बिछी रह गई बिसात दोस्तों।

मालूम है मुझे कि अब होगी नहीं सुबह
अँधेरों में जीना किसे है रास दोस्तों।

हम समझ रहे थे जिसे राजसी फुहार
मौसम से पहले बरसी है बरसात दोस्तों।

सबसे दूर जाने के दिन पास आ गए
अब नहीं इस में कोई परिहास दोस्तों।

मेरी बदहाली का हाल छुप नहीं सका
वह खड़ा था रोता हुआ पास दोस्तों।

पहले मरीज़े इश्क में बीमार हम रहे
अब चला आया है खुद यमराज दोस्तों।

कौन मरता है किसी के मरने से यहाँ
पर रहेगा वह बहुत उदास दोस्तों।

चाहे वह कितना ही रहे खिलखिलाता सा
मेरे बिन है सब उसे बकवास दोस्तों।

न कोई समझा है, न समझेगा कभी भी
कि यह रिश्ता जन्मों की सौगात दोस्तों।