Sunday, 10 March 2013

ग़ज़ल 14

ग़ज़ल 14

मैंने उसे छुआ, वह पत्थर का हो गया
शीशे का दिल मेरा, चूर-चूर हो गया।

हाथ की लकीरों में लिखा था मेरी यह
जो भी करीब आया, वही दूर हो गया।


जब रोशनी लेने के लिए हाथ पसारे
रात की स्याही को वो मंज़ूर हो गया।

कल तक रौनक लगी थीं सूने आँगन में
आज रोने-धोने को मजबूर हो गया।

पागल हवाएं बहने लगी थीं उमड़-घुमड़
बाद में मौसम भी कुछ मगरूर हो गया।

इन चमकते सितारों में ना कोई अपना
नाकामियों के बीच में मशहूर हो गया।

1 comment:

  1. हाथ की लकीरों में लिखा था मेरी यह
    जो भी करीब आया, वही दूर हो गया----sunder

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