Friday, 8 March 2013

ग़ज़ल 13

ग़ज़ल 13

उसे आज तक कभी मुझ पर तरस नहीं आया
जिसके लिए रात-दिन मैंने अपने को गलाया

जिसके लिए मोड़ दिए मैंने हवाओं के रुख
उसे मेरा हवा में बहना रास नहीं आया।

जिसके लिए तोड़ दीं मैंने सारी वर्जनाएं
उसी ने मुझे अनुशासन का पाठ पढ़ाया।

जिसे प्यार करने के लिए मैंने हदें पार कीं
उसी ने मेरी निश्छलता पर अंकुश लगाया।

जिसे मैंने चाँद सितारों सी ऊंचाई दी
उसी ने मुझे मेरी ही नज़रों में गिराया।

जिसके ज़ख्मों पर मैंने लगाए लाड़ के मरहम
उसी ने मेरी आत्मा पर ज़ख्मों को सजाया।

वह सो रहा था गुमनामी की गोद में निर्द्वन्द
मैंने उसे जगा के महफ़िलों में परचाया।

मेरे सुनहरे आज पर हावी था उसका कल
मैंने उसे, वो जैसा भी था, वैसा अपनाया।

आया था वह शिष्य की तरह, बन बैठा गुरू
उसने मुझे फिर उपदेशों का पाठ पढ़ाया।

वह था उद्दंड गरजमंद, मैं थी सर्व संपन्न
उस ने मेरे दान को दयनीय कह के लजाया।

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