Friday, 1 March 2013

ग़ज़ल 12

ग़ज़ल 12


कौन सा दूँगी उसे अहसास दोस्तों
मेरे पास कुछ भी नहीं ख़ास दोस्तों।

चंद भाव-पुष्प थे, वो भी मुरझ गए
सपनों की बिछी रह गई बिसात दोस्तों।

मालूम है मुझे कि अब होगी नहीं सुबह
अँधेरों में जीना किसे है रास दोस्तों।

हम समझ रहे थे जिसे राजसी फुहार
मौसम से पहले बरसी है बरसात दोस्तों।

सबसे दूर जाने के दिन पास आ गए
अब नहीं इस में कोई परिहास दोस्तों।

मेरी बदहाली का हाल छुप नहीं सका
वह खड़ा था रोता हुआ पास दोस्तों।

पहले मरीज़े इश्क में बीमार हम रहे
अब चला आया है खुद यमराज दोस्तों।

कौन मरता है किसी के मरने से यहाँ
पर रहेगा वह बहुत उदास दोस्तों।

चाहे वह कितना ही रहे खिलखिलाता सा
मेरे बिन है सब उसे बकवास दोस्तों।

न कोई समझा है, न समझेगा कभी भी
कि यह रिश्ता जन्मों की सौगात दोस्तों।

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