Saturday, 30 March 2013

ग़ज़ल 15

ग़ज़ल 15


आधी-अधूरी सी कथा में कोई रस नहीं
पढने के लिए पूरा फ़साना तो चाहिए।

मैं बार-बार उसके ख़त को देख लेती हूँ
इस दिल को जलाने को बहाना तो चाहिए।

होता नहीं यकीन कि यह कैसे हो गया
रूठे हुए रिश्तों को मनाना तो चाहिए।

लहरें नदी में हडबड़ाती बिलबिलाती सी
उछले न बेवजह यूं दबाना तो चाहिए।

आँखों में न वो सपने रहे और न आंसू
सहमे हुए होठों को हंसाना तो चाहिए।

आओ कहीं से ढूंढ कर लाएं पुराने दिन
बिगड़े हुए मंज़र को बनाना तो चाहिए।

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